Friday, 25 September 2020

क्या जीवन का बहाव झरने की तरह होना चाहिए?

क्या जीवन का बहाव झरने की तरह होना चाहिए?
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अवश्य, जीवन का बहाव झड़ने की तरह ही होना चाहिए। जीवन को झड़ने की उपमा भी दी जाती है। जिस तरह से झरने का पानी अविरल गति से पत्थरों से टकराते हुए पेड़ो और जंगलों में निरंतर प्रवाहित होते रहता है ठीक उसी तरह से हम अपने जीवन में गति, स्फूर्ति और लगन के साथ संघर्षों से टकराते हुए आगे बढ़ने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
       जीवन में तरह-तरह के अवरोध उत्पन्न होते रहते हैं। सुख-दुख का मिश्रण हीं जीवन है। अगर हम मुश्किलों से घबराकर या उदास होकर हार मान जाएं तो हमारा जीवन जमे हुए पानी की तरह बदबू दायक हो जाएगा। अविरल धारा की तरह अगर हम बहते रहें तभी हमारा जीवन सार्थक होगा।
      जिस तरह से झरने का पानी ऊंचाइयों से नीचे गिरते हुए भी अविरल धारा में प्रवाहित होता है ठीक उसी तरह से हम संघर्षों से गुजरते हुए अपने जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास करते हैं और करते रहना ही चाहिए।
निरंतर गतिमान बने रहना ही सफल जीवन का द्योतक है। प्रकृति प्रदत वस्तुओं से हमें संदेश  मिलता है कि हमें भी जीवन में निरंतर कठिनाइयों को झेलते हुए अग्रसर रहने का प्रयास करना चाहिए।
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                 सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या विचार और भाव में अंतर हो सकता है?

क्या विचार और भाव में अंतर हो सकता है?
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विचार और भाव में अन्योन्याश्रित संबंधित है।
हमारे हृदय में जैसे विचार आते हैं उसी के अनुसार भाव उत्पन्न होते हैं। बिना विचार के भाव नहीं उत्पन्न हो सकता। भाव का संपूर्ण क्षेत्र विचार का क्षेत्र है।
विचार एक आंशिक घटना है जो हमारे मस्तिष्क में चलती है। भाव एक सर्वांग घटना है जो पूरे अस्तित्व में गूंजी जाती है।
 विचार हमारे समग्र व्यक्तित्व को ओतप्रोत नहीं करता सिर्फ दिमाग में घूमता है, विचार कागज की नाव की तरह मस्तिक सतह पर डोलता रहता है जबकि भाव सर्वांग अवस्था है। जैसे ही प्रभु के संबंध में भाव उत्पन्न होते हैं तब रोम-रोम तन-प्राण सब भाव से भर जाता है। 
 भाव यानी समग्रता,भाव यानी सर्वांगीणता।
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                   सुनीता रानी राठौर
                    ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या हम सब एक मात्र परमात्मा के अंश हैं ?

क्या हम सब एक मात्र परमात्मा के अंश हैं ?
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जी हां, नि:संदेह हम सब एक मात्र परमात्मा के अंश हैं पर अभिमान और अज्ञानतावश हम खुद को धर्म और जाति में बांटकर अपने अंदर अहम भाव को जन्म देते रहते हैं।
 हम ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए वह पैर से पैदा हुआ हम उच्च जाति वो निम्न जाति का ---इस तरह की संकीर्ण मानसिकता द्वारा हम मानवता को कलंकित करते हैं।
 यह जानते हुए भी कि सभी परमात्मा के अंश हैं हम ऊंच-नीच का भेदभाव करते हुए एक-दूसरे के प्रति मन में हीन भाव रखते हैं जो हमारे अहंकार को प्रदर्शित करता है। 
 21वीं सदी में भी भले ही हम आधुनिक कहलाने का दावा करते हैं पर आज भी रूढ़िवादी विचारों से ग्रस्त हैं।
 यही कारण है कि समय के साथ हमें जितना विकास करते हुए विश्व में अग्रणी स्थान बनाना चाहिए था हम नहीं बना पा रहे हैं क्योंकि जाति के कारण इंसान को हर जगह तरजीह नहीं दिया जा रहा। जब तक शीर्षस्थ पद पर बैठे नेता वोट बैंक की राजनीति जाति के आधार पर करते रहेंगे तब तक दूसरे लोग से उम्मीद करना बेकार है।
 जाति के आधार पर किसी को बुद्धिमान मानना और कोई कितना भी पढ़ा लिखा हो बार-बार जाति का जिक्र करके जाति के नाम पर जलील करना--
 अशोभनीय और अमानवीय प्रस्तुत होता है।
 हम सभी परमात्मा के अंश हैं। हर प्राणी के प्रति हमारे हृदय में इंसानियत का भाव होनी चाहिए। अगर हम प्रभु के सच्चे भक्त हैं तो प्रेम और सद्भावना के साथ हमें सभी का आदर और सम्मान करना चाहिए।
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                      सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या फिल्म इंडस्ट्री में ड्रग्स की भूमिका की जांच होनी चाहिए?

क्या फिल्म इंडस्ट्री में ड्रग्स की भूमिका की जांच होनी चाहिए?
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फिल्म इंडस्ट्री में हीं क्यों हर जगह ड्रग्स की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। नामी हस्तियों के साथ हादसा होने पर सरकार जागती है, जांच करने की कवायद शुरू कर देती है वरना सब कुछ जानते हुए भी वह नजरअंदाज किए हुए रहती है।
 ऐसा नहीं कि उन्हें नहीं पता कि कहां पर क्या हो रहा है? पर जब तक किसी बड़े व्यक्ति के साथ कोई हादसा न हो जाए सभी चीजों को नजरअंदाज कर दिया जाता है यह सर्वविदित है।
  नशा का कारोबार कितना फल-फूल रहा है सभी जानते हैं। उस पर कई फिल्में बनाई जा चुकी है।नशा कारोबारियों को रिश्वतखोर पुलिस वालों की और नेताओं की संरक्षण भी मिली रहती है। इसी कारण वे बेखौफ होकर कानून को ठेंगा दिखाते हैं।
  जो समाज के हित में न हो, उन चीजों पर पूरी तरह बैन होनी चाहिए, पर नहीं होता क्योंकि इसके सेवन करने वाले भी बड़ी-बड़ी हस्तियां ही अधिकांश हैं।
   नामी हस्तियों के साथ हादसा होने के बाद सरकार और सीबीआई जागरूक दिखाई देती है, आम इंसानों की यहां पर जान की कोई कीमत नहीं है। जांच एजेंसियां भी खानापूर्ति करती है। जैसे ही बड़े लोगों का नाम सामने आता है। केस फाइल बंद कर दिया जाता है यही हमारे देश की विडंबना है।
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                    सुनीता रानी राठौर
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 17 September 2020

क्या जीवन में परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर है?

