Sunday, 1 November 2020

क्या मजहबी कट्टरता की आड़ में बेकसूर लोगों की हत्या उचित है?

क्या मजहबी कट्टरता की आड़ में बेकसूर लोगों की हत्या उचित है?
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मजहबी कट्टरता की आड़ में बेकसूर लोगों की हत्या कभी उचित हो ही नहीं सकती। बचपन से ही हम सभी पढ़ते आये हैं --
'मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना'--
 पर वर्तमान में जो दृश्य हमें देखने को मिल रहा है मजहब के नाम पर जो हिंसा, उन्माद फैलाया जा रहा है वह मानव हित में नहीं है।
 कोई भी धर्म कभी भी खून खराबा करना नहीं सिखाती। सभी धर्म हमें भाईचारा, प्रेम का संदेश देती है पर कुछ स्वार्थी तत्व धर्म के नाम पर माहौल बिगाड़ कर अपरिपक्व बच्चों को बरगला कर जो अशांति फैलाते हैं वह धर्म के नाम पर धब्बा है इंसान कहलाने लायक ही नहीं।
 यह मानव के वेश में छुपे हुए भेड़िए हैं जो शांति भंग कर अपनी तुच्छ प्रवृत्ति को पूर्ण करना चाहते हैं। नवयुवाओं को बरगला कर उनका ब्रेनवाश कर अपनी राक्षसी प्रवृत्ति को अंजाम देते हैं।
      हमारा देश हो या फ्रांस या कोई भी देश ऐसे गुनाहगारों को सख्त से सख्त सजा देने का प्रावधान होना चाहिए ताकि दहशतगर्दो को सबक मिल सके और वह दहशतगर्दी करने से बाज आएं।
 धर्म के नाम पर अधर्म कर अशांति न फैलाएं।
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                   सुनीता रानी राठौर 
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या जीवन का हिस्सा है बचत की आदत डालना?

क्या जीवन का हिस्सा है बचत की आदत डालना?
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जी हां, जीवन का हिस्सा है बचत की आदत डालना। यह आदत ही हमें मुसीबत के घड़ी में सहायता प्रदान करता है। कठिन घड़ी में किसी के समक्ष हाथ फैलाने की नौबत नहीं आती। आज का किया हुआ बचत कल विपत्ति की घड़ी में मददगार साबित होता है।
 फिजूलखर्ची हमारी आदतों को तो बिगड़ता ही हैं हंसी का पात्र भी बनाता है। हम अपनी जैसी आदत और व्यवहार जीवन में अपनायेंगे उसी का अनुपालन हमारे बच्चे भी करगें। भविष्य में बच्चों की भी आदतें अच्छी बनी रहे इसके लिए खुद को भी अच्छी आदतों पर अमल करना जरूरी होता है। बुजुर्गों ने भी कहा है- "चादर देख कर पैर फैलाए"।
    आज की बचत हमारे कल के सुरक्षित भविष्य का निर्माण करता है। अगर हमें अपने भविष्य को सुरक्षित और सुनहरा बनाना है तो बचत की आदत डालते हुए अपने खर्चों पर नियंत्रण करने का प्रयास करना जरूरी है।
    जीवन का हिस्सा है बचत की आदत डालना सुखद भविष्य की खातिर। भविष्य किसी ने नहीं देखा पर एक उम्मीद की किरण के साथ हम सपने संजोते हुए सुनहरे भविष्य के खातिर हर तरह से बचत करते हैं।
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            सुनीता रानी राठौर 
            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

इंसान क्यों बन जाता है जानवर?

इंसान क्यों बन जाता है जानवर?
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इंसान विवेकशील प्राणी है-- जब उसका विवेक काम करना बंद कर दे तो वह जानवरों की तरह पेश आने लगता है। ईर्ष्या,लोभ,द्वेष, अहंकार जैसे दुर्गुणों के कारण वह स्वार्थवश दूसरों का अहित और अपने हित की कामना करने लगता है।
    जब उसके हृदय में परदुखकातरता की भावना खत्म हो जाती है, सामने वाले के प्रति उसके हृदय में सहानुभूति, ममता, दया, करुणा जैसे मानवीय गुणों का हनन हो जाता है तब वह इंसान जानवरों की तरह बिना सोचे-समझे व्यवहार करता है। उसे सिर्फ अपनी भलाई की चिंता होती है। दूसरे के दुख से उसके हृदय में कोई सहानुभूति नहीं उपजती।
    ऐसा इंसान स्वार्थवश सिर्फ अपना भला चाहता है और अपने सुख की परवाह करता है।
   मनुष्य संवेदनशील प्राणी है। भावुकता में आकर कभी-कभी अंधभक्त बन कर भी भीड़ का हिस्सा बन क्षणिक आवेश में बिना विवेक से निर्णय लिए वह जानवरों की तरह अमानवीय हरकत करता है। कुछ पल के लिए तो उसे आत्मसंतुष्टि मिलती है पर अंततः उसकी आत्मा धिक्कारती ही है।
   तुच्छ आत्मसंतुष्टि हेतु इंसान जानवर यानी हैवान बन जाता है जिसका परिणाम हमेशा दुखदाई ही होता है।
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         सुनीता रानी राठौर
      ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या जीवन का मतलब सिर्फ दुनिया में आना जाना है?

क्या जीवन का मतलब सिर्फ दुनिया में आना जाना है?
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यह इंसान के मानसिक सोच पर निर्भर करता है कि वह अपने जीवन के संबंध में क्या सोच रखता है। कुछ लोगों का जीवन आराम तलब होने के कारण वह जिंदगी में सिर्फ मौज-मस्ती करना ही अपना ध्येय बना लेते हैं जबकि कुछ लोगों का मानना है कि जीवन अनमोल है, इस बहुमूल्य जीवन के पल- पल का सदुपयोग करते हुए अच्छे कर्मों के द्वारा अपना नाम उजागर कर सकें ताकि दुनिया से विदा लेने पर भी नाम अजर-अमर रहे।
      जीवन तो पशुओं को भी मिला है जिनका काम है खाना और सोना। अगर हम अपने सुकर्मों से अपने जीवन को सुसज्जित नहीं बनाए तो फिर पशुओं और हमारे जीवन में क्या फ़र्क रह जायेगा?
           मनुष्य योनि में जन्म लेना बहुत भाग्य की बात है। हम विवेकशील प्राणी होने के नाते अपने जीवन के हर क्षण को नेक कामों से अपने समाज और देश की भलाई में सदुपयोग करते हुए व्यतीत करते हैं तब हमें एक अद्भुत और अनुपम ख़ुशी का एहसास होता है असीम शांति महसूस होती है और यही नेक काम ईश्वरीय पूजा भी है।
           जीवन का मतलब सिर्फ दुनिया में आना जाना नहीं है बल्कि जो जीवन मिला है उसे 
 सत्कर्मों में लगाते हुए मानव जीवन को सफल बनाना है। अनैतिकता से दूर रहते हुए नैतिक आचरण और सद्व्यवहार के द्वारा लोगों के दिलों में जगह बनाना भी अपना धर्म होना चाहिए।
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                        सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

समस्याओं से बाहर कैसे निकल सकते हैं?

समस्याओं से बाहर कैसे निकल सकते हैं?
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जीवन संघर्ष-पथ है। कदम-कदम पर समस्याओं का सामना करना और उसका समाधान करते हुए आगे बढ़ते रहना ही सफल जीवन का पर्याय है।
धैर्य, आत्मविश्वास,आत्मसंयम, विवेकपूर्ण निर्णय के द्वारा ही समस्याओं से बाहर निकला जा सकता है।
   कभी-कभी परिस्थितियां ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है कि इंसान की समझ से परे हो जाता है कि इस समस्या से बाहर कैसे निकलें-- ऐसी हालात में पहले परिस्थिति को जानने-समझने का प्रयास करें फिर सोच-समझकर विवेकपूर्ण निर्णय लें। 
   कभी-कभी हालात ऐसे उत्पन्न हो जाते हैं कि जो समस्या है उससे ज्यादा समस्या तुरंत दी गई प्रतिक्रिया से उत्पन्न हो जाती है। अतः आनन-फानन में प्रतिक्रिया देने से भी बचें।
    जो लोग ऊपर से खुश दिखते हैं ऐसा नहीं कि उनके जीवन में कोई समस्या नहीं है। वह भी हजारों समस्याओं से जूझते रहते हैं पर धैर्य और आत्मविश्वास को बनाए रखते हुए समझदारी से समस्या को निपटाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
   निष्कर्षत:कह सकते हैं कि अगर समस्या आती है तो उसका समाधान भी संभव है--घबरायें नहीं, धैर्य और आत्मसंयम को बनाए रखते हुए आत्मविश्वास के साथ ईश्वर पर भरोसा रखते हुए उसका निदान ढूंढने का प्रयत्न करें और समाधान निकालें। विवेकशीलता के साथ संघर्ष कर विपत्तियों से बाहर निकला जा सकता है। हतोत्साहित न हों, कर्म पथ पर संघर्षरत रहे। परिणाम सुखद होगा।
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                  सुनीता रानी राठौर
              ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या भरोसे के बल पर कर्म सरोकार होता है?

क्या भरोसे के बल पर कर्म सरोकार होता है?
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भरोसा और विश्वास मनुष्य के हृदय में एक अद्भुत शक्ति और ऊर्जा का संचार करता है, एक नई उम्मीद जगती है, आत्मविश्वास पैदा होता है--अपने उम्मीदों पर खरा उतरने हेतु इंसान सतत् प्रयत्नशील रहता है। अपने कर्म को पूर्ण करने का ध्येय रखता है और परिणामस्वरूप उसे शुभ फल की प्राप्ति होती है।
    अगर वह किसी पर भरोसा न करें, उसके मन में कोई उम्मीद न हो, हमेशा नकारात्मक सोच लेकर वह कर्म करें तो सफलता मिलना नामुमकिन है।
     हमें अपने कर्मों पर भरोसा रखना है, हम अच्छा कर्म करते हुए लगातार मेहनत कर रहे हैं तब थोड़ी देर से ही सही पर एक दिन सफलता जरूर हासिल होगी और इसी भरोसा के आधार पर हम निरंतर प्रयत्नशील रहते हुए कामयाबी को प्राप्त करते हैं। ऊंचाइयों तक पहुंचने का प्रयत्न करते हैं।
    इसलिए जब भी हम हतोत्साहित होते हैं बड़े बुजुर्ग भी हमें सलाह देते हैं-- भरोसा रखो सब कुछ ठीक होगा। ईश्वर पर भरोसा --अपने कर्म पर भरोसा-- अपने आसपास रहने वाले लोगों पर भरोसा --सभी का सम्मिश्रित रूप हमें सफलता के पायदान तक पहुंचाने में मददगार साबित होता है। इसलिए निःसंदेह कहा जा सकता है कि भरोसे के बल पर कर्म सरोकार होता है।
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                    सुनीता रानी राठौर 
                ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

सच्चे मित्र की पहचान कब और कैसे होती है?

