Friday, 31 January 2020

--------------"वजूद औरत का"--------

वजूद औरत का रहस्यमयी अनसुलझी पहेली सी
सहनशीलता रखती दिल में रखती वो चिंगारी भी ।
कोमलांगी समझ बनाया समाज जिसे पर्दानशीं,
तोड़ बेड़ियाँ थाम तलवार बनी रानी झांसी भी ।

झेली दर्द जो मूक निरंतर चिता पे जल बनीं सती,
वजूद जो खुद का पहचानी वो बनीं महादेवी भी ।
हर औरत सीता, यशोधरा, यशोदा बेन नहीं होती,
लड़ना जानती अधिकार  सम्मान की लड़ाई भी ।

बेगम जो परदे की दहलीज नहीं लांघती थी कभी ,
आज अडिग खड़ी ले तख्ती कर रही फरियाद भी।
लांछन झेल दुनिया की न अब धरती मेँ वो समाती ,
तेजाब हमला से उबर डट मुकाबला वो करती भी।

नदियां जब वजूद पहचानना सीख ले खुद की ,
न करे कभी समुंदर से मिलने की कोशिश भी ।
समर्पित हो घर को स्वर्ग बनाती जो बन जननी ,
'सुनीता'जग से टकराने की रखती वो जज्बा भी ।
*------*------------*----------*--सुनीता रानी राठौर---*

Wednesday, 29 January 2020

माँ शारदे वीणा वादिनी

            ------"माँ शारदे वीणा वादिनी"-------
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              माँ शारदे वीणा वादिनी ,
        शत-शत वंदन करूँ मैं अभिनंदन ।
           जब हो हृदय में वास तुम्हारा ,
       प्रतिभा से उल्लसित हो जीवन हमारा ।

          ज्ञान की हो तुम भव्य फुलवारी ,
           खुशबू से दमके दुनिया सारी । 
             शिक्षित होते नर और नारी ,
             पाकर माँ आशीष तुम्हारी ।

            हृदय को ज्योतिर्मय कर दो ,
           प्रेम, करुणा, नैतिकता भर दो ।
             वीणा का झंकार छेड़ कर ,
             स्वरों को अमृतमय कर दो ।

             हृदय को प्रकाशित कर माँ ,
              दो मुझे नव शब्द स्वर माँ ।
             सांस की अंतिम अवधि तक,
                  दें सकूं संदेश माँ ।

               प्रेरणा भर दो हृदय में ,
               लिख सकूं नवगीत माँ ।
               माँ शारदे वीणा वादिनी ,
        शत-शत वंदन करूँ मैं अभिनंदन ।
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                              सुनीता रानी राठौर

Sunday, 26 January 2020

नमन वीर सपूतों को

------    नमन वीर सपूतों को    -----
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          शत-शत नमन उन वीर सपूतों को ,
           जिनके कारण हमें मिली आजादी । 
   शत-शत नमन विशेष कर उन वीर सपूतों को,
    जो स्वतंत्रता संग्राम में नींव की ईंट बन गए ।

     नींव की ईंट जिन्हें प्रसिद्धी की चाह नहीं ,
  सर्वस्व समर्पित कर जो खो गए गुमनामी में।
  चमक रहे कुछ स्वतंत्रता सेनानी रूपी कंगूरे ,
     इतिहास के पन्नों में, स्वर्ण अक्षरों में ।

      कंगूरे  जो उस नींव की ईंट पर हैं खड़े ।
   कंगूरे जिस पर प्रतिवर्ष हम माल्यार्पण करते ।
       राजनेता उन पर हैं राजनीति करते ।
  काश ! कोई देख पाता इस कंगूरे के नींव को ,
        कीचड़ में दब कर भी जो कंगूरे की ,
                मजबूती बनाये है खड़ा ।

त्याग, समर्पण की जिसकी हो निःस्वार्थ भावना,
    माल्यार्पण करवाने की न हो कोई कामना ।
         उनकी भावनाओं का दमन कर ,
           आज क्षुद्र राजनीति हो रही ।
          बाह्य आडम्बर को देख-देख ,
              उनकी आत्मा रो रही । 

             उनके बलिदानों पर नेता ,   
          आज स्वार्थ की रोटी सेंक रहे ।      
            गगन स्पर्शी आकांक्षाओ में ,
         कंगूरा बनने का सपना देख रहे । 
        अगर न होती मजबूत नींव ईंट की ,
           क्या कंगूरा चमकता वहाँ ?