क्या जीवन में परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर है?
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 परिवर्तन प्रकृति का नियम है, वही एकमात्र स्थिर और शाश्वत है। जीवन परिवर्तनशील है--इस कारण गहरे दुःख को भी सुख की उम्मीद में भूल जाते हैं, इस विश्वास के साथ की जीवन सदा एक सा नहीं रहता।
  समय के साथ कर्मशील जीवन हमें सुखमय बना सकता है। परिवर्तन को स्वीकार कर हम गतिशील बन सकते हैं।
  जीवन का वास्तविक आनंद भी तभी उठा सकते हैं जब हम समय के साथ चलते हुए जड़ रीति-रिवाजों और पुरानी अवधारणा को छोड़कर समय के अनुकूल नवीनता को अपनाते हुए आगे बढ़ें।
   समय के साथ विषय वस्तु और विचार में स्थितियों के अनुसार बदलाव को ही विकास कहा जाता है। 
   ठहरे हुए जल की भांति अपरिवर्तनशील रहे तो सड़न व बदबू निश्चित है यानी रूढ़िवादिता के कारण हमारी प्रगति अवरुद्ध हो जाएगी।
    जीवन में आगे बढ़ने व सुखमय जीवन के खातिर आचार -व्यवहार को परिवर्तनोंन्मुख बनाना होगा। दुनिया के साथ कदम-ताल मिलाकर चलना होगा क्योंकि परिवर्तन शाश्वत है।
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                   सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या रिश्तों को बनाए रखने के लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है?

क्या रिश्तों को बनाए रखने के लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है?
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जीवन अर्थात सामंजस्य। सामंजस्य स्थापित किए बिना हम कभी भी खुशहाल जीवन नहीं जी सकते। हमें पग पग पर अनेक विचारधारा के लोगों से आमना-सामना होता है।
 परिवार के सदस्यों के भी अपने निजी विचार होते हैं। सभी के विचारों को मान सम्मान देते हुए तादात्म्य संबंध स्थापित करते हुए हम जीवन के सफर में आगे बढ़ते रहते हैं। 
 कभी इच्छानुसार कभी अनिच्छा पूर्वक भी हामी भरनी पड़ती है, क्योंकि उससे अपनों की खुशी जुड़ी होती है।
 कोई जरूरी नहीं कि हम हर पल सही हो, यह भाव मन में रखते हुए हमें अपने विचारों में बदलाव कर सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है।
 प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है --फलों से लदा पेड़ सदा झुका रहता है। लचीली झुकी हुई डाली तेज हवाओं को भी झेल लेती है जबकि अकड़ी हुई डाली हवा के झोंके से टूट जाती है।
  ठीक इसी तरह हमें भी अपने व्यवहारों में लचीलापन रखते हुए पारिवारिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है तभी रिश्तों में मिठास चिरस्थाई बना रहता है। रिश्तों को बनाए रखने के लिए कभी-कभी कुछ सहना भी पड़ता है क्योंकि उसमें अपनों की खुशी छुपी होती है।
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                     सुनीता रानी राठौर
                      ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अपने विचार बदलने से विचारधारा अपने आप बदल जाएगी?

क्या अपने विचार बदलने से विचारधारा अपने आप बदल जाएगी?
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 हर इंसान अपने विचारों की दुनिया में जीता है। अपने विचार बदलने से विचारधारा अकस्मात नहीं बदलती पर धीरे-धीरे बदलाव जरूर आती है। खुद के बारे में और दूसरे को समझते हुए अपनी सोच बदल सकते हैं।
  सोच बदलते ही व्यवहार बदल जाता है और व्यवहार में बदलाव होते ही चीजें बदलने लगती हैं। सामने वाले की मानसिकता को भी थोड़ा बहुत प्रभावित कर बदल सकते हैं।
   अपने मानसिक अवरोधों को पहचानें, उस पर नियंत्रण करें। उन विचारों और विश्वासों पर प्रश्न उठाए जो आपको उचित नहीं लगता या दुख पहुंचाता है।
    सफलता पाने के लिए आपको उसकी उम्मीद करना भी आना चाहिए। खुद को ताकत देकर सकारात्मक सोच के साथ काम करना शुरू कर दें। जब आप निर्णय कर लेंगे तब उसके अनुसार लोगों को समझाते हुए कार्य करेंगे।
     एक कार्ययोजना के साथ आगे बढ़ने पर धीरे-धीरे सफलता मिलती है। उदाहरण स्वरूप- राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को खत्म करने की एक कार्य योजना बनाई और उस पर उन्होंने अमल करते हुए लोगों को साथ लेकर कार्य किया और अंततः उन्हें सफलता मिली।
      इस तरह हम कह सकते हैं कि अपने विचार बदलने से विचारधारा धीरे-धीरे बदल जाती है पर समाज के लोगों के विचारों को बदलने के लिए अथक प्रयास करते हुए संघर्षरत रहना पड़ता है, तदुपरांत लोगों की मानसिकता और विचारधारा को बदलना संभव होता है।
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               सुनीता रानी राठौर
             ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

हिंदी और शिक्षा

             हिंदी और शिक्षा
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गौरव अपने विद्यालय का सबसे होनहार विद्यार्थी था। दसवीं कक्षा तक वह हर बार कक्षा में प्रथम आता रहा। बोर्ड परीक्षा होते हीं उसे प्रतियोगिता परीक्षा की सनक सवार हो गई। मेडिकल की तैयारी के चक्कर में हिन्दी को नजरअंदाज करने लगा।
हमेशा अध्ययनरत रहता पर सिर्फ विज्ञान पर ध्यान देता। ऐसा होनहार विद्यार्थी जो 100 में 98%  अंक प्राप्त करता था वह हिन्दी विषय को बोलचाल की भाषा और आसान समझ कर उस पर मेहनत करना छोड़ दिया। 
 वह यह नहीं समझ पाया कि हिन्दी देखने में जितना आसान है यह विषय उतना ही कठिन है। हिन्दी में मात्रा और अन्य छोटी-छोटी गलतियों के कारण हमारे नंबर बहुत ही कट जाते हैं। हिन्दी के कारण ही हम दूसरे विषय पर भी अपनी अच्छी मजबूत पकड़ बना पाते हैं।
 गौरव की नासमझी का दुष्परिणाम भी यही हुआ।
 11 वीं का परिणाम इतना खराब आया कि वह अपने कक्षा में पांचवें नंबर पर पहुंच गया। उसे बहुत ही ज्यादा दुःख हुआ।
  हिन्दी को बिल्कुल नजरअंदाज करने का वह दुष्परिणाम भुगत रहा था। उसे अपनी हिन्दी अध्यापिका की सलाह बार-बार याद आ रही थी।आज उसे सीना तान कर अपने क्लास में सभी सहपाठियों के बीच में खड़ा होने का मौका नहीं मिला था। उसे बहुत अफसोस था कि मैंने अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को क्यों नजरअंदाज किया।उसके मम्मी-पापा जो प्रथम आने पर रिजल्ट लेने के लिए गर्व के साथ आते थे हर तरफ उसकी तारीफ होती थी आज वह सुनने को नहीं मिला।
   वह प्रायश्चित के भाव से अपनी हिन्दी अध्यापिका से माफी मांगने पहुंचा। उसे समझ में आ गया था कि हिन्दी ही हमारी आधार है , हमारी शिक्षा के नींव को मजबूत बनाती हैं। हिन्दी के बिना हम कहीं भी सफलता नहीं हासिल कर सकते।  हिन्दी को हल्के में न लें, परिश्रम से अच्छे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं और जीवन में भी सफल हो सकते हैं। हिन्दी की अच्छी शिक्षा हमारे लिए आन बान और शान है।
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                 सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अब डिजिटल की भाषा हो गई है हिन्दी?