सच्चे मित्र की पहचान कब और कैसे होती है?
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मित्रता का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका और योगदान होता है। मित्र की संगति का मनुष्य पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। इसलिए मित्रता भी सोच-समझकर और अच्छे संस्कार वाले व्यक्ति से करने का प्रयास होना चाहिए। सच्चा मित्र सुख -दुख का साथी होता है और सदैव हमें गलत काम करने से रोकता है।
सच्चे मित्र की पहचान मुसीबत और विपत्ति के समय होती है। बुरे समय में अगर वह साथ दे आपका साथ छोड़कर दूर न जाए, हितैषी बनकर हर पल सहयोग करे,आप को प्रोत्साहित करे, आप की कमियों की ओर इंगित करके उसे सुधारने का भी प्रयास करें-- वही सच्चा मित्र कहलाने के योग्य होता है।
सच्चा मित्र कभी नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करता।आपके व्यक्तिगत या गोपनीय बातें दूसरे लोगों से शेयर नहीं करता। उसमें कोई बनावटीपन भी नहीं होता। अगर वह आपको दिल से दोस्त मानता है तो वह कभी प्रतिद्वंदी की तरह व्यवहार नहीं करेगा। आपके दुख में वह दुखी और सुख में आनंदित महसूस करेगा। ऐसे मौके पर ही हम अपने दोस्तों की पहचान कर पाते हैं।
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                      सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

सरकारी विभाग में जीवित को मृत दिखाना क्या अपराधी घोषित नहीं होना चाहिए?

सरकारी विभाग में जीवित को मृत दिखाना क्या अपराधी घोषित नहीं होना चाहिए?
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सरकारी विभाग में कहीं-कहीं जो गोरखधंधा  हो रहा है --जीवित व्यक्ति को मृत साबित कर उसका प्रमाण पत्र बना देना ताकि उन्हें जो सुविधाएं सरकार द्वारा दी जा रही थी वह न देना पड़े --यह अक्षम्य अपराध है।
 अधिकारी फर्जी हस्ताक्षर करके प्रमाण पत्र बना रहे हैं। जीवित व्यक्ति को मृत बताकर झूठा प्रमाण पत्र बनाकर उसके जमीन को बेचने का मामला खुलकर सामने आ रहा है।
राजधानी दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल का लाइसेंस शुक्रवार को दिल्ली सरकार ने इसलिए रद्द किया क्योंकि कुछ दिन पहले डिलीवरी के दौरान पैदा हुए जीवित बच्चे को मृत बता दिया गया था।अस्पताल को सामान्य तौर पर दोषी मानते हुए यह कार्रवाई सटीक जान पड़ती है।
   व्यक्ति की प्रतिष्ठा समाज में उसके लिए बहुमूल्य संपत्ति है जो अक्सर उसे भौतिक संपदा प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। अगर उसके प्रतिष्ठा के खिलाफ कोई भी काम होता है तो वह कानूनी मानहानि का दावा कर सकता है।
    जीवित व्यक्ति को मृत साबित करना एक अपराध है ऐसे व्यक्ति या संस्था पर सख्त से सख्त कार्रवाई करते हुए उन्हें सजा देने का प्रावधान होना चाहिए। विशेषकर सरकारी अधिकारी जो सच्चाई को जानबूझकर दबाने की कोशिश करते हैं उनके खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिेए, उन्हें अपराधी घोषित करना चाहिए।
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                          सुनीता रानी राठौर 
                      ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या जिंदगी हर कदम एक नया फैसला है?

क्या जिंदगी हर कदम एक नया फैसला है?
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जिंदगी हर कदम एक नई जंग है एक नया फैसला है। हर पल, हर घड़ी संघर्ष करते हुए गुजारते हैं। अपने विचार अपने सिद्धांत भी परिस्थितियों के अनुसार कभी-कभी बदलने पड़ जाते हैं।
जिंदगी सिर्फ अपनी नहीं होती। परिवार, रिश्तेदार जो भी हमसे जुड़े हैं, सभी का व्यक्तिगत जीवन हमारे व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करता है। समयानुसार जैसी परिस्थिति होती है उसके अनुसार निर्णय लेने पड़ते हैं। सुख-दुख मिश्रित जीवन हमें बहुत कुछ सिखा देता है। समय और हालात कभी-कभी स्वयं के सोच और निर्णय को बदलने के लिए मजबूर कर देता है।
   परिस्थितियों के समक्ष इंसान मजबूर हो जाता है। कभी प्रकृति के समक्ष विवशता झलकती है कभी पारिवारिक स्थितियों के समक्ष।
    इसलिए यह कह पाना कि आत्मविश्वास और धैर्य बनाए रखें हम अपने फैसले पर कायम रहेंगे कभी-कभी नामुमकिन साबित हो जाता है। जिंदगी में हर कदम जंग यानी नई-नई परेशानियों से मुकाबला करना पड़ता है और परिस्थिति अनुसार नए फैसले लेने पड़ते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जिंदगी हर कदम एक नया फैसला है।
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               सुनीता रानी राठौर 
               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अज्ञानता का परिचायक घमंड है?

क्या अज्ञानता का परिचायक घमंड है?
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ज्ञान का अभिमान होना निश्चित तौर पर घमंड  कहलाता है। ज्ञान का अभिमान सबसे बड़ी अज्ञानता है। लोगों में महाज्ञानी  होने का घमंड छा जाता है। उस अभिमान में वह दूसरे को नीचा दिखाने लगता है। 
    मजाक उड़ाना, दूसरे को छोटा समझना उकी आदत बन जाती है। अपने को बड़ा समझने में उन्हें मानसिक शांति महसूस होती है, उनका मन प्रफुल्लित होता है-- यही ज्ञान का अभिमान है।
     हर समय किसी का हीन भावना से मजाक उड़ाना, उसके व्यक्तिगत आचरण पर चोट पहुंचाना --यह भी इंसान के घमंड को ही दर्शाता है और यह घमंड अज्ञानता का ही परिचायक है।
     कोई भी मनुष्य पूर्ण ज्ञानी नहीं होता। बचपन से बुढ़ापे तक कुछ न कुछ सीखते ही रहता है। अपने अहम भाव में  किसी की बेइज्जती करना,बात बात पर अपमानित करना यह उसके अहंकार को प्रदर्शित करता है। अगर आप ज्ञानी हैं तो दूसरों का भी सम्मान करना सीखें। अहंकार का विनाश निश्चित रूप से कभी न कभी होता है। ज्ञान का अभिमान सबसे बड़ी अज्ञानता है और अज्ञानता का परिचायक घमंड है।
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               सुनीता रानी राठौर
            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या विदेश से आने वाले चुनावी चंदे पर रोक लगनी चाहिए?

क्या  विदेश से आने वाले चुनावी चंदे पर रोक लगनी चाहिए?
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जनप्रतिनिधित्व कानून जिसमें चुनाव के बारे में नियम बनाए गए हैं राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने पर रोक लगाता है।राजनीति में काले धन को कम या पूरी तरह से कैसे खत्म किया जाए इस पर ठोस कार्रवाई की अपेक्षा है। लोकतंत्र की एक बड़ी विसंगति उस धन को लेकर है जो चुपचाप बिना किसी लिखा- पढ़ी के दलों के नेताओं को पहुंचाया जाता है और उस काले धन से देश के बड़े आयोजन चलते हैं -राजनीतिक रैलियां, सभाएं, चुनाव प्रचार होता है।
 यह चंदे का मामला 1976 से शुरू हुआ। पहले विदेशी चंदा लेने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी पर 2010 में इस कानून में संशोधन कर इस रोक को खत्म कर दिया गया। आज चुनाव में होने वाले खर्च लोकतंत्र की एक बड़ी समस्या बन गई है। राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाकर ही समस्या का समाधान हो सकता है। किसी भी कीमत पर चुनाव जितना आज राजनीतिक पार्टी का ध्येय बनता जा रहा है।
 कंपनियों के लिए राजनीतिक चंदा दे सकने की भी एक कानूनी सीमा तय है। राजनीति करने वाले सामाजिक उत्थान के लिए काम नहीं करते सिर्फ वोट की राजनीति करते है। राजनीतिक चंदे के नाम पर लोकतंत्र को दूषित करने की कोशिशों पर विराम लगाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता से मुद्दा गरमाया है अब इस लोकतंत्र को मजबूत बनने का एक रास्ता भी दिखाई दे रहा है। कोर्ट ने आदेश जारी किया है कि ऐसे सभी दल जिनको चुनावी बांड के जरिए चंदा मिला है वे सील कवर में चुनाव आयोग को ब्यौरा देंगे ।चुनावी बांड राजनीतिक दान के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बड़ा कदम है।
इस दिशा में सख्त और ठोस कदम उठाने की अति आवश्यकता है।
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                             सुनीता रानी राठौर 
                    ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या गरीब का बच्चा सबको चोर लगता है ?

क्या गरीब का बच्चा सबको चोर लगता है ?
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इंसान की फितरत और मानसिकता ऐसी बन गई है कि वह इंसान की पोशाक उनकी रहन-सहन को देखकर अपना एक दृष्टिकोण बना लेता है। यह हकीकत है कि अमीरजादे कुछ भी करें उन्हें सभ्य नजर से आदर की दृष्टि से लोग देखते हैं जबकि गरीब के बच्चे की छोटी सी हरकत में भी अधिकांश लोगों को  बुराई नजर आती है। अमीरों की सोच ऐसी है कि वह दो पल में गरीबों पर चोरी का इल्जाम लगा देते हैं और साबित करने पर भी तुल जाते हैं जबकि ऐसी बात नहीं है हकीकत में गरीब अमीरों से ज्यादा ईमानदार और वफादार होते हैं। ईश्वर से डरते हैं, हर कदम सोच-समझकर रखते हुए कार्य करते हैं। 
हां, कभी-कभी ऐसी हालात उत्पन्न हो जाती है कि पेट की खातिर उनसे गलतियां हो जाती है पर उनकी इस हरकत से ऐसा कह देना कि गरीब चोर होते हैं यह नाइंसाफी है।
करोड़ों का घोटाला करने वाले अमीर लोग पाक साफ और इज्जतदार कहलाते हैं। अपनी हजार गलतियों को छुपा कर गरीबों पर इल्जाम लगाते हैं।
गरीब के बच्चे चोर होते हैं यह कहना बेबुनियाद और अमानवीयता का परिचायक है। मैंने अपने जीवन में जितना अधिक अमीरों को घोटाला करते, रिश्वत लेते हुए सुना है उसके अपेक्षा गरीबों को बहुत ही ईमानदारी से काम करते हुए देखा है।
       मेरा मानना है कि अमीर शौकिया लालच और स्वार्थ में घोटाले करते हैं जबकि गरीब मजबूरी में गलत काम करते हैं। इसलिए यह कहना कि गरीबों के बच्चे चोर होते हैं बिल्कुल सही नहीं है।
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                          सुनीता रानी राठौर 
                          ग्रेटर नोएडा ( उत्तर प्रदेश)

क्या सांसारिक सुखों का परिणाम है दुःख?

