शब्दों में सामर्थ्य नहीं, शहादत को पंक्तिबद्ध करूँ
जुंबा मे इतनी ताकत नहीं, कुर्बानी को ब्यां करूँ ।
वीरों का बह रहा लहू ,आक्रोश कैसे व्यक्त करूँ ?
उस करुण क्रंदन को,किन शब्दों में चित्रण करूँ ।
रात्रि की निस्तब्धता को,रौंदती चीखें अपनों की ।
सारे सपने ढह गए , दीवार जैसे रेत की ।
तिरंगे म़े देख शहीदों को , तिरंगा भी रोता दिखा ।
ये कैसी हैवानियत, दहशतगर्दी ही वाजिब दिखा ।
मृतप्राय वे दहशतगर्द, जो खूनी होली खेल रहे ।
वे आतंक पथ पे बढ़े हम मौत का मंजर झेल रहे
चढ़ा जुनून जेहाद का पथ विचलित युवाओं में ।
लिख रहे सकून दिल का, मौत की स्याही में ।
रक्तरंजित हुई धरती, मानवता को धिक्कार रही।
शहीदों की शहादत पर, इंसानियत भी रो रही ।
मर कर जो हुए अमर, सर झुके हैं शहादत में ।
करूँ शत-शत उन्हें नमन
जो शहीद हुए हमारी हिफाजत में ।
------------*--------------सुनीता रानी राठौर