क्या अब डिजिटल की भाषा हो गई है हिन्दी?
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सोशल मीडिया के हर भाग में हिन्दी के विस्तार प्रचार व प्रसार को देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि अब डिजिटल की भाषा हो गई है हिन्दी।
 कुछ वर्ष पहले तक की-बोर्ड में हिन्दी टाइपराइटिंग की सुविधा न होने के कारण हिन्दी भाषी अपने विचारों को खुलकर हर विधा में व्यक्त नहीं कर पाते थे। सर्वत्र अंग्रेजी का दबदबा दिखता था पर वर्तमान में हिंदी की सभी विधाओं में फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब चैनल पर हिन्दी भाषा में हर तरह के विषय वस्तु मौजूद है। गूगल द्वारा हिंदी में अपने इच्छानुसार प्रत्येक विषय की जानकारी हम प्राप्त कर लेते हैं।
  आज सभी को आगे बढ़ने के लिए हर भाषा के लिए डिजिटल क्रांति एक अवसर बनकर उभरा है। आज हिंदी की की-बोर्ड का ऐप्प विकसित करना व्यवसायिक सफलता बनता जा रहा है। हिंदी में सॉफ्टवेयर निर्माण के लिए थोड़ा जोर लगाने की जरूरत है। वैश्वीकरण के जमाने में सरकार से प्रोत्साहन की उम्मीद है। हिन्दी में सॉफ्टवेयर बनाने के लिए थोड़े से वित्तीय संसाधन और कुछ हिन्दी प्रेमी तकनीकी युवाओं की जरूरत है और हमारे यहां ऐसे होनहार युवाओं की कमी नहीं है।सभी के सहयोग से हम ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं और यह कहना गलत नहीं होगा कि अब डिजिटल की भाषा हो गई है हिंदी।
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                    सुनीता रानी राठौर
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

सकारात्मक सोच सुख का रहस्य


      सकारात्मक सोच सुख का रहस्य
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सकारात्मक सोच का जादू हमें अपने जीवन में प्रायः देखते हैं। सकारात्मक सोच से मन को शांति और सुकून मिलता है। शांति और सुकून ही जीवन का वास्तविक सुख है।
 हमारे जीवन में विचारों का महत्वपूर्ण स्थान है।
 सकारात्मक विचार दूसरों के प्रति प्रेम और सद्भावना को जन्म देती है जबकि नकारात्मक विचार ईर्ष्या और द्वेष। सकारात्मक विचार नकारात्मक की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली होते हैं।
विचार भी संक्रामक होते हैं। सकारात्मक और आशावादी सोच वाले की संगत में हमारे विचार भी सकारात्मक बनते हैं और हमारे विचार आत्मविश्वास से परिपूर्ण होते हैं। इसके विपरीत नकारात्मक सोच वाले के संगत में रहकर हम हमेशा उदास और जीवन से निराश खुद को महसूस करते हैं।
इसलिए कहा गया है कि सकारात्मक सोचें, उसी तरह की रचनाएं पढ़ें, वैसे लोगों की संगत में रहें तब हमारे अंदर serotonin, Endorphins,Dapamine आदि हार्मोन का स्राव होता है जो हमें तनाव से मुक्ति दिलाता है और मन प्रसन्न चित्त रहता है।
  धन दौलत का सुख क्षणिक सुख होता है क्योंकि उसे खोने के डर से मन हमेशा सशंकित रहता है पर मन का सुख चिरस्थाई है जो सकारात्मक सोच से मिलता है। मन हमेशा प्रसन्नचित और आनंदित रहे इससे बड़ा कोई सुख नहीं। वास्तव में सकारात्मक सोच ही सुख का रहस्य है। सकारात्मक सोच का जादू जीवन में खुशियां बिखेरता है।
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                    सुनीता रानी राठौर 
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या 'मां' का मतलब सिर्फ जन्म देने से है?

क्या 'मां' का मतलब सिर्फ जन्म देने से है?
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मां से हमारे अस्तित्व की पहचान होती है। हमारी विशेषताएं, हमारी खूबियां हमारे व्यक्तित्व की पहचान मां से है। मां के विशेषताओं का शब्दों में उद्गार करना भी असंभव है।
मां का मतलब सिर्फ जन्म देना--ऐसा विचार रखने वालों की मानसिक संकीर्णता साफ दृष्टिगोचर होती है। जो मां के ऊपकार को भूल सकता है वह जीवन में किसी का भी अपना नहीं बन सकता।
   मां हमें जन्म देने, पालन- पोषण करने के साथ-साथ हमारे व्यक्तित्व का सम्पूर्ण निर्माण करती हैं। उनके एहसानों का बदला उनका ॠण हम किसी भी कीमत पर कभी भी नहीं चुका सकते।      
   मां के प्रति अपने भाव का समर्पण हम सेवा भाव के द्वारा हीं जता सकते हैं। ईश्वर को किसी ने नहीं देखा ,साक्षात रुप में मां-पिता हीं ईश्वर समान होते हैं जो हमारे लिए वरदान साबित होते हैं।
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                     सुनीता रानी राठौर 
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

पितृपक्ष

🙏 पितृपक्ष🙏
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पितृपक्ष में पूर्वजों के आत्मा को देते तर्पण
अच्छा व्यवहार जीवन में तभी होगा तर्पण।
पूर्वजों के त्याग को याद दिलाता पितृपक्ष,
सम्मान, आदर भाव का पहचान ये तर्प़ण।

हमारे अस्तित्व को बनाए रखता पितृपक्ष,
गलतियों को याद करने का दिन पितृपक्ष।
संस्कारों को बनाए रखने का  ये तरकीब,
अपनों के प्यार का इज़हार होता पितृपक्ष।
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                 सुनीता रानी राठौर
                 ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या बुद्धिमता का पता मनुष्य के व्यवहार से मालूम होता है?