क्या सांसारिक सुखों का परिणाम है दुःख?
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सांसारिक सुख प्राप्त करने की लालसा में ही हम हमेशा नई-नई उम्मीद दिल में पालकर नई-नई चीजों को पाने की तमन्ना ह्रदय में संजो लेते हैं। भोग-विलास की वस्तुओं को प्राप्त करने हेतु लालायित रहते हैं और जब वह पूर्ण नहीं होता तब हम दुखी और निराश रहने लगते हैं।
   धन-दौलत के नाम पर अपने सगे संबंधियों से भी आत्मीयता खत्म हो जाती है और सुख के चाहत में हम आत्मिक दुख से ग्रस्त हो जाते हैं।
   ज्यादा धन कमाने की लालसा,सुख-सुविधा संपन्न व्यक्ति बनने की लालसा, आधुनिकता के होड़ में बाह्यप्रदर्शन, भोग-विलास की वस्तुएं प्राप्त करने की चाहत और अगर इच्छानुसार नहीं मिला तो मन का अशांत होना हमारी सुखी जीवन को अशांत और दुखी बना देता है।
   अतः नि:संदेह हम कह सकते हैं कि सांसारिक सुखों का परिणाम ही दुःख है। जब हम माया नगरी से निकलकर अपने मन की भावनाओं पर नियंत्रण कर लेते हैं, सांसारिक सुख भोग-विलास की वस्तुओं से निर्लिप्त हो जाते हैं तब हमारा मन आत्मिक सुख को प्राप्त करता है। सांसारिक माया मोह सुख की चाहत हीं दुःख का मूल कारण है।
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                     सुनीता रानी राठौर
                      ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Wednesday, 7 October 2020

क्या बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा सिर्फ मातृभाषा में देनी चाहिए?

क्या बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा सिर्फ मातृभाषा में देनी चाहिए?
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बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा सिर्फ मातृभाषा में देनी चाहिए यह परिस्थिति और उनके मानसिक अवस्था पर भी निर्भर करता है। मात्रृभाषा का ज्ञान बच्चों को अवश्य होनी चाहिए पर अगर इसके साथ-साथ दूसरे भाषाओं का भी ज्ञान हो तो आगे चलकर उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई नहीं होगी। 
यह सिद्ध हो चुका है कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के उन्मुक्त विकास में ज्यादा कारगर होती है। अलग-अलग आर्थिक परिवेश के बालक को विषय  को ग्रहण करने की क्षमता सामान नहीं होती।
  मात्रृभाषा के माध्यम से जब पढ़ाया जाता है तो बालक के चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती है। दूसरी भाषा सीखना भी अच्छी बात है, लेकिन मात्रृभाषा की उपेक्षा करना ठीक नहीं। 
केंद्र सरकार कार्यालय में हिंदी कामकाज को बढ़ावा देने की बात कहती है पर व्यावहारिक रूप से अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है।
 हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है लेकिन कार्यालयों में हिंदी में कामकाज के लिए कोई जगह नहीं है। 
 ईमेल, इंटरनेट, कंप्यूटर, लैपटॉप फेसबुक आदि सब हिन्दी में भी अब प्रयोग होने लगे हैं फिर भी अभिभावक हिंदी की जगह अंग्रेजी में बच्चों को पढ़ाना ज्यादा अच्छा मान रहे हैं।
अच्छी नौकरी पाने के लिए, ज्ञान अर्जित करने के लिए अंग्रेजी सीखना बहुत अच्छी बात है पर  अंधानुकरण में आज अंग्रेजी को ही सभी महत्व दे रहे हैं और सभी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं ताकि वह आगे अपनी पढ़ाई उचित ढंग से कर सके।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि मात्रृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य रूप से मिलनी चाहिए इसके अलावा दूसरे भाषाओं का ज्ञान हो तो अति उत्तम है।
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               सुनीता रानी राठौर
                ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

हाथरस के डीएम की कार्यप्रणाली पर सवाल कर्मों उठ रहे हैं?

हाथरस के डीएम की कार्यप्रणाली पर सवाल कर्मों उठ रहे हैं?
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हाथरस के डीएम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजमी है। डीएम जिले का सर्वेसर्वा होता है, उनके देखरेख में ही पूरे जिले का प्रशासनिक कार्य होता है। डीएम को चाहिए था कि पीड़िता और पीड़ित परिवार की उचित सुरक्षा प्रदान करते हुए मदद पहुंचाने की कोशिश करना। परन्तु वह पीड़ित परिवार को धमकाने के अंदाज में सुनाता रहा--मैं यहां पर तुम्हारे साथ रहूंगा। मीडिया 2 दिन के लिए हैं। उनकी बात पर मत जाओ --इस तरह का बात व्यवहार उनके पद के अनुकूल नहीं है।
    एक तो किसी की बेटी के साथ इतना दर्दनाक वाकया --उसके बाद उसका अंतिम संस्कार भी जबरदस्ती तानाशाही रूप में करना और उसके बाद परिवार को धमकी देना कि मीडिया से अपने मन की बात, अपनी परेशानी तुम बयां नहीं करोगे-- डीएम का इस तरह का व्यवहार प्रजातंत्र शासन के अनुकूल नहीं है।
    इंसानियत को शर्मसार करने वाले वाक्य जो उन्होंने कहा कि तुम्हारी बेटी कोरोना से मर गई होती तो क्या इतना मुआवजा मिला होता।
    इतनी घटिया दर्जे की सोच -- एक डीएम के द्वारा कही जाने वाली बात कितनी हास्यास्पद है। अगर उनकी बेटी के साथ यह हादसा होता और इस तरह का व्यवहार होता, मुआवजे का ऐलान होता-- तो क्या उनकी आत्मा को तसल्ली मिल जाती।
    इन्हीं अभद्र और निम्न स्तर के आचरण  के कारण उनके कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगा।
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                         सुनीता रानी राठौर 
                         ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या जाति व धर्म के बिना राजनीति संभव नहीं है?

क्या जाति व धर्म के बिना राजनीति संभव नहीं है?
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   जाति और धर्म को राजनेता हथियार के रूप में राजनीति में इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका उद्देश्य मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाना ताकि मुख्य मुद्दों पर काम न करना पड़े इसलिए जाति धर्म के नाम पर बवाल खड़ा करते हैं। इंसान को जाति में बांटकर वोट मांगते हैं।
भारत में यह कह देना कि जातीय भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है --यह राजनीति का एक आकर्षक नारा भी हो सकता है लेकिन ऐसा वास्तव में संभव हो पाएगा यह कठिन सवाल बना हुआ है।
   एक हिंसक दबंगता में या फिर अपमानजनक हालत में घिरे रखने की साजिश के रूप में मंदिरों में प्रवेश से लेकर सार्वजनिक समारोह में भागीदारी कर लेने भर से दलितों की जिंदगी पर कहीं-कहीं बन आती है‌। यह सब क्यों होता है? क्योंकि हमारा कानून कमजोर है और कानून में उच्च पदों पर बैठे हुए उनकी जाति के लोग और राजनेता नहीं चाहते कि उन्हें कड़ी सजा मिले।
    इसलिए अभी भी कुछ जगहों पर यह भेदभाव देखने को मिल रहा है क्योंकि उन्हें कानून का डर नहीं है उनकी पहुंच ऊपर तक है। 
    सामाजिक बुराइयां सदियों से और पीढ़ियों से चली आ रही है। एक अदृश्य स्वर्णवादी नियंत्रण समाज में स्थापित है जो ऊंची जातियों के दबंगों को प्रश्रय देता है और यह सब राजनीतिज्ञों के मिलीभगत के कारण होता है क्योंकि उन्हें अपनी स्वार्थ की रोटी सेकनी है।
    अपनी स्वार्थ की पूर्ति हेतु वे धर्म और जाति में बरगला कर लोगों को बांट कर अपना राजनीतिक फायदा उठाते हैं और जनता बेवकूफ बन कर आपस में लड़ती है।
जनता में कमियां है कि वह जातिवाद के आधार पर नेता को चुनती है और जिसकी सजा उसे भुगतनी भी पड़ती है। नफरत और विद्वेष का जहर घोलकर वह लोगों को एकजुट नहीं होने देना चाहते।
कितनी बड़ी विडंबना और अपमान है कि उच्च पद पर बैठे राष्ट्रपति का भी बार-बार जातिय पहचान बताई जाती है। जब नेता किसी को सवर्ण और किसी को शुद्र कहता है तभी उसके विचारों की मानसिक संकीर्णता झलक जाती है। ऐसा नेता निष्पक्ष भाव से जनता की सेवा कर ही नहीं सकता।
जाति धर्म के बिना भी राजनीति संभव है पर उसके लिए जनता को जागरूकता दिखानी पड़ेगी जो नेता जाति धर्म का नाम ले उसे बहिष्कृत करें।
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                       सुनीता रानी राठौर 
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

सामूहिक दुष्कर्मियों को तुरंत सजा देने के लिए क्या-क्या कानून में संशोधन होना चाहिए?

सामूहिक दुष्कर्मियों को तुरंत सजा देने के लिए क्या-क्या कानून में संशोधन होना चाहिए?
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कानून में संशोधन करवा पाना तो बहुत दूर की बात है पर कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करवाना इतना मुश्किल नहीं है। इसके लिए नेताओं और पुलिस महकमे को अपने आचार-व्यवहार में परिवर्तन लाने की जरूरत है ताकि आम इंसान को भी न्याय और सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार मिल सके।
सामूहिक दुष्कर्मियों को तुरंत सजा देने के लिए सर्वप्रथम पुलिस को नैतिकता और ईमानदारी के साथ काम करने की जरूरत है।
नेताओं के दबाव से मुक्त होकर पुलिस निष्पक्ष भाव से काम करे। अनैतिक रूप से गलत को सही और सही को गलत ना साबित करें।
 जब पुलिस साथ देगी तभी कोर्ट का दरवाजा पीड़ित न्याय की खातिर खटखटा पाएगी।
  नि:संदेह हमारे कानून में बहुत खामियां हैं तभी तो पहुंच वाले लोगों का गुनाह साबित नहीं होता, तारीख पर तारीख देते हुए अंत में उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया जाता है जबकि गरीबों को या तो तुरंत किसी तरह एनकाउंटर में मार दिया जाता है या फांसी की सजा हो जाती है।
  संविधान के अनुच्छेद 21 की आड़ में दोषी न्याय प्रक्रिया से खेलते हैं। उसे सख्त बनाने की जरूरत है। कोर्ट हर नागरिक के मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में पीड़ित और उनके परिजनों की शिकायतों का निवारण करें। 
  दुष्कर्म सिर्फ एक व्यक्ति और समाज के नहीं बल्कि पूरी मानवता के खिलाफ अपराध है।अदालत अपने कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखें। ताकि इस व्यवस्था से लोगों का भरोसा न उठे। पीड़ित परिवार की मनोस्थिति को समझते हुए व्यवस्था में परिवर्तन लाने की अति आवश्यकता है।
  क्या किसी नेता की बेटी के साथ दुष्कर्म हो और उसे 25लाख का मुआवजा और एक सदस्य को नौकरी दे दिया जाए तो क्या उन्हें शांति मिल जाएगी-- विचारणीय प्रश्न है?
  न्याय प्रक्रिया सभी के लिए एक समान हो, दबाव में पुलिस काम न करें। आम जनता बस सरकार से यही उम्मीद रखती है।
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                      सुनीता रानी राठौर
                 ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या स्वास्थ्य से बड़ा कोई सुख जीवन में होता है?