       शत-शत नमन उन वीर सपूतों को ,
   खो गए जो इतिहास के गुमनाम पन्नों में ।
       वो लाल माँ का,वो सिंदूर नारी का ,
     वो राखी बहन का , वो सपूत देश का ।
  जो नींव की ईंट बन,कर गए सर्वस्व समर्पित ।
       शत-शत नमन उन वीर सपूतों को ।
               शत-शत नमन ।
----------+-----------------*सुनीता रानी राठौर------------

Friday, 24 January 2020

क्यों रोती हैं मेरी बेटियाँ ?

---------क्यों रोती हैं मेरी बेटियाँ  ?----–-----
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         ज्वलंत प्रश्न  उमड़ते हैं मन में ,
       जैसे हिलोरें लेती लहरें समंदर  में ।
    क्यों फिल्म " छपाक" होती है बहिष्कृत ,
क्या एसिड पीड़िता के प्रति संवेदना मर गई ह्रदय में ?

   दीप जला कर मंदिरों में देवी पूजन करते हो ,
  औरतों पर छींटाकशी करने से नहीं चूकते हो ।
क्या मीराबाई,लक्ष्मी बाई , फूलन देवी बन जायें ?
क्यों मर्दानगी अहं में नारी अस्मिता पे चोट करते हो ?

  मशाल लेकर हुजूम उमड़ते हो सड़क पर ,
फिर भी बेटियों की अस्मत लूट रही बंदूक की नोक पर।
 सियासतो ने बढ़ाया है मनोबल इन हवशियों का,
 क्योंकि कानून की धज्जियाँ उड़ाते पैसों के बल पर।

       साधु के वेष में बलात्कारी हैं छुपे बैठे ,
       मंत्री के छद्म रूप में दुराचारी हैं छुपे बैठे ।
   सफेदपोशों को सजाये मौत कब मिलेगी बोलो 
   सिसकती बेटियों को इंसाफ कब मिलेगी बोलो 
जिनके हांथ लम्बे हैं तत्परता से उन पे हांथ डालो सजा उसे दुगुनी हो ऐसा उम्दा कानून बना डालो।
एसिड पीड़िता,बलात्कार पीड़ित या परित्यक्ता बन
  पल -पल खून की आंस क्यों रोये मेरी बेटियाँ  ?
बंद करो  सियासत ,अब इनकी आंसू पोछ डालो।
 -----------*----------------*---सुनीता रानी राठौर------

Monday, 20 January 2020

खुमार -ए -क्रश

 चढ़ा खुमार जो क्रश का,
परवाने से वे लगने लगे ।
रंगीन लगने लगी दुनिया
पर रिश्ते नागवार लगने लगे।

आधुनिकता का रंग चढ़ा ,
निगाहबां नाचीज़ लगने लगे ।
जिन्हें हमने जीवन दिया,
हमें वे ही नांदा समझने लगे ।

आंखों के तारे हीं अपने, 
आंख आज दिखाने लगे ।
परिपक्व अनुभवी सोच को ,
घटिया स्तर का बताने लगे।

कैसे समझाऊं वो नासमझो ,
 ना यूं ही धूप में बाल सफेद हुए ।
संघर्षरत चल जीवन पथ पर ,
 हैं पाए हमने अनुभव कड़वे ।

पले -बढ़े हम उन संस्कारों में ,
जहां तजुर्बे को तरजीह मिला ।
बीजांकुर को पौधा बनने में ,
सिंचित जल सिक्त स्नेह मिला ।

जहां विश्वास भरे गंगाजल में,
 निस्वार्थ अपनत्व व प्रेम मिला ।
सजाया हर लम्हों को ख्वाबों में 
हर अरमां  सूरज चांद दिखा ।

 अनमोल संबंधों के आशियाने की,
   ना कीमत समझे नवयुवा ।
 क्या हासिल कर ली पढ़कर डिग्री ,
हर उसूल उसे दकियानूसी लगा ।

क्षणिक आकर्षण में बंधा हृदय ,
करे वादे चांद तारे तोड़ लाने का ।
 सुहाना सुहाना सा लगे प्रेम डगर ,
उम्र है उल्फ़त में खो जाने का ।

चलो माना हमने वो भी सही ,
फलसफा उम्र का तकाजा है।
 पर क्यों दुत्कारते हो उसे ,
जिसने तेरे व्यक्तित्व को तराशा है ।

तराशा है कंक्रीट पत्थरों से,
 खुद के ख्वाबों को मार कर ।
जिंदा किया तुममें नयी हसरतें ,
तुझे खड़ा कर इस मुकाम पर ।

अदम्य साहस था जो हृदय में,
समंदर के लहरों से टकराने का ।
अपनों ने ही बिखेर डाले ,
विश्वास भरे सुर तराने का ।

 चिराग -ए- नूर देख बुने सपने ,
अनिवर्चनिय आहलाद पाने का।
संवेदनाएं उमराती रही वेग से ,
दिवास्वप्न मन को भरमाने का ।