क्या बुद्धिमता का पता मनुष्य के व्यवहार से मालूम होता है?
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जी हां बुद्धिमता का पता मनुष्य के व्यवहार से मालूम होता है। व्यक्ति का दृष्टिकोण या नजरिया उसकी वैचारिक क्षमता व विवेक बुद्धि पर निर्भर करता है। समय के अनुसार किए गए कार्य पर ही सकारात्मक या नकारात्मक छवि बनती है। इसी के आधार पर वो अपने भीतरी क्षमता और दिमागी सक्रियता का इस्तेमाल करता है।
कितनी भी हम डिग्रियां हासिल कर लें पर हमारा व्यवहार सही नहीं है, नैतिक दृष्टि से माननीय नहीं है तो हम बुद्धिमान नहीं कहला सकते। अगर कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी समाज में नैतिकता का परिचय देते हुए सद्व्यवहार करता है तब उसकी बुद्धिमता की तारीफ होती है। पढ़ा-लिखा अहंकारी, नासमझ, दुर्व्यवहार करने वाला व्यक्ति कभी काबिल-ए-तारीफ नहीं होता।
हमारा लोगों के साथ आचार-व्यवहार, कठिन परिस्थितियों में लिया गया निर्णय, विषम घड़ी में सामंजस्य स्थापित करने की चेष्टा आदि ही हमारी बुद्धिमता का परिचायक है। इसलिए कहना असत्य नहीं कि बुद्धिमता का पता मनुष्य के व्यवहार से मालूम होता है।
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                     सुनीता रानी राठौर
                ग्रेटर नोएडा उत्तर प्रदेश

हिंदी हमारी शान


‌।                हिंदी हमारी शान
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    हिंदी हिंदुस्तान की आन बान शान है। प्रतिष्ठा और सम्मान है। यह 18 भाषाओं को समग्रता में समेटती है। हमारी हिंदी भाषा मधुर, मीठी और सरल भाषा है। यह विश्व पटल पर दूसरे नंबर पर प्रचलित भाषा है। 
     हिंद और हिंदी एक दूसरे के पूरक हैं। हिंदी को जनमानस की भाषा भी कहा जाता है। यह भाषा हमारी संस्कृति को परिभाषित करती है। जिस तरह हमारा देश धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनकर अनेकता में एकता का मिसाल पेश करता है उसी तरह 18 प्रांतीय भाषाओं को समेटे हुए हिंदी भाषा सभी को एक सूत्र में बांधती है।
    हिन्दी भाषा को 14 सितंबर 1953 को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया। इसलिए 14 सितंबर को राष्ट्रपति के द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में हिंदी से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों में श्रेष्ठता पूर्ण कार्य के लिए लोगों को सम्मानित भी किया जाता है।  
     हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है और इस पर हम सभी को गर्व है। 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस और 14 सितंबर को राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं। हिंदी हमारी आन बान और शान है।
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                सुनीता रानी राठौर
               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

साक्षरता


               साक्षरता
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  बचपन में ही मां के गुजर जाने के कारण मीनू के पिताजी ने दूसरी शादी कर ली थी। पिताजी पर  सौतेली मां का दबदबा था। मीनू की सौतेली मां सारा दिन घर का काम कराती। दूसरे बच्चे को स्कूल जाते देख मीनू को भी बहुत पढ़ने का मन करता पर उसे स्कूल भेजने के नाम पर मां तरह तरह का बहाना बना देती। इसे पढ़ कर क्या करना आखिर जाना तो है दूसरे घर में, वहां पर भी घर ही संभालना है वगैरह-वगैरह।
   समाजसेविकायें उन्हें साक्षरता के महत्व को बताते हुए बच्ची को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करती पर वह किसी का नहीं सुनती।
    बहुत कम उम्र में ही मीनू की शादी कर दी गयी। मीनू के ससुराल वाले अच्छे नहीं थे। पति भी शराब पीकर पीटा करता। मीनू असहाय लाचार चुपचाप काम में लगी रहती। इसके दर्द और पीड़ा को देखकर के पड़ोसी बोलते-- तुम अपने पैरों पर खड़ी हो जा। क्यों इतना अत्याचार सहती हो?
     पर मीनू जानती थी कि मैं तो पढ़ी लिखी नहीं हूं मैं क्या कर सकती हूं?
     उसके दर्द को देखकर उसके पिताजी को भी तरस आने लगा था और उन्हें भी अब बहुत अपने आप पर ग्लानी महसूस होने लगी थी। 
     वे दुखी थे यह सोच कर कि अगर मैं अपनी बिटिया को साक्षर किए होता तो आज इतना अत्याचार नहीं सहना पड़ता। बचपन में सौतेली मां का अत्याचार झेली और अब अपने ससुराल वालों का।आज अगर यह साक्षर होती तो खुद अपने पैरों पर खड़ी हो सकती थी।
     उन्होंने फैसला किया देर से ही सही पर मैं अपनी बिटिया को अपने पास रख कर पढ़ाई करवा कर उसे साक्षर बनाऊंगा ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके।
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                     सुनीता रानी राठौर 
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अब साबित हो जाएगा कि सुशांत सिंह राजपूत के मौत की मुख्य वजह रिया चक्रवर्ती है?

क्या अब साबित हो जाएगा कि सुशांत सिंह राजपूत के मौत की मुख्य वजह रिया चक्रवर्ती है?
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सुशांत सिंह राजपूत के मौत की मुख्य वजह रिया चक्रवर्ती है या नहीं यह तो अब मिले तथ्यों के आधार पर साबित करना सीबीआई की जिम्मेदारी बनती है या उस आधार पर उस के माध्यम से असली गुनाहगार तक पहुंचना भी सीबीआई का मकसद हो सकता है। असली गुनाहगार पकड़ा जाए यही ध्येय भी होना चाहिए।
परंतु इस केस में दिखाई गई तत्परता से हम सभी इतना समझ गए कि अगर पुलिस और सीबीआई तत्परता से काम करें तो गुनाहगार को शिकंजे में कसने में सालों साल समय नहीं बर्बाद होगा।
  हजारों ऐसे परिवार हैं जिनके बच्चों का हत्यारा बेखौफ होकर कानून को ठेंगा दिखाकर समाज में घूम रहा है।अगर न्याय प्रक्रिया ईमानदारी से काम करें तो लोगों में भय बैठेगा और निर्दयता पूर्ण किसी की हत्या करने से वे डरेंगे। आम जनता के लिए भी    न्याय प्रक्रिया इसी तरह सख्त और विश्वसनीय अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
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                     सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा उत्तर प्रदेश

रिया चक्रवर्ती की अभी तक गिरफ्तारी क्यों नहीं या वह बेकसूर है?