क्या स्वास्थ्य से बड़ा कोई सुख जीवन में होता है?
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स्वास्थ्य से बड़ा कोई सुख जीवन में नहीं होता। कहावत भी है-- 'स्वास्थ्य ही धन है'। हमारा स्वास्थ्य अगर ठीक है तो हम अपने जीवन में किसी भी बुरी परिस्थिति का सामना कर सकते हैं और जीवन का भरपूर आनंद उठा सकते हैं।
 अच्छा स्वास्थ्य वास्तविक धन-दौलत है जो हमें सुखी जीवन प्रदान करता है। हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने हेतु सक्षम बनाता है।
  अच्छा स्वास्थ्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से सक्षम बनाता है। 
  वर्तमान समय में व्यस्त जीवन और प्रदूषित वातावरण में सभी के लिए अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखना बहुत ही कठिन है। आजकल अच्छा स्वास्थ्य भगवान के दिए एक वरदान की तरह है। 
   अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए नियमित शारीरिक व्यायाम, योग,संतुलित भोजन, स्वच्छ वातावरण की जरूरत है। अच्छा स्वास्थ्य हमें बीमारियों और रोगों से मुक्ति प्रदान करता है।
    यह जीवन का अमूल्य तोहफा है और उद्देश्य पूर्ण जीवन के लिए आवश्यक है। अगर स्वास्थ्य सही नहीं है तो आप के खान-पान पर प्रतिबंध लग जाता है। आप धन रहते हुए भी उसका सदुपयोग जीवन काल में नहीं कर सकते। 
        इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए निःसंदेह कहा जा सकता है कि स्वास्थ्य से बड़ा कोई सुख जीवन में नहीं होता। जीवन का भरपूर आनंद उठाना है तो स्वस्थ और तंदुरुस्त रहें।
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                    सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या आप सिर्फ जानकारी को शिक्षा समझते हैं?

क्या आप सिर्फ जानकारी को शिक्षा समझते हैं?
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 शिक्षा का हमारे जीवन वही महत्व है जो मछली के लिए पानी का, मोती के लिए सीप का। शिक्षा के बिना हर व्यक्ति अधूरा है।
 शिक्षा का अर्थ होता है-- सीखना और सिखाना। पर सिर्फ जानकारी को शिक्षा कहना बिल्कुल उचित नहीं है। सच्ची शिक्षा किसी डिग्री से परे होती है या कहें किताबी ज्ञान से भी अधिक होती है।
    सकारात्मक सोंच, मदद करने का दृष्टिकोण , समाज के प्रति अच्छा विचार और नैतिक मूल्यों का ज्ञान यही सच्ची शिक्षा है। 
   शिक्षा का मतलब होता है- खुद को दो कदम आगे ले जाना। शिक्षा जो हमें सही निर्णय लेने की सीख देती है। शिक्षा का मतलब अपने ज्ञान को बढ़ाना और उसे व्यवस्थित रखना।
      शिक्षा हमें जीवन जीने का सलीका सिखाती है और कामयाबी भी देती है और साथ ही शिक्षा हमें परिपक्व भी बनाती है।
       इसलिए जन-जन को शिक्षित होना जरूरी है।महात्मा गांधी जी के अनुसार भी सच्ची शिक्षा वह है जो बच्चों के आध्यात्मिक, बौद्धिक और शारीरिक पहलुओं को उभारती है। उनके मुताबिक शिक्षा का अर्थ सर्वांगीण विकास होता है।
     वर्तमान में हमारे देश की शिक्षा प्रणाली किताबी शिक्षा पर जोर दे रही है जो सही नहीं है। विद्यार्थियों को व्यवहारिक शिक्षा भी उपलब्ध करानी चाहिए। विद्यार्थी तभी कुशल बनेगा जब हर चीज को व्यावहारिक रूप से सीखेगा।
       आधुनिक शिक्षा प्रणाली में मानवीय मूल्यों के बजाय सिर्फ ज्यादा मार्क्स लाने पर जोर दिया जा रहा है। हमें चाहिए कि घर में भी अच्छे संस्कार और समाजिकता का गुण बच्चों को सिखाएं ताकि समाज के व्यवस्थाओं, नियमों, प्रतिमान और मूल्यों को सीखते हुए एक आदर्श नागरिक बन सके।
       जानकारी कैसी है-- उसकी परख की क्षमता, नैतिक -अनैतिक की पहचान और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता ही सच्ची शिक्षा कहलाती है।
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             सुनीता रानी राठौर 
             ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

आज के समय में कोई सच्चाई का साथ देता है?

आज के समय में कोई सच्चाई का साथ देता है?
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आज का प्रश्न विचारणीय प्रश्न है और वर्तमान का ज्वलंत प्रश्न। यह कड़वी सच्चाई है कि लोग सच्चाई का साथ देने में कतराने लगे हैं। सच्चाई का साथ देने वाले को बहुत ही जोखिम उठानी पड़ती है। खुद भी और अपने परिवार को भी जोखिम में डालना पड़ता है। 
 यहां तक कि कभी-कभी उच्च पद पर बैठे हुए न्यायाधीश भी डांवाडोल हो जाते हैं। विवशतावश सच्चाई का साथ नहीं दे पाते। 
    पर ऐसा नहीं कह सकते कि सच्चाई का साथ कोई नहीं देता। अवश्य देते हैं-- सच्चाई का साथ देने की वजह से ही आज दुनिया चल रही है नहीं तो सारे झूठे- मक्कारों का राज हो जाये।
उच्च पद पर बैठे आसीन लोगों को गलतफहमी हो जाती है कि पैसे, धन-दौलत के बदौलत हम लोगों को खरीद कर या दबाव बनाकर अपनी मनमानी करवा सकते हैं। किसी को भी डरा धमका सकते हैं। पर यह गलतफहमी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाती। कहावत भी है झूठ के पैर नहीं होते। सच्चाई की जीत होती है।
  कानून कमजोर होने की वजह से भी लोग सच्चाई का साथ देने में कतराने लगे हैं क्योंकि जो आगे आता है उसे कानून का भी साथ नहीं मिल पाता।उसका जीवन संघर्षमय हो जाता है, अस्त-व्यस्त हो जाता है। फिर भी बहुत से उदाहरण ऐसे हैं जहां सच्चाई का साथ देते हुए लोग अपराधियों, गुनाहगारो को सजा दिलवाने का प्रयास किए हैं और कर रहे हैं। इसलिए ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि आज लोग सच्चाई का साथ नहीं देते ।
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                   सुनीता रानी राठौर
                    ग्रेटर नोएडा( उत्तर प्रदेश)

क्या वक्त अपना है तो सब कुछ अपना है?

क्या वक्त अपना है तो सब कुछ अपना है?
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समय के साथ-साथ वक्त भी बदलता रहता है। अच्छा वक्त हमें कामयाबी और खुशियां प्रदान करता है। कामयाबी मिलते ही लोगों की नज़दीकियां महसूस होने लगती है और वक्त खराब होते हीं लोग किनारा करने लगते हैं।
  आम जीवन हो या सामाजिक जीवन हर जगह इन बातों को महसूस किया जा सकता है। आज आप गौर करें तो देखें कभी कांग्रेस पार्टी बुलंदियों पर थी तब सभी बड़े-बड़े नेता उस पार्टी के सदस्य बनना अपना अहो भाग्य मानते थे। आज सभी भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित होना चाह रहे हैं क्योंकि आज वह बुलंदियों पर है।
   वक्त वक्त की बात है जो ऊंचाइयों पर रहता है उससे सभी संपर्क रखना चाहते हैं। दलबदलूओं को देखकर इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है। जब आपसे उन्हें फायदे नजर आएंगे तब आप में उन्हें खुबियां ही खुबियां नजर आयेंगी अन्यथा खामियां दिखाई देने लगेंगीं। अपने फायदे की खातिर हर कदम पर दुनिया  सलाम करती है। नि:संदेह वक्त अपना है तो सब कुछ अपना है।
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                         सुनीता रानी राठौर
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या सफलता से ज्यादा विफलता सिखाती है?

क्या सफलता से ज्यादा विफलता सिखाती है?
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असफलता ही इंसान को सफलता का मार्ग दिखाती है। जीतने वाले कभी हार नहीं मानते और हार मानने वाले कभी जीत नहीं सकते। सभी के जीवन में एक ऐसा समय आता है जब सभी चीजें  हमारे विरोध में हो रही हो और हर तरफ से निराशा मिल रही हो।
 इतिहास के दर्ज घटनाओं में भी बड़े-बड़े महापुरुष या साइंटिस्ट शुरुआती दौर में असफल रहे पर अपने मेहनत, लगन और प्रयास के कारण सफलता हासिल की।
 एडिशन और आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक अगर अपनी असफलता और कमजोर दिमाग को मान कर बैठ जाते तो आज महान प्रतिभा और आविष्कारक में उनका नाम दर्ज नहीं होता।
     सफलता हमें कुछ बातें सिखाती हैं लेकिन विफलता एक पूर्ण टीचर की तरह हमें ढेरों सीख दे जाती है। विफलता को लेकर ज्यादा चिंतित होने के बजाय हम चिंतन करते हैं कि हमारी विफलता हमारे काम करने के तरीके उनके अभ्यास करने के तरीकों की विफलता है।
      जब हम अन्य रास्तों और संसाधनों के बारे में सोचते हैं और अमल करते हैं तब समाधान नजर आने लगता है। विफल होने पर उस काम को करने के नए तरीके आजमाते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं।
यह भी सच है कि सफलता हमें खुशी देती है और विफलता मायूसी और हताशा प्रदान करती है पर विफलता के बाद हम आगे की नई योजना तैयार करते हैं उसमें सफलता को लेकर हमारी सोच, नजरिए में पूर्ण रुप से बदलाव होता है और सफलता हेतु सुधार पर ध्यान गंभीरता से देते हैं। इस तरह कह सकते हैं कि वास्तव में सफलता से ज्यादा हमें विफलता सिखाती है।
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             सुनीता रानी राठौर
             ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Friday, 25 September 2020

क्या जीवन का बहाव झरने की तरह होना चाहिए?