जो ऊंगली पकड़ चलना सिखाये,
वो खुद को ठगा महसूस किया ।
भावनाओं के उमड़ते सैलाब में ,
गोता खाते भंवर में उतराता दिखा ।

ममत्व भरे आंचल के छांव में ,
बदजुबानी को भी पनाह मिला ।
मां का संस्कार व शिक्षा ,
शांत -रुदन सिसकता दिखा ।

मुरझाए फूलों की पंखुड़ियों सा ,
वात्सल्य प्रेम नौशाद दिखा ।
क्रश रुपी क्षणिक आकर्षण में ,
अटूट रिश्ता स्याह होता दिखा ।
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                       सुनीता रानी राठौर



Wednesday, 15 January 2020

वाह रे ! मेरा स्मार्ट इंडिया


व्यंग्यात्मक रचना
वाह रे ! मेरा स्मार्ट इंडिया
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अक्षरों से जब हुई पहचान,
किताब पढ़ी मिला ज्ञान
जाति-पॉति से बड़ा धर्म है,
धर्म-धान्य से बड़ा कर्म है।
झेली हकीकत तो हुई वाकिफ
जात-पात ही मुख्य परिचय पत्र है।
थी " सरनेम" के खिलाफ बचपन से
था जुनुन पहचान बनाना कर्म से ।
पर हुई बड़ी जैसे-जैसे
घूमी देश का कोना-कोना ।
परिदृश्य वही चहूँ ओर दिखा ,
मानसिकता सबका एक समान ।
है अपवाद एन आर्ट वर्ल्ड
जहाँ नहीं पूछते जातिगत आधार ।
वरना ईक्कीसवी सदी का क्या बताऊँ हाल?
कॉलेज हो या ऑफिस या कोई सभा स्थल,
अशिक्षित को छोड़ें जनाब शिक्षित भी
पूछते परिचय में--बेतुका सवाल ।
मैडम क्या है " सरनेम" आपका ?
दिया मैंने भी हंसकर जबाब----
करेंगें दोस्ती "सरनेम" जानकर
या करेंगेै रिश्ता मेरे घर पर ।
मिला Ph. D.होल्डर जनाब का जबाब
पूछती है दुनिया यूं ही,पूछ लिया मैंने भी यूं ही ।
Educated लोगों का अनूठा ज्ञानपीपासा
देखिए पकड़ते हैं कैसे नब्ज आपका
किस category से belong करते हैं आप
Gen. ,OBC.,या,या ,या---
उनके नजरिये को समझी धीरे धीरे
हकीकत से वाकिफ हो गई धीरे-धीरे ।
ऑसमाँ से उतर कर आ गई धरती पर ।
इक्कीसवीं सदी में भी" सरनेम"ही है परिचय पत्र । उद्घघोषणा न हो जब तक सरनेम का ।
कुलबुलाते रहते हैं कीड़े उनके अंतर्मन का ।
सद्व्यवहार, इंसानियत या मानवता,
हैं कोरी कागजी बातें नहीं दिखती नैतिकता ।
जनाब को निकलवानी हो आपसे काम ।
करेंगे आपके आचरण का बखान
अन्यथा"सरनेम" अनुसार मान सम्मान ।
समझ लें खिले,मुरझाए चेहरे का भाव देखकर,
वैसे ही जैसे मेजबान करतेे मेहमान का सत्कार ।
अध्ययनरत हो या दे रहे हो कहीं साक्षात्कार
तवज्जो, अहम रोल जातिवाद रुपी सरनेम का ।
अहमियत जान लुफ्त उठाते हैं राजनेेता
देखना परिदृश्य चुनाव के दरमियाँ ।
महिमामंडित करते चरण पखाड़ ,
सरनेम देख देते गरिमामयी पद प्रदान ।
वाह रे मेरा स्मार्ट इंडिया
अतुलनीय है आचार विचार ।
होता है देख मन अचंभित
देशवासियों की बाह्य धारणा ।
ढले हैं Western culture में भले सभी।
फर्राटेदार बोल अंग्रेजी, पहन कर जीन्स टॉप ।
विचार हमारे वही पुरातन
हृदय में जातिगत संस्कार ।
हम जन्में ब्रह्मा के मुख से
वो जन्में हैं जांघ से ।
सोच हमारी वहीं अटकीं
कुपमण्डुक कहूं या पुरातन काल ।्
Smart बन जाए भले ही इण्डिया ,
पर "सुनीता"जियेंगे सदैव भारतीय विचार ।
वाह रे ! मेरा स्मार्ट इंडिया।
अतुलनीय है आचार विचार ।
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- सुनीता रानी राठौर