रिया चक्रवर्ती की अभी तक गिरफ्तारी क्यों नहीं या वह बेकसूर है?
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अभिनेता सुशांत सिंह आत्महत्या केस में रिया चक्रवर्ती को गुनाहगार माना गया और उस एंगल से मुंबई पुलिस ने जांच पड़ताल की उसके बाद सीबीआई भी कर रही है, पर जब तक ठोस सबूत हासिल न हो किसी को गिरफ्तार करना नियम के खिलाफ होगा। इस कारण शायद गिरफ्तारी नहीं हो रही।
  सीबीआई की एक अपनी जिम्मेदार छवि है ।जल्दीबाजी में कोई कदम उठाना भी उनके लिए अच्छा साबित नहीं होगा। पूरी जांच पड़ताल के बाद ही साबित हो पाएगा कि रिया चक्रवर्ती बेकसूर है या गुनाहगार।
   अगर गुनाहगार साबित होती है तो गिरफ्तारी संभव है अन्यथा कानून या मानवता के आधार पर किसी के जिंदगी पर गिरफ्तारी का धब्बा लगाना भी उचित नहीं होता। इसलिए सीबीआई भी  फूंक फूंक कर कदम रख रही है।
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                            सुनीता रानी राठौर
                           ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

रेलवे का निजीकरण


           रेलवे का निजीकरण
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किसी क्षेत्र या उद्योग के स्वामित्व को जब सरकारी हाथों से लेकर निजी हाथों में सौंपा जाता है तब निजीकरण कहलाता है।
 भारतीय रेलवे को केंद्र सरकार सार्वजनिक कल्याण को बढ़ाने के लिए चलाती है ना कि लाभ कमाने के उद्देश्य से। 
 वर्तमान में इस ट्रेनों का रेगुलेशन और मैनेजमेंट इंडियन रेलवे ही करता है लेकिन अब मैनेजमेंट का काम प्राइवेट प्लेयर्स के हाथ में चला जाएगा। भारत सरकार ने इंडियन रेलवे के निजीकरण की दिशा में कदम उठाते हुए 109 रोड पर 151 यात्री से चलाने के लिए प्राइवेट पार्टी को इनविटेशन दिया है।
 इसकी शुरुआत हाल के दिनों में पूर्ण रुप से निजी कंपनी द्वारा चलाई गई तेजस एक्सप्रेस से हुई है जिसमें दिए गए सुख-सुविधाओं में लोगों को प्रभावित किया है। 
 इस निजीकरण के पीछे भारतीय रेलवे का उद्देश्य रेलवे को लेटलतीफी से छुटकारा दिलाना यात्रियों की सुरक्षा बढ़ाना, यात्रियों को विश्वस्तरीय यात्रा का अनुभव प्रदान कराना और सभी यात्रियों को कंफर्म टिकट उपलब्ध कराना है।
  भारत में 33% पैसेंजर गाड़ियां समय पर नहीं चलती हैं। ट्रेनों के सुचारू रूप से परिचालन के कारण समय की काफी बचत होगी। ट्रेन के अंदर बेहतर सुख सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। साफ-सफाई बेहतर होगी। निजीकरण द्वारा इन्हें पूरा करवाना मुख्य उद्देश्य भी है।
 परन्तु निजीकरण के नुकसान को अगर महसूस करें तब यह भी कटु सत्य है कि निजी कंपनियों का मुख्य उद्देश्य पैसा कमाने का होता है। रेलवे को भी ये उसी नजरिए से देखेंगे और प्रयोग करेंगे।
     निजीकरण का सबसे बुरा प्रभाव रेलवे के किरायों में बढ़ोतरी का होगा जिसे गरीब और मध्यम वर्ग बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।
    दूसरा सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियां खत्म होगी क्योंकि निजी प्लेयर्स कम लोगों से ज्यादा काम करवा कर  अधिकतम लाभ कमाना पसंद करेंगे।
 निष्कर्षत:कह सकते हैं कि रेलवे का निजीकरण ठीक वैसा ही परिणाम लाएगा जैसा कि सरकारी और निजी स्कूलों के बीच है।सरकारी स्कूल की स्थिति अच्छी नहीं है और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना गरीब जनता के लिए संभव नहीं है।
   इन मुख्य बातों को ध्यान दिए बगैर भारत सरकार यदि रेलवे का निजीकरण करती है तो यह गरीब तबके और बेरोजगार युवाओं के लिए सबसे बुरा होगा। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए सरकार द्वारा उठाया यह कदम है पर देश की अर्थव्यवस्था को इस निजीकरण से फायदा कराने के लिए सरकार को इतनी बड़ी जनसंख्या का नुकसान नहीं करनी चाहिए।
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                   सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या निर्भीक होने का मतलब आक्रमक होना है?

क्या निर्भीक होने का मतलब आक्रमक होना है?
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निर्भिक होने का मतलब आक्रमक होना नहीं होता है। निर्भीक का अर्थ साहसी, निडर, आत्मविश्वासी के रूप में लिया जाता है।आत्मविश्वास से पूर्ण व्यक्ति निर्भीक होकर अपना निर्णय लेता है, हर कार्य को पूर्ण करता है। अपने व्यक्तित्व का प्रदर्शन करता है जबकि आक्रामकता कुंठा के रूप में प्रदर्शित एक सामान्य प्रक्रिया है।
   आक्रामकता मौखिक भी होती है और शारीरिक भी। व्यक्ति ईर्ष्या, द्वेष व कुंठा से ग्रसित होकर आक्रामक व्यवहार करते हुए अभद्र भाषा का व्यवहार करता है कभी शारीरिक रूप से आक्रमक होते हुए हमलावर हो जाता है।
सकारात्मक पक्ष में आक्रमक होना कभी-कभी खिलाड़ियों के संदर्भ में प्रस्तुत होता है। जैसे- अपने हार को जीत में बदलने के लिए आक्रामक रूप अख्तियार कर वे कठिन परिश्रम करते हैं और जीत हासिल करते हैं।
     निर्भीक शब्द सदैव सकारात्मक रूप में प्रयोग होता है जबकि आक्रामक शब्द नकारात्मक रूप में। आक्रामक व्यवहार बोलचाल या आचरण सदैव निंदनीय होता है। ये किसी के हित में नहीं होता जबकि निर्भीक होना सदैव लाभकारी और हितकर होता है। निर्भीक होने पर हम सदैव आगे बढ़ने को तत्पर रहते हैं और हमें सफलता प्राप्त होती है।
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                     सुनीता रानी राठौर 
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

चरित्रवान शिक्षक कैसे तैयार होंगे?