क्या जीवन का बहाव झरने की तरह होना चाहिए?
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अवश्य, जीवन का बहाव झड़ने की तरह ही होना चाहिए। जीवन को झड़ने की उपमा भी दी जाती है। जिस तरह से झरने का पानी अविरल गति से पत्थरों से टकराते हुए पेड़ो और जंगलों में निरंतर प्रवाहित होते रहता है ठीक उसी तरह से हम अपने जीवन में गति, स्फूर्ति और लगन के साथ संघर्षों से टकराते हुए आगे बढ़ने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
       जीवन में तरह-तरह के अवरोध उत्पन्न होते रहते हैं। सुख-दुख का मिश्रण हीं जीवन है। अगर हम मुश्किलों से घबराकर या उदास होकर हार मान जाएं तो हमारा जीवन जमे हुए पानी की तरह बदबू दायक हो जाएगा। अविरल धारा की तरह अगर हम बहते रहें तभी हमारा जीवन सार्थक होगा।
      जिस तरह से झरने का पानी ऊंचाइयों से नीचे गिरते हुए भी अविरल धारा में प्रवाहित होता है ठीक उसी तरह से हम संघर्षों से गुजरते हुए अपने जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास करते हैं और करते रहना ही चाहिए।
निरंतर गतिमान बने रहना ही सफल जीवन का द्योतक है। प्रकृति प्रदत वस्तुओं से हमें संदेश  मिलता है कि हमें भी जीवन में निरंतर कठिनाइयों को झेलते हुए अग्रसर रहने का प्रयास करना चाहिए।
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                 सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या विचार और भाव में अंतर हो सकता है?

क्या विचार और भाव में अंतर हो सकता है?
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विचार और भाव में अन्योन्याश्रित संबंधित है।
हमारे हृदय में जैसे विचार आते हैं उसी के अनुसार भाव उत्पन्न होते हैं। बिना विचार के भाव नहीं उत्पन्न हो सकता। भाव का संपूर्ण क्षेत्र विचार का क्षेत्र है।
विचार एक आंशिक घटना है जो हमारे मस्तिष्क में चलती है। भाव एक सर्वांग घटना है जो पूरे अस्तित्व में गूंजी जाती है।
 विचार हमारे समग्र व्यक्तित्व को ओतप्रोत नहीं करता सिर्फ दिमाग में घूमता है, विचार कागज की नाव की तरह मस्तिक सतह पर डोलता रहता है जबकि भाव सर्वांग अवस्था है। जैसे ही प्रभु के संबंध में भाव उत्पन्न होते हैं तब रोम-रोम तन-प्राण सब भाव से भर जाता है। 
 भाव यानी समग्रता,भाव यानी सर्वांगीणता।
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                   सुनीता रानी राठौर
                    ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या हम सब एक मात्र परमात्मा के अंश हैं ?

क्या हम सब एक मात्र परमात्मा के अंश हैं ?
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जी हां, नि:संदेह हम सब एक मात्र परमात्मा के अंश हैं पर अभिमान और अज्ञानतावश हम खुद को धर्म और जाति में बांटकर अपने अंदर अहम भाव को जन्म देते रहते हैं।
 हम ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए वह पैर से पैदा हुआ हम उच्च जाति वो निम्न जाति का ---इस तरह की संकीर्ण मानसिकता द्वारा हम मानवता को कलंकित करते हैं।
 यह जानते हुए भी कि सभी परमात्मा के अंश हैं हम ऊंच-नीच का भेदभाव करते हुए एक-दूसरे के प्रति मन में हीन भाव रखते हैं जो हमारे अहंकार को प्रदर्शित करता है। 
 21वीं सदी में भी भले ही हम आधुनिक कहलाने का दावा करते हैं पर आज भी रूढ़िवादी विचारों से ग्रस्त हैं।
 यही कारण है कि समय के साथ हमें जितना विकास करते हुए विश्व में अग्रणी स्थान बनाना चाहिए था हम नहीं बना पा रहे हैं क्योंकि जाति के कारण इंसान को हर जगह तरजीह नहीं दिया जा रहा। जब तक शीर्षस्थ पद पर बैठे नेता वोट बैंक की राजनीति जाति के आधार पर करते रहेंगे तब तक दूसरे लोग से उम्मीद करना बेकार है।
 जाति के आधार पर किसी को बुद्धिमान मानना और कोई कितना भी पढ़ा लिखा हो बार-बार जाति का जिक्र करके जाति के नाम पर जलील करना--
 अशोभनीय और अमानवीय प्रस्तुत होता है।
 हम सभी परमात्मा के अंश हैं। हर प्राणी के प्रति हमारे हृदय में इंसानियत का भाव होनी चाहिए। अगर हम प्रभु के सच्चे भक्त हैं तो प्रेम और सद्भावना के साथ हमें सभी का आदर और सम्मान करना चाहिए।
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                      सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या फिल्म इंडस्ट्री में ड्रग्स की भूमिका की जांच होनी चाहिए?

क्या फिल्म इंडस्ट्री में ड्रग्स की भूमिका की जांच होनी चाहिए?
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फिल्म इंडस्ट्री में हीं क्यों हर जगह ड्रग्स की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। नामी हस्तियों के साथ हादसा होने पर सरकार जागती है, जांच करने की कवायद शुरू कर देती है वरना सब कुछ जानते हुए भी वह नजरअंदाज किए हुए रहती है।
 ऐसा नहीं कि उन्हें नहीं पता कि कहां पर क्या हो रहा है? पर जब तक किसी बड़े व्यक्ति के साथ कोई हादसा न हो जाए सभी चीजों को नजरअंदाज कर दिया जाता है यह सर्वविदित है।
  नशा का कारोबार कितना फल-फूल रहा है सभी जानते हैं। उस पर कई फिल्में बनाई जा चुकी है।नशा कारोबारियों को रिश्वतखोर पुलिस वालों की और नेताओं की संरक्षण भी मिली रहती है। इसी कारण वे बेखौफ होकर कानून को ठेंगा दिखाते हैं।
  जो समाज के हित में न हो, उन चीजों पर पूरी तरह बैन होनी चाहिए, पर नहीं होता क्योंकि इसके सेवन करने वाले भी बड़ी-बड़ी हस्तियां ही अधिकांश हैं।
   नामी हस्तियों के साथ हादसा होने के बाद सरकार और सीबीआई जागरूक दिखाई देती है, आम इंसानों की यहां पर जान की कोई कीमत नहीं है। जांच एजेंसियां भी खानापूर्ति करती है। जैसे ही बड़े लोगों का नाम सामने आता है। केस फाइल बंद कर दिया जाता है यही हमारे देश की विडंबना है।
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                    सुनीता रानी राठौर
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 17 September 2020

क्या जीवन में परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर है?

क्या जीवन में परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर है?
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 परिवर्तन प्रकृति का नियम है, वही एकमात्र स्थिर और शाश्वत है। जीवन परिवर्तनशील है--इस कारण गहरे दुःख को भी सुख की उम्मीद में भूल जाते हैं, इस विश्वास के साथ की जीवन सदा एक सा नहीं रहता।
  समय के साथ कर्मशील जीवन हमें सुखमय बना सकता है। परिवर्तन को स्वीकार कर हम गतिशील बन सकते हैं।
  जीवन का वास्तविक आनंद भी तभी उठा सकते हैं जब हम समय के साथ चलते हुए जड़ रीति-रिवाजों और पुरानी अवधारणा को छोड़कर समय के अनुकूल नवीनता को अपनाते हुए आगे बढ़ें।
   समय के साथ विषय वस्तु और विचार में स्थितियों के अनुसार बदलाव को ही विकास कहा जाता है। 
   ठहरे हुए जल की भांति अपरिवर्तनशील रहे तो सड़न व बदबू निश्चित है यानी रूढ़िवादिता के कारण हमारी प्रगति अवरुद्ध हो जाएगी।
    जीवन में आगे बढ़ने व सुखमय जीवन के खातिर आचार -व्यवहार को परिवर्तनोंन्मुख बनाना होगा। दुनिया के साथ कदम-ताल मिलाकर चलना होगा क्योंकि परिवर्तन शाश्वत है।
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                   सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या रिश्तों को बनाए रखने के लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है?

क्या रिश्तों को बनाए रखने के लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है?
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जीवन अर्थात सामंजस्य। सामंजस्य स्थापित किए बिना हम कभी भी खुशहाल जीवन नहीं जी सकते। हमें पग पग पर अनेक विचारधारा के लोगों से आमना-सामना होता है।
 परिवार के सदस्यों के भी अपने निजी विचार होते हैं। सभी के विचारों को मान सम्मान देते हुए तादात्म्य संबंध स्थापित करते हुए हम जीवन के सफर में आगे बढ़ते रहते हैं। 
 कभी इच्छानुसार कभी अनिच्छा पूर्वक भी हामी भरनी पड़ती है, क्योंकि उससे अपनों की खुशी जुड़ी होती है।
 कोई जरूरी नहीं कि हम हर पल सही हो, यह भाव मन में रखते हुए हमें अपने विचारों में बदलाव कर सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है।
 प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है --फलों से लदा पेड़ सदा झुका रहता है। लचीली झुकी हुई डाली तेज हवाओं को भी झेल लेती है जबकि अकड़ी हुई डाली हवा के झोंके से टूट जाती है।
  ठीक इसी तरह हमें भी अपने व्यवहारों में लचीलापन रखते हुए पारिवारिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है तभी रिश्तों में मिठास चिरस्थाई बना रहता है। रिश्तों को बनाए रखने के लिए कभी-कभी कुछ सहना भी पड़ता है क्योंकि उसमें अपनों की खुशी छुपी होती है।
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                     सुनीता रानी राठौर
                      ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अपने विचार बदलने से विचारधारा अपने आप बदल जाएगी?