चरित्रवान शिक्षक कैसे तैयार होंगे?
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शिक्षक वह पथप्रदर्शक होते हैं जो हमें किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं। शिक्षक को ईश्वर तुल्य माना जाता है।
    आज भी बहुत से शिक्षक शिक्षकीय आदर्शों पर चलकर एक आदर्श मानव समाज की स्थापना में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
शिक्षक समाज में उच्च आदर्श स्थापित करने वाला व्यक्तित्व होता है। शिक्षक विद्यार्थी का जीवन गढ़ते हैं। मार्गदर्शक बनकर समाज को भी राह दिखाते हैं। इसलिए शिक्षक को 'समाज का शिल्पकार' भी कहा जाता है।
   वर्तमान समय में कुछ शिक्षक ऐसे हैं जो शिक्षा को व्यवसाय बनाकर शिक्षक के नाम पर धब्बा लगा रहे हैं। चरित्रवान शिक्षक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका हमारी शिक्षा नीति की भी होती है अगर उच्च मूल्य स्थापित करने वाली शिक्षा नीति हो तो शिक्षक भी चरित्रवान बनेंगे। 
      आर्थिक, सामाजिक,सांस्कृतिक विकास के साथ ही साथ शिक्षक का चरित्र निर्माण भी देश की शिक्षा नीति पर निर्भर होता है। शिक्षक प्रशिक्षण काल में उन मानवीय गुणों पर आधारित पाठ्यक्रम हो जिसमें उनके अंतर्मन में ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, लालच ,अहंकार पक्षपातपूर्ण रवैया आदि दुर्गुणों का निराकरण और समभाव, सद्भावना, परोपकार, दया, सहानुभूति आदि मानवीय गुणों का समावेश हो। इस तरह के प्रशिक्षण के द्वारा ही उनके हृदय में नैतिक भाव का समावेश होगा और वे अनैतिक कार्यों से दूर रहेंगे। वह अपने धर्म को ईमानदारी पूर्ण तरीके से निभा सकेंगे। चरित्रवान शिक्षक के रूप में आदर्श बनकर विद्यार्थियों के पथ प्रदर्शक बनेंगे।
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                     सुनीता रानी राठौर 
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

हमारे जीवन में शिक्षक का महत्व


          हमारे जीवन में शिक्षक का महत्व
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हमारे जीवन में व्यक्तित्व को संपूर्णता प्रदान करने में शिक्षक का महत्वपूर्ण योगदान होता है। प्रथम गुरु माता-पिता सही मार्गदर्शन करते हुए हमें विद्यालय भेजकर अलग-अलग विषयाध्यापक के द्वारा ज्ञानार्जन प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
    विद्यालय में शिक्षक मार्गदर्शक बनकर सही राह दिखाते हैं। हमारे हृदय की अज्ञानता को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश भरते हैं। शिक्षक हीं हमें अच्छा  इंसान और देश का कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनाते हैं।
     शिक्षक देश के कर्णधार और बच्चे भावी कर्णधार होते हैं। देश का भविष्य उनके हाथों में होता है। वो भावी कर्णधार को बुद्धिजीवी बनाकर सक्षम बनाते हैं। ज्ञान का दीप जला कर सत्य-सत्य, नैतिक-अनैतिक का पहचान कराते हैं। अगर हमारे जीवन में शिक्षक न हो तो हम अज्ञानी रह जाएंगे। विवेकशील प्राणी नहीं बन पाएंगे, परंतु सिर्फ विद्यालय के शिक्षक या द्रोणाचार्य जैसे ऋषि ही सिर्फ गुरु नहीं कहलाते हमारे जीवन में राह चलते बड़े बुजुर्ग या बच्चे जो भी सही ज्ञान दें वह हमारे ह्रदय में गुरु का सम्मान पाते हैं।
      जीवन को गुणों से परिपूर्ण बनाने वाले शिक्षकों के महत्व का जितना गुणगान किया जाए उतना कम है। इसलिए हम 5 सितंबर को भले ही शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं पर प्रतिदिन प्रति पल उनका आभार जताते हुए श्रद्धा से नतमस्तक रहते हैं।
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                   स्वरचित मौलिक रचना
                    सुनीता रानी राठौर 
                    ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

कड़ी मेहनत का परिणाम भी बुरा होता है ?

कड़ी मेहनत का परिणाम भी बुरा होता है ?
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 हम बचपन से ही सुनते आए हैं कि कड़ी मेहनत से ही सफलता मिलती है और यह बात सत्य भी है पर कभी-कभी कड़ी मेहनत के बावजूद भी सफलता नहीं मिलती। इसका मुख्य कारण यह होता है कि हम मेहनत लक्ष्य के अनुसार सही दिशा में नहीं करते।
  सही समय पर सही दिशा में प्रयास करना ही सार्थक होता है। जब तक हम स्मार्ट वर्क को हार्ड वर्क से नहीं जोड़ेंगे तब तक सफलता हमसे दूर रहेगी।
   समय और हालात पर नजर रखते हुए कार्य करें। बिना सोचे समझे कड़ी मेहनत न करें। उदाहरण स्वरूप ऐसा न हो कि दूसरे को देखकर हमें भी मेडिकल लाइन में जाने की तमन्ना जाग उठी जबकि बायोलॉजी हमारे समझ से बाहर है। ऐसे में कड़ी मेहनत भी निरर्थक साबित हो सकती है। भेड़-चाल में न चल कर अपनी रुचि, काबिलियत और क्षमता के अनुसार ही अपना लक्ष्य निर्धारित करें, तभी आपको मेहनत का परिणाम सफलता के रूप में मिलेगा और आपके सपने भी पूर्ण होंगें।
-------------*--------- सुनीता रानी राठौर
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

कोरोना काल में आपने क्या सीखा है?