क्या अपने विचार बदलने से विचारधारा अपने आप बदल जाएगी?
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 हर इंसान अपने विचारों की दुनिया में जीता है। अपने विचार बदलने से विचारधारा अकस्मात नहीं बदलती पर धीरे-धीरे बदलाव जरूर आती है। खुद के बारे में और दूसरे को समझते हुए अपनी सोच बदल सकते हैं।
  सोच बदलते ही व्यवहार बदल जाता है और व्यवहार में बदलाव होते ही चीजें बदलने लगती हैं। सामने वाले की मानसिकता को भी थोड़ा बहुत प्रभावित कर बदल सकते हैं।
   अपने मानसिक अवरोधों को पहचानें, उस पर नियंत्रण करें। उन विचारों और विश्वासों पर प्रश्न उठाए जो आपको उचित नहीं लगता या दुख पहुंचाता है।
    सफलता पाने के लिए आपको उसकी उम्मीद करना भी आना चाहिए। खुद को ताकत देकर सकारात्मक सोच के साथ काम करना शुरू कर दें। जब आप निर्णय कर लेंगे तब उसके अनुसार लोगों को समझाते हुए कार्य करेंगे।
     एक कार्ययोजना के साथ आगे बढ़ने पर धीरे-धीरे सफलता मिलती है। उदाहरण स्वरूप- राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को खत्म करने की एक कार्य योजना बनाई और उस पर उन्होंने अमल करते हुए लोगों को साथ लेकर कार्य किया और अंततः उन्हें सफलता मिली।
      इस तरह हम कह सकते हैं कि अपने विचार बदलने से विचारधारा धीरे-धीरे बदल जाती है पर समाज के लोगों के विचारों को बदलने के लिए अथक प्रयास करते हुए संघर्षरत रहना पड़ता है, तदुपरांत लोगों की मानसिकता और विचारधारा को बदलना संभव होता है।
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               सुनीता रानी राठौर
             ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

हिंदी और शिक्षा

             हिंदी और शिक्षा
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गौरव अपने विद्यालय का सबसे होनहार विद्यार्थी था। दसवीं कक्षा तक वह हर बार कक्षा में प्रथम आता रहा। बोर्ड परीक्षा होते हीं उसे प्रतियोगिता परीक्षा की सनक सवार हो गई। मेडिकल की तैयारी के चक्कर में हिन्दी को नजरअंदाज करने लगा।
हमेशा अध्ययनरत रहता पर सिर्फ विज्ञान पर ध्यान देता। ऐसा होनहार विद्यार्थी जो 100 में 98%  अंक प्राप्त करता था वह हिन्दी विषय को बोलचाल की भाषा और आसान समझ कर उस पर मेहनत करना छोड़ दिया। 
 वह यह नहीं समझ पाया कि हिन्दी देखने में जितना आसान है यह विषय उतना ही कठिन है। हिन्दी में मात्रा और अन्य छोटी-छोटी गलतियों के कारण हमारे नंबर बहुत ही कट जाते हैं। हिन्दी के कारण ही हम दूसरे विषय पर भी अपनी अच्छी मजबूत पकड़ बना पाते हैं।
 गौरव की नासमझी का दुष्परिणाम भी यही हुआ।
 11 वीं का परिणाम इतना खराब आया कि वह अपने कक्षा में पांचवें नंबर पर पहुंच गया। उसे बहुत ही ज्यादा दुःख हुआ।
  हिन्दी को बिल्कुल नजरअंदाज करने का वह दुष्परिणाम भुगत रहा था। उसे अपनी हिन्दी अध्यापिका की सलाह बार-बार याद आ रही थी।आज उसे सीना तान कर अपने क्लास में सभी सहपाठियों के बीच में खड़ा होने का मौका नहीं मिला था। उसे बहुत अफसोस था कि मैंने अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को क्यों नजरअंदाज किया।उसके मम्मी-पापा जो प्रथम आने पर रिजल्ट लेने के लिए गर्व के साथ आते थे हर तरफ उसकी तारीफ होती थी आज वह सुनने को नहीं मिला।
   वह प्रायश्चित के भाव से अपनी हिन्दी अध्यापिका से माफी मांगने पहुंचा। उसे समझ में आ गया था कि हिन्दी ही हमारी आधार है , हमारी शिक्षा के नींव को मजबूत बनाती हैं। हिन्दी के बिना हम कहीं भी सफलता नहीं हासिल कर सकते।  हिन्दी को हल्के में न लें, परिश्रम से अच्छे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं और जीवन में भी सफल हो सकते हैं। हिन्दी की अच्छी शिक्षा हमारे लिए आन बान और शान है।
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                 सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अब डिजिटल की भाषा हो गई है हिन्दी?

क्या अब डिजिटल की भाषा हो गई है हिन्दी?
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सोशल मीडिया के हर भाग में हिन्दी के विस्तार प्रचार व प्रसार को देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि अब डिजिटल की भाषा हो गई है हिन्दी।
 कुछ वर्ष पहले तक की-बोर्ड में हिन्दी टाइपराइटिंग की सुविधा न होने के कारण हिन्दी भाषी अपने विचारों को खुलकर हर विधा में व्यक्त नहीं कर पाते थे। सर्वत्र अंग्रेजी का दबदबा दिखता था पर वर्तमान में हिंदी की सभी विधाओं में फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब चैनल पर हिन्दी भाषा में हर तरह के विषय वस्तु मौजूद है। गूगल द्वारा हिंदी में अपने इच्छानुसार प्रत्येक विषय की जानकारी हम प्राप्त कर लेते हैं।
  आज सभी को आगे बढ़ने के लिए हर भाषा के लिए डिजिटल क्रांति एक अवसर बनकर उभरा है। आज हिंदी की की-बोर्ड का ऐप्प विकसित करना व्यवसायिक सफलता बनता जा रहा है। हिंदी में सॉफ्टवेयर निर्माण के लिए थोड़ा जोर लगाने की जरूरत है। वैश्वीकरण के जमाने में सरकार से प्रोत्साहन की उम्मीद है। हिन्दी में सॉफ्टवेयर बनाने के लिए थोड़े से वित्तीय संसाधन और कुछ हिन्दी प्रेमी तकनीकी युवाओं की जरूरत है और हमारे यहां ऐसे होनहार युवाओं की कमी नहीं है।सभी के सहयोग से हम ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं और यह कहना गलत नहीं होगा कि अब डिजिटल की भाषा हो गई है हिंदी।
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                    सुनीता रानी राठौर
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

सकारात्मक सोच सुख का रहस्य


      सकारात्मक सोच सुख का रहस्य
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सकारात्मक सोच का जादू हमें अपने जीवन में प्रायः देखते हैं। सकारात्मक सोच से मन को शांति और सुकून मिलता है। शांति और सुकून ही जीवन का वास्तविक सुख है।
 हमारे जीवन में विचारों का महत्वपूर्ण स्थान है।
 सकारात्मक विचार दूसरों के प्रति प्रेम और सद्भावना को जन्म देती है जबकि नकारात्मक विचार ईर्ष्या और द्वेष। सकारात्मक विचार नकारात्मक की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली होते हैं।
विचार भी संक्रामक होते हैं। सकारात्मक और आशावादी सोच वाले की संगत में हमारे विचार भी सकारात्मक बनते हैं और हमारे विचार आत्मविश्वास से परिपूर्ण होते हैं। इसके विपरीत नकारात्मक सोच वाले के संगत में रहकर हम हमेशा उदास और जीवन से निराश खुद को महसूस करते हैं।
इसलिए कहा गया है कि सकारात्मक सोचें, उसी तरह की रचनाएं पढ़ें, वैसे लोगों की संगत में रहें तब हमारे अंदर serotonin, Endorphins,Dapamine आदि हार्मोन का स्राव होता है जो हमें तनाव से मुक्ति दिलाता है और मन प्रसन्न चित्त रहता है।
  धन दौलत का सुख क्षणिक सुख होता है क्योंकि उसे खोने के डर से मन हमेशा सशंकित रहता है पर मन का सुख चिरस्थाई है जो सकारात्मक सोच से मिलता है। मन हमेशा प्रसन्नचित और आनंदित रहे इससे बड़ा कोई सुख नहीं। वास्तव में सकारात्मक सोच ही सुख का रहस्य है। सकारात्मक सोच का जादू जीवन में खुशियां बिखेरता है।
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                    सुनीता रानी राठौर 
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या 'मां' का मतलब सिर्फ जन्म देने से है?

क्या 'मां' का मतलब सिर्फ जन्म देने से है?
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मां से हमारे अस्तित्व की पहचान होती है। हमारी विशेषताएं, हमारी खूबियां हमारे व्यक्तित्व की पहचान मां से है। मां के विशेषताओं का शब्दों में उद्गार करना भी असंभव है।
मां का मतलब सिर्फ जन्म देना--ऐसा विचार रखने वालों की मानसिक संकीर्णता साफ दृष्टिगोचर होती है। जो मां के ऊपकार को भूल सकता है वह जीवन में किसी का भी अपना नहीं बन सकता।
   मां हमें जन्म देने, पालन- पोषण करने के साथ-साथ हमारे व्यक्तित्व का सम्पूर्ण निर्माण करती हैं। उनके एहसानों का बदला उनका ॠण हम किसी भी कीमत पर कभी भी नहीं चुका सकते।      
   मां के प्रति अपने भाव का समर्पण हम सेवा भाव के द्वारा हीं जता सकते हैं। ईश्वर को किसी ने नहीं देखा ,साक्षात रुप में मां-पिता हीं ईश्वर समान होते हैं जो हमारे लिए वरदान साबित होते हैं।
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                     सुनीता रानी राठौर 
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

पितृपक्ष

🙏 पितृपक्ष🙏
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पितृपक्ष में पूर्वजों के आत्मा को देते तर्पण
अच्छा व्यवहार जीवन में तभी होगा तर्पण।
पूर्वजों के त्याग को याद दिलाता पितृपक्ष,
सम्मान, आदर भाव का पहचान ये तर्प़ण।

हमारे अस्तित्व को बनाए रखता पितृपक्ष,
गलतियों को याद करने का दिन पितृपक्ष।
संस्कारों को बनाए रखने का  ये तरकीब,
अपनों के प्यार का इज़हार होता पितृपक्ष।
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                 सुनीता रानी राठौर
                 ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या बुद्धिमता का पता मनुष्य के व्यवहार से मालूम होता है?

क्या बुद्धिमता का पता मनुष्य के व्यवहार से मालूम होता है?
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जी हां बुद्धिमता का पता मनुष्य के व्यवहार से मालूम होता है। व्यक्ति का दृष्टिकोण या नजरिया उसकी वैचारिक क्षमता व विवेक बुद्धि पर निर्भर करता है। समय के अनुसार किए गए कार्य पर ही सकारात्मक या नकारात्मक छवि बनती है। इसी के आधार पर वो अपने भीतरी क्षमता और दिमागी सक्रियता का इस्तेमाल करता है।
कितनी भी हम डिग्रियां हासिल कर लें पर हमारा व्यवहार सही नहीं है, नैतिक दृष्टि से माननीय नहीं है तो हम बुद्धिमान नहीं कहला सकते। अगर कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी समाज में नैतिकता का परिचय देते हुए सद्व्यवहार करता है तब उसकी बुद्धिमता की तारीफ होती है। पढ़ा-लिखा अहंकारी, नासमझ, दुर्व्यवहार करने वाला व्यक्ति कभी काबिल-ए-तारीफ नहीं होता।
हमारा लोगों के साथ आचार-व्यवहार, कठिन परिस्थितियों में लिया गया निर्णय, विषम घड़ी में सामंजस्य स्थापित करने की चेष्टा आदि ही हमारी बुद्धिमता का परिचायक है। इसलिए कहना असत्य नहीं कि बुद्धिमता का पता मनुष्य के व्यवहार से मालूम होता है।
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                     सुनीता रानी राठौर
                ग्रेटर नोएडा उत्तर प्रदेश

हिंदी हमारी शान


‌।                हिंदी हमारी शान
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    हिंदी हिंदुस्तान की आन बान शान है। प्रतिष्ठा और सम्मान है। यह 18 भाषाओं को समग्रता में समेटती है। हमारी हिंदी भाषा मधुर, मीठी और सरल भाषा है। यह विश्व पटल पर दूसरे नंबर पर प्रचलित भाषा है। 
     हिंद और हिंदी एक दूसरे के पूरक हैं। हिंदी को जनमानस की भाषा भी कहा जाता है। यह भाषा हमारी संस्कृति को परिभाषित करती है। जिस तरह हमारा देश धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनकर अनेकता में एकता का मिसाल पेश करता है उसी तरह 18 प्रांतीय भाषाओं को समेटे हुए हिंदी भाषा सभी को एक सूत्र में बांधती है।
    हिन्दी भाषा को 14 सितंबर 1953 को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया। इसलिए 14 सितंबर को राष्ट्रपति के द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में हिंदी से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों में श्रेष्ठता पूर्ण कार्य के लिए लोगों को सम्मानित भी किया जाता है।  
     हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है और इस पर हम सभी को गर्व है। 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस और 14 सितंबर को राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं। हिंदी हमारी आन बान और शान है।
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                सुनीता रानी राठौर
               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

साक्षरता


               साक्षरता
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  बचपन में ही मां के गुजर जाने के कारण मीनू के पिताजी ने दूसरी शादी कर ली थी। पिताजी पर  सौतेली मां का दबदबा था। मीनू की सौतेली मां सारा दिन घर का काम कराती। दूसरे बच्चे को स्कूल जाते देख मीनू को भी बहुत पढ़ने का मन करता पर उसे स्कूल भेजने के नाम पर मां तरह तरह का बहाना बना देती। इसे पढ़ कर क्या करना आखिर जाना तो है दूसरे घर में, वहां पर भी घर ही संभालना है वगैरह-वगैरह।
   समाजसेविकायें उन्हें साक्षरता के महत्व को बताते हुए बच्ची को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करती पर वह किसी का नहीं सुनती।
    बहुत कम उम्र में ही मीनू की शादी कर दी गयी। मीनू के ससुराल वाले अच्छे नहीं थे। पति भी शराब पीकर पीटा करता। मीनू असहाय लाचार चुपचाप काम में लगी रहती। इसके दर्द और पीड़ा को देखकर के पड़ोसी बोलते-- तुम अपने पैरों पर खड़ी हो जा। क्यों इतना अत्याचार सहती हो?
     पर मीनू जानती थी कि मैं तो पढ़ी लिखी नहीं हूं मैं क्या कर सकती हूं?
     उसके दर्द को देखकर उसके पिताजी को भी तरस आने लगा था और उन्हें भी अब बहुत अपने आप पर ग्लानी महसूस होने लगी थी। 
     वे दुखी थे यह सोच कर कि अगर मैं अपनी बिटिया को साक्षर किए होता तो आज इतना अत्याचार नहीं सहना पड़ता। बचपन में सौतेली मां का अत्याचार झेली और अब अपने ससुराल वालों का।आज अगर यह साक्षर होती तो खुद अपने पैरों पर खड़ी हो सकती थी।
     उन्होंने फैसला किया देर से ही सही पर मैं अपनी बिटिया को अपने पास रख कर पढ़ाई करवा कर उसे साक्षर बनाऊंगा ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके।
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                     सुनीता रानी राठौर 
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अब साबित हो जाएगा कि सुशांत सिंह राजपूत के मौत की मुख्य वजह रिया चक्रवर्ती है?

क्या अब साबित हो जाएगा कि सुशांत सिंह राजपूत के मौत की मुख्य वजह रिया चक्रवर्ती है?
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सुशांत सिंह राजपूत के मौत की मुख्य वजह रिया चक्रवर्ती है या नहीं यह तो अब मिले तथ्यों के आधार पर साबित करना सीबीआई की जिम्मेदारी बनती है या उस आधार पर उस के माध्यम से असली गुनाहगार तक पहुंचना भी सीबीआई का मकसद हो सकता है। असली गुनाहगार पकड़ा जाए यही ध्येय भी होना चाहिए।
परंतु इस केस में दिखाई गई तत्परता से हम सभी इतना समझ गए कि अगर पुलिस और सीबीआई तत्परता से काम करें तो गुनाहगार को शिकंजे में कसने में सालों साल समय नहीं बर्बाद होगा।
  हजारों ऐसे परिवार हैं जिनके बच्चों का हत्यारा बेखौफ होकर कानून को ठेंगा दिखाकर समाज में घूम रहा है।अगर न्याय प्रक्रिया ईमानदारी से काम करें तो लोगों में भय बैठेगा और निर्दयता पूर्ण किसी की हत्या करने से वे डरेंगे। आम जनता के लिए भी    न्याय प्रक्रिया इसी तरह सख्त और विश्वसनीय अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
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                     सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा उत्तर प्रदेश

रिया चक्रवर्ती की अभी तक गिरफ्तारी क्यों नहीं या वह बेकसूर है?

रिया चक्रवर्ती की अभी तक गिरफ्तारी क्यों नहीं या वह बेकसूर है?
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अभिनेता सुशांत सिंह आत्महत्या केस में रिया चक्रवर्ती को गुनाहगार माना गया और उस एंगल से मुंबई पुलिस ने जांच पड़ताल की उसके बाद सीबीआई भी कर रही है, पर जब तक ठोस सबूत हासिल न हो किसी को गिरफ्तार करना नियम के खिलाफ होगा। इस कारण शायद गिरफ्तारी नहीं हो रही।
  सीबीआई की एक अपनी जिम्मेदार छवि है ।जल्दीबाजी में कोई कदम उठाना भी उनके लिए अच्छा साबित नहीं होगा। पूरी जांच पड़ताल के बाद ही साबित हो पाएगा कि रिया चक्रवर्ती बेकसूर है या गुनाहगार।
   अगर गुनाहगार साबित होती है तो गिरफ्तारी संभव है अन्यथा कानून या मानवता के आधार पर किसी के जिंदगी पर गिरफ्तारी का धब्बा लगाना भी उचित नहीं होता। इसलिए सीबीआई भी  फूंक फूंक कर कदम रख रही है।
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                            सुनीता रानी राठौर
                           ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

रेलवे का निजीकरण


           रेलवे का निजीकरण
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किसी क्षेत्र या उद्योग के स्वामित्व को जब सरकारी हाथों से लेकर निजी हाथों में सौंपा जाता है तब निजीकरण कहलाता है।
 भारतीय रेलवे को केंद्र सरकार सार्वजनिक कल्याण को बढ़ाने के लिए चलाती है ना कि लाभ कमाने के उद्देश्य से। 
 वर्तमान में इस ट्रेनों का रेगुलेशन और मैनेजमेंट इंडियन रेलवे ही करता है लेकिन अब मैनेजमेंट का काम प्राइवेट प्लेयर्स के हाथ में चला जाएगा। भारत सरकार ने इंडियन रेलवे के निजीकरण की दिशा में कदम उठाते हुए 109 रोड पर 151 यात्री से चलाने के लिए प्राइवेट पार्टी को इनविटेशन दिया है।
 इसकी शुरुआत हाल के दिनों में पूर्ण रुप से निजी कंपनी द्वारा चलाई गई तेजस एक्सप्रेस से हुई है जिसमें दिए गए सुख-सुविधाओं में लोगों को प्रभावित किया है। 
 इस निजीकरण के पीछे भारतीय रेलवे का उद्देश्य रेलवे को लेटलतीफी से छुटकारा दिलाना यात्रियों की सुरक्षा बढ़ाना, यात्रियों को विश्वस्तरीय यात्रा का अनुभव प्रदान कराना और सभी यात्रियों को कंफर्म टिकट उपलब्ध कराना है।
  भारत में 33% पैसेंजर गाड़ियां समय पर नहीं चलती हैं। ट्रेनों के सुचारू रूप से परिचालन के कारण समय की काफी बचत होगी। ट्रेन के अंदर बेहतर सुख सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। साफ-सफाई बेहतर होगी। निजीकरण द्वारा इन्हें पूरा करवाना मुख्य उद्देश्य भी है।
 परन्तु निजीकरण के नुकसान को अगर महसूस करें तब यह भी कटु सत्य है कि निजी कंपनियों का मुख्य उद्देश्य पैसा कमाने का होता है। रेलवे को भी ये उसी नजरिए से देखेंगे और प्रयोग करेंगे।
     निजीकरण का सबसे बुरा प्रभाव रेलवे के किरायों में बढ़ोतरी का होगा जिसे गरीब और मध्यम वर्ग बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।
    दूसरा सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियां खत्म होगी क्योंकि निजी प्लेयर्स कम लोगों से ज्यादा काम करवा कर  अधिकतम लाभ कमाना पसंद करेंगे।
 निष्कर्षत:कह सकते हैं कि रेलवे का निजीकरण ठीक वैसा ही परिणाम लाएगा जैसा कि सरकारी और निजी स्कूलों के बीच है।सरकारी स्कूल की स्थिति अच्छी नहीं है और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना गरीब जनता के लिए संभव नहीं है।
   इन मुख्य बातों को ध्यान दिए बगैर भारत सरकार यदि रेलवे का निजीकरण करती है तो यह गरीब तबके और बेरोजगार युवाओं के लिए सबसे बुरा होगा। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए सरकार द्वारा उठाया यह कदम है पर देश की अर्थव्यवस्था को इस निजीकरण से फायदा कराने के लिए सरकार को इतनी बड़ी जनसंख्या का नुकसान नहीं करनी चाहिए।
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                   सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या निर्भीक होने का मतलब आक्रमक होना है?

क्या निर्भीक होने का मतलब आक्रमक होना है?
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निर्भिक होने का मतलब आक्रमक होना नहीं होता है। निर्भीक का अर्थ साहसी, निडर, आत्मविश्वासी के रूप में लिया जाता है।आत्मविश्वास से पूर्ण व्यक्ति निर्भीक होकर अपना निर्णय लेता है, हर कार्य को पूर्ण करता है। अपने व्यक्तित्व का प्रदर्शन करता है जबकि आक्रामकता कुंठा के रूप में प्रदर्शित एक सामान्य प्रक्रिया है।
   आक्रामकता मौखिक भी होती है और शारीरिक भी। व्यक्ति ईर्ष्या, द्वेष व कुंठा से ग्रसित होकर आक्रामक व्यवहार करते हुए अभद्र भाषा का व्यवहार करता है कभी शारीरिक रूप से आक्रमक होते हुए हमलावर हो जाता है।
सकारात्मक पक्ष में आक्रमक होना कभी-कभी खिलाड़ियों के संदर्भ में प्रस्तुत होता है। जैसे- अपने हार को जीत में बदलने के लिए आक्रामक रूप अख्तियार कर वे कठिन परिश्रम करते हैं और जीत हासिल करते हैं।
     निर्भीक शब्द सदैव सकारात्मक रूप में प्रयोग होता है जबकि आक्रामक शब्द नकारात्मक रूप में। आक्रामक व्यवहार बोलचाल या आचरण सदैव निंदनीय होता है। ये किसी के हित में नहीं होता जबकि निर्भीक होना सदैव लाभकारी और हितकर होता है। निर्भीक होने पर हम सदैव आगे बढ़ने को तत्पर रहते हैं और हमें सफलता प्राप्त होती है।
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                     सुनीता रानी राठौर 
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

चरित्रवान शिक्षक कैसे तैयार होंगे?