कोरोना काल में आपने क्या सीखा है?
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 कोरोना काल में जीवन की क्षणभंगुरता को महसूस कर कम साधन में सादगी पूर्ण जीवन जीना सीखा। हृष्ट पुष्ट स्वस्थ्य संपन्न व्यक्ति  खुद को, अपने परिवार के सदस्यों को नहीं बचा पा रहे, मौत का भयावह मंजर देख इंसान के बेबसी को महसूस किया।
  स्वास्थ्य कर्मियों के साथ -साथ दाह संस्कार करवाने तक और साथ ही दूसरे धर्म के लोग जिस तरह से (जिनके अपने बच्चे साथ नहीं दिए )उनका साथ निभाते हुए इंसानियत का परिचय दिया उसे देख कर मानवता को निभाना सीखा। 
  साफ सफाई पर गंभीरता से ध्यान देना सीखा।ऑनलाइन पढ़ाई के साथ-साथ ऑनलाइन कार्यक्रम देना और प्रतियोगिता में प्रतिभागी बनना सीखा।
  सालों साल कंपनियां घर से अपना कार्य सुचारु रुप से जारी रख सकती है यह भी देखा और सीखा।
   चुनाव प्रचार के लिए वर्चुअल रैली का भी ज्ञान मिला।  ऑनलाइन खरीदारी करना सिखा। शादी पर जो फिजूलखर्ची होती थी वह कम खर्चे में सादगी पूर्ण तरीके से किस तरह कराई जा सकती है यह भी सीखने को मिला।
   साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बात पहली बार घर के सदस्यों को एक साथ रहने का मौका मिला जिससे पुरुष वर्ग के लोग और कामकाजी बेटियों को तरह-तरह के व्यंजन बनाना सिखाया और बच्चों के सहयोग से यूट्यूब के द्वारा हमने भी तरह-तरह के साज सज्जा के साथ नये व्यंजन बनाना भी सीखा और साथ ही तरह -तरह के विषयों से संबंधित ज्ञानार्जन भी की किए।
   इस तरह से समय का सदुपयोग करते हुए विविध चीजों का ज्ञान प्राप्त कर हमने अपने जीवन को गुणों से सुसज्जित कर व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास किया।
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                       सुनीता रानी राठौर 
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

रिया चक्रवर्ती वी.आई.पी है या कुछ और

रिया चक्रवर्ती वी.आई.पी है या कुछ और --
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रिया चक्रवर्ती वी.आई.पी मीडिया द्वारा बना दी गई। पल-पल की पूछताछ की खबरें और आने-जाने का वीडियो दिखा कर मीडिया हाईलाइट करती रही।
  मीडिया दूरदराज गांव में घूमकर कोरोना महामारी से संबंधित या बाढ़ में पीड़ित लोगों का न्यूज़ कवर नहीं कर सकती , न हीं वर्तमान हालातों पर नेताओं की खामियों को दिखाने की हिम्मत जुटा सकती इसलिए अपनी खामियों को छुपाने के लिए एक न्यूज़ को रगड़ते रहती है।
   अगर नेता और मीडिया इतने ही इंसाफ दिलवाने वाले हैं तो और भी खून के आंसू रोने वाले दुखियारी मां-बाप के दर्द के प्रति सहानुभूति दिखाकर अपना साथ देते हुए आवाज उठाकर इंसाफ दिलवाये। जनता में विश्वास जमेगा। एक उम्मीद जागेगी की ये कर्तव्यनिष्ठ मीडिया अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाती है। बड़ी-बड़ी मछलियां बेदाग बच जाती हैं। छोटी मछलियों को पकड़कर पुलिस वाले और मीडिया शोर मचाते रहते हैं और वाहवाही लूटते रहते हैं।हमें बहुत खुशी होगी कि वास्तविक अपराधी पकड़ा जाए और और परिवार को न्याय मिले।
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                       सुनीता रानी राठौर
                    ग्रेटर नोएडा(उत्तर प्रदेश)

गरीबी कम करने में नारियल का महत्व


       गरीबी कम करने में नारियल का महत्व
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   विश्व नारियल कोकोनट- डे और ओणम पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
       नारियल का पेड़ समुद्री किनारे पर ज्यादातर मात्रा में पाए जाते हैं क्योंकि वो वातावरण नारियल-पेड़ के लिए अनुकूल होता है। केरल जहां ओणम का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है वहां नारियल के पेड़ बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं।
       गरीब जन नारियल के पेड़ और फल का तरह- तरह से उपयोग करते हुए अपने स्तर पर व्यापार कर अपनी रोजी-रोटी का साधन जुटा लेते हैं। गली-गली नारियल बेचकर आमदनी का स्रोत बना लेते हैं।
      नारियल का पेड़ हो या नारियल का फल सब खूबियां बटोरे हुए है। हर तरह से इसका इस्तेमाल होता है। नारियल का सूखा पेड़ नाव बनाने में,पत्ते झाड़ू, चटाई बनाने में, तरह-तरह के सजावटी सामान बनाने में बखूबी इस्तेमाल होता है।
      इसी तरह कच्चा नारियल पानी पीने में, पक्का नारियल मंदिर पूजन के साथ-साथ स्वादिष्ट मिठाई  तेल आदि बनाने में प्रयोग होता है। नारियल से बने सामानों का प्रचुर मात्रा में निर्यात भी होता है। जहां पर नारियल ज्यादा मात्रा में होता है वहां के गरीब व्यक्ति भी छोटे- छोटे व्यापार कर अपनी स्थिति को अच्छी बना लेते हैं। 
      कम पैसे में व्यापार की शुरुआत कर प्रसिद्ध व्यापारी बनने में भी नारियल का बहुत योगदान होता है। इसलिए कहा गया है कि गरीबी कम करने में नारियल का बहुत महत्व है।
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               सुनीता रानी राठौर 
               ग्रेटर नोएडा उत्तर प्रदेश

क्या जीवन का मूल मंत्र सहनशीलता है?

क्या जीवन का मूल मंत्र सहनशीलता है?
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 जीवन के मूल मंत्र में धैर्य, संयम, , सहनशीलता,परोपकार दया भाव, दक्षता आदि मुख्य हैं।
   सहनशीलता मनुष्य का आभूषण है।
सहनशीलता व्यक्तित्व का सबसे उत्कृष्ट गुण है। जिस व्यक्ति में सहनशीलता नहीं वह विपरीत परिस्थितियों में टूट जाता है। अगर व्यक्ति में सहनशीलता का भाव न हो तो उसे कई बार अप्रिय स्थितियों से गुजरना पड़ता है। इसके अभाव में व्यक्ति में क्रोध पैदा होता है। क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
उत्तम चरित्र के निर्माण में सहनशीलता एक आधारस्तंभ है। समाज में हो रही हिंसक घटनाएं सहनशीलता के अभाव में जन्म ले रही है। किशोर युवा सहनशीलता के अभाव में आक्रामक हो खून खराबा कर रहे हैं और गलत मार्ग पर भटक रहे हैं।
   हमें पारिवारिक जीवन में भी यही सिखाया जाता है कि संवेदनशीलता और सहनशीलता सफल जीवन का मूल मंत्र है। यह मन का सबसे बड़ा उपहार है क्योंकि यही हमें पशुओं से अलग करता है और हम एक आदर्श समाज की परिकल्पना करते हुए सामाजिक प्राणी के रूप में सभी से मिलजुल कर रहते हैं।
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                       सुनीता रानी राठौर
                        ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अंग्रेजी जरूरी आजकल ?


        क्या अंग्रेजी जरूरी आजकल ?
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जिस तरह हमारा देश धर्मनिरपेक्ष देश है। सभी धर्मों को साथ लेकर चलता है ठीक उसी तरह हमारी हिंदी भाषा भी अनेक भाषाओं का सम्मिश्रण है पर वर्तमान में हिन्दी के बाद अंग्रेजी को प्राथमिकता ज्यादा दी जा रही है।
 अगर हमें कूपमंडूक बन कर नहीं रहना है तो हमें  हिन्दी के साथ-साथ अन्य भाषाओं को अहमियत देना भी चाहिए विशेषकर अंग्रेजी को। अगर हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी का भी ज्ञान हो तब हम अपने देश के सभी प्रांत और साथ ही विदेशों में भी दूसरों से संपर्क स्थापित कर पायेंगे और विविध ज्ञान अर्जित कर पायेंगे।
मैं महात्मा गांधी के इस विचार का पूर्ण समर्थन करती हूं ---अपने घर की खिड़की सदा खुली रखें स्वच्छ हवा आने दें प्रदूषित हवा आए तो बंद कर दें।
  तात्पर्य यह कि अगर हमें अच्छे गुण सीखने को मिलते हैं जिससे हमें फायदा हो रहा हो तो हमें बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
     हिन्दी में अंग्रेजी शब्द का प्रयोग करने की जहां तक बात है वह भी समय की मांग है क्योंकि कुछ-कुछ हिंदी शब्द इतने जटिल और दीर्घ होते हैं कि उसका उच्चारण करना आसान नहीं होता उसके जगह अंग्रेजी शब्द छोटा और आसान होता है। 
     जैसे--रेल का हिंदी शब्द---लौह पथ गामिनी और रेलवे स्टेशन का हिंदी अर्थ-- लौह पथ गामिनी विराम बिंदु आदि।
     हमारे हिंदी भाषा में अंग्रेजी, उर्दू ,फारसी, तुर्की इतने अन्य भाषा मिश्रित हैं कि हम कभी-कभी पहचान ही नहीं पाते कि हम हिंदी बोल रहे हैं या उर्दू ।
     जिस तरह हमारा देश विविधता में एकता की पहचान है ठीक उसी तरह हमारी हिंदी भाषा भी विविधता में एकता की पहचान है।
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              सुनीता रानी राठौर
               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या दुश्मन को भी दोस्त बनाना एक कला है?

क्या दुश्मन को भी दोस्त बनाना एक कला है?
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दुश्मन को दोस्त बनाना वास्तव में एक बेहतरीन कला है। अपने सद्व्यहारों एवं नैतिक आचरण द्वारा हम दुश्मन का भी दिल जीत सकते हैं, उनका हृदय परिवर्तित कर सकते हैं और अपना खास दोस्त बना सकते हैं। ऐसी दोस्ती अमिट होगी।
   कोई भी इंसान न जन्मजात दोस्त होता है ना ही दुश्मन। हम अपने व्यवहार और कार्य के द्वारा दोस्त बनाते हैं और किसी को दुश्मन।
  अगर हम अपनी गलतियों को महसूस कर स्वीकार करें, उसके लिए क्षमा मांग लें तो सामने वाले विरोधी का भी हृदय द्रवित हो जाता है और वह भी अपने अक्कड़पन को त्याग अपनी खुद की खामियों को महसूस करने लग जाता है और वह दुश्मन भी दोस्त बन जाता है।
   अहं,आन और जिद  इंसान के पथ का रोड़ा है।  इसे त्यागकर विचार-विमर्श कर दुश्मन को दोस्त बना सकते हैं पर यह भी सबके वश की बात नहीं है क्योंकि यह भी एक कला है।
    महात्मा गांधी अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपने व्यवहार से विरोधियों के चहेते बन गए और यही कारण है अफ्रीका से लेकर अन्य देशों में भी श्रद्धा पूर्वक उनकी प्रतिमा लगाई जाती है। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे समाज में विद्यमान हैं।
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             सुनीता रानी राठौर
       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

अपनी सफलताओं से खुश रहना कैसे सीखें?

अपनी सफलताओं से खुश रहना कैसे सीखें?
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    खुश रहना जीवन का चरम पहलू नहीं बल्कि बुनियादी पहलू है। मन आत्मविश्वास से भरा हो तब हम सदैव कुछ न कुछ नए कार्य करने के लिए जागरूक रहते हैं और हमें सफलता भी प्राप्त होती है हमारा मन भी प्रसन्नमय रहता है।
     आत्मविश्वास एक ऐसी चीज है जिस में खुशियां या कहें सफलता चुंबक की तरह खिंची चली आती है और हमें आनंद प्राप्त होता है।
      जीवन में घटित घटनाओं के सकारात्मक पहलू पर अगर आप ध्यान दें तो खुशियां प्राप्त होती हैं। जीवन में हमेशा कुछ न कुछ नया क्रिएटिव करते रहें। स्पेशल कुछ खास कार्य करने को सोचें। खुशियां आपकी ओर अट्रैक्ट होती जाएंगी और आप खुश रहेंगे।
       हमेशा अपने चेहरे पर स्माइल रखें। माहौल खुशनुमा रहेगा। नकारात्मक सोच, बुराई या बदले की भावना आदि विचारों से दूर रहें। अपने परिवार में खुशियां बांटे। मिलजुल कर बाहर घूमने जाएं। पारिवारिक झंझटों से थोड़ी देर मुक्ति पाकर आनंद लें। मधुर संगीत सुनें। छोटी-छोटी सफलता पर खुश मिजाज रहें। तभी बड़ी सफलता पास आएगी।
        हमेशा खुद पर और ईश्वर पर विश्वास रखें। समयानुसार ईश्वर से प्रार्थना और मेडिटेशन जरूर करें। आप हमेशा प्रसन्नचित्त रहेंगे।
        निर्णय लें छोटी सी जिंदगी है दुखी रह कर खराब नहीं करना है। हर दिन सुबह उठते हीं ठान लें, मुझे खुश रहना है और आज नया कार्य करना है। हमेशा अपनी मंजिल की तरफ एक कदम बढ़ाए इससे आपके हृदय में हमेशा प्रसन्नता भरी रहेगी।
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                    सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)