चरित्रवान शिक्षक कैसे तैयार होंगे?
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शिक्षक वह पथप्रदर्शक होते हैं जो हमें किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं। शिक्षक को ईश्वर तुल्य माना जाता है।
    आज भी बहुत से शिक्षक शिक्षकीय आदर्शों पर चलकर एक आदर्श मानव समाज की स्थापना में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
शिक्षक समाज में उच्च आदर्श स्थापित करने वाला व्यक्तित्व होता है। शिक्षक विद्यार्थी का जीवन गढ़ते हैं। मार्गदर्शक बनकर समाज को भी राह दिखाते हैं। इसलिए शिक्षक को 'समाज का शिल्पकार' भी कहा जाता है।
   वर्तमान समय में कुछ शिक्षक ऐसे हैं जो शिक्षा को व्यवसाय बनाकर शिक्षक के नाम पर धब्बा लगा रहे हैं। चरित्रवान शिक्षक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका हमारी शिक्षा नीति की भी होती है अगर उच्च मूल्य स्थापित करने वाली शिक्षा नीति हो तो शिक्षक भी चरित्रवान बनेंगे। 
      आर्थिक, सामाजिक,सांस्कृतिक विकास के साथ ही साथ शिक्षक का चरित्र निर्माण भी देश की शिक्षा नीति पर निर्भर होता है। शिक्षक प्रशिक्षण काल में उन मानवीय गुणों पर आधारित पाठ्यक्रम हो जिसमें उनके अंतर्मन में ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, लालच ,अहंकार पक्षपातपूर्ण रवैया आदि दुर्गुणों का निराकरण और समभाव, सद्भावना, परोपकार, दया, सहानुभूति आदि मानवीय गुणों का समावेश हो। इस तरह के प्रशिक्षण के द्वारा ही उनके हृदय में नैतिक भाव का समावेश होगा और वे अनैतिक कार्यों से दूर रहेंगे। वह अपने धर्म को ईमानदारी पूर्ण तरीके से निभा सकेंगे। चरित्रवान शिक्षक के रूप में आदर्श बनकर विद्यार्थियों के पथ प्रदर्शक बनेंगे।
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                     सुनीता रानी राठौर 
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

हमारे जीवन में शिक्षक का महत्व


          हमारे जीवन में शिक्षक का महत्व
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हमारे जीवन में व्यक्तित्व को संपूर्णता प्रदान करने में शिक्षक का महत्वपूर्ण योगदान होता है। प्रथम गुरु माता-पिता सही मार्गदर्शन करते हुए हमें विद्यालय भेजकर अलग-अलग विषयाध्यापक के द्वारा ज्ञानार्जन प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
    विद्यालय में शिक्षक मार्गदर्शक बनकर सही राह दिखाते हैं। हमारे हृदय की अज्ञानता को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश भरते हैं। शिक्षक हीं हमें अच्छा  इंसान और देश का कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनाते हैं।
     शिक्षक देश के कर्णधार और बच्चे भावी कर्णधार होते हैं। देश का भविष्य उनके हाथों में होता है। वो भावी कर्णधार को बुद्धिजीवी बनाकर सक्षम बनाते हैं। ज्ञान का दीप जला कर सत्य-सत्य, नैतिक-अनैतिक का पहचान कराते हैं। अगर हमारे जीवन में शिक्षक न हो तो हम अज्ञानी रह जाएंगे। विवेकशील प्राणी नहीं बन पाएंगे, परंतु सिर्फ विद्यालय के शिक्षक या द्रोणाचार्य जैसे ऋषि ही सिर्फ गुरु नहीं कहलाते हमारे जीवन में राह चलते बड़े बुजुर्ग या बच्चे जो भी सही ज्ञान दें वह हमारे ह्रदय में गुरु का सम्मान पाते हैं।
      जीवन को गुणों से परिपूर्ण बनाने वाले शिक्षकों के महत्व का जितना गुणगान किया जाए उतना कम है। इसलिए हम 5 सितंबर को भले ही शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं पर प्रतिदिन प्रति पल उनका आभार जताते हुए श्रद्धा से नतमस्तक रहते हैं।
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                   स्वरचित मौलिक रचना
                    सुनीता रानी राठौर 
                    ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

कड़ी मेहनत का परिणाम भी बुरा होता है ?

कड़ी मेहनत का परिणाम भी बुरा होता है ?
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 हम बचपन से ही सुनते आए हैं कि कड़ी मेहनत से ही सफलता मिलती है और यह बात सत्य भी है पर कभी-कभी कड़ी मेहनत के बावजूद भी सफलता नहीं मिलती। इसका मुख्य कारण यह होता है कि हम मेहनत लक्ष्य के अनुसार सही दिशा में नहीं करते।
  सही समय पर सही दिशा में प्रयास करना ही सार्थक होता है। जब तक हम स्मार्ट वर्क को हार्ड वर्क से नहीं जोड़ेंगे तब तक सफलता हमसे दूर रहेगी।
   समय और हालात पर नजर रखते हुए कार्य करें। बिना सोचे समझे कड़ी मेहनत न करें। उदाहरण स्वरूप ऐसा न हो कि दूसरे को देखकर हमें भी मेडिकल लाइन में जाने की तमन्ना जाग उठी जबकि बायोलॉजी हमारे समझ से बाहर है। ऐसे में कड़ी मेहनत भी निरर्थक साबित हो सकती है। भेड़-चाल में न चल कर अपनी रुचि, काबिलियत और क्षमता के अनुसार ही अपना लक्ष्य निर्धारित करें, तभी आपको मेहनत का परिणाम सफलता के रूप में मिलेगा और आपके सपने भी पूर्ण होंगें।
-------------*--------- सुनीता रानी राठौर
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

कोरोना काल में आपने क्या सीखा है?

कोरोना काल में आपने क्या सीखा है?
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 कोरोना काल में जीवन की क्षणभंगुरता को महसूस कर कम साधन में सादगी पूर्ण जीवन जीना सीखा। हृष्ट पुष्ट स्वस्थ्य संपन्न व्यक्ति  खुद को, अपने परिवार के सदस्यों को नहीं बचा पा रहे, मौत का भयावह मंजर देख इंसान के बेबसी को महसूस किया।
  स्वास्थ्य कर्मियों के साथ -साथ दाह संस्कार करवाने तक और साथ ही दूसरे धर्म के लोग जिस तरह से (जिनके अपने बच्चे साथ नहीं दिए )उनका साथ निभाते हुए इंसानियत का परिचय दिया उसे देख कर मानवता को निभाना सीखा। 
  साफ सफाई पर गंभीरता से ध्यान देना सीखा।ऑनलाइन पढ़ाई के साथ-साथ ऑनलाइन कार्यक्रम देना और प्रतियोगिता में प्रतिभागी बनना सीखा।
  सालों साल कंपनियां घर से अपना कार्य सुचारु रुप से जारी रख सकती है यह भी देखा और सीखा।
   चुनाव प्रचार के लिए वर्चुअल रैली का भी ज्ञान मिला।  ऑनलाइन खरीदारी करना सिखा। शादी पर जो फिजूलखर्ची होती थी वह कम खर्चे में सादगी पूर्ण तरीके से किस तरह कराई जा सकती है यह भी सीखने को मिला।
   साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बात पहली बार घर के सदस्यों को एक साथ रहने का मौका मिला जिससे पुरुष वर्ग के लोग और कामकाजी बेटियों को तरह-तरह के व्यंजन बनाना सिखाया और बच्चों के सहयोग से यूट्यूब के द्वारा हमने भी तरह-तरह के साज सज्जा के साथ नये व्यंजन बनाना भी सीखा और साथ ही तरह -तरह के विषयों से संबंधित ज्ञानार्जन भी की किए।
   इस तरह से समय का सदुपयोग करते हुए विविध चीजों का ज्ञान प्राप्त कर हमने अपने जीवन को गुणों से सुसज्जित कर व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास किया।
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                       सुनीता रानी राठौर 
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

रिया चक्रवर्ती वी.आई.पी है या कुछ और

रिया चक्रवर्ती वी.आई.पी है या कुछ और --
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रिया चक्रवर्ती वी.आई.पी मीडिया द्वारा बना दी गई। पल-पल की पूछताछ की खबरें और आने-जाने का वीडियो दिखा कर मीडिया हाईलाइट करती रही।
  मीडिया दूरदराज गांव में घूमकर कोरोना महामारी से संबंधित या बाढ़ में पीड़ित लोगों का न्यूज़ कवर नहीं कर सकती , न हीं वर्तमान हालातों पर नेताओं की खामियों को दिखाने की हिम्मत जुटा सकती इसलिए अपनी खामियों को छुपाने के लिए एक न्यूज़ को रगड़ते रहती है।
   अगर नेता और मीडिया इतने ही इंसाफ दिलवाने वाले हैं तो और भी खून के आंसू रोने वाले दुखियारी मां-बाप के दर्द के प्रति सहानुभूति दिखाकर अपना साथ देते हुए आवाज उठाकर इंसाफ दिलवाये। जनता में विश्वास जमेगा। एक उम्मीद जागेगी की ये कर्तव्यनिष्ठ मीडिया अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाती है। बड़ी-बड़ी मछलियां बेदाग बच जाती हैं। छोटी मछलियों को पकड़कर पुलिस वाले और मीडिया शोर मचाते रहते हैं और वाहवाही लूटते रहते हैं।हमें बहुत खुशी होगी कि वास्तविक अपराधी पकड़ा जाए और और परिवार को न्याय मिले।
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                       सुनीता रानी राठौर
                    ग्रेटर नोएडा(उत्तर प्रदेश)

गरीबी कम करने में नारियल का महत्व


       गरीबी कम करने में नारियल का महत्व
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   विश्व नारियल कोकोनट- डे और ओणम पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
       नारियल का पेड़ समुद्री किनारे पर ज्यादातर मात्रा में पाए जाते हैं क्योंकि वो वातावरण नारियल-पेड़ के लिए अनुकूल होता है। केरल जहां ओणम का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है वहां नारियल के पेड़ बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं।
       गरीब जन नारियल के पेड़ और फल का तरह- तरह से उपयोग करते हुए अपने स्तर पर व्यापार कर अपनी रोजी-रोटी का साधन जुटा लेते हैं। गली-गली नारियल बेचकर आमदनी का स्रोत बना लेते हैं।
      नारियल का पेड़ हो या नारियल का फल सब खूबियां बटोरे हुए है। हर तरह से इसका इस्तेमाल होता है। नारियल का सूखा पेड़ नाव बनाने में,पत्ते झाड़ू, चटाई बनाने में, तरह-तरह के सजावटी सामान बनाने में बखूबी इस्तेमाल होता है।
      इसी तरह कच्चा नारियल पानी पीने में, पक्का नारियल मंदिर पूजन के साथ-साथ स्वादिष्ट मिठाई  तेल आदि बनाने में प्रयोग होता है। नारियल से बने सामानों का प्रचुर मात्रा में निर्यात भी होता है। जहां पर नारियल ज्यादा मात्रा में होता है वहां के गरीब व्यक्ति भी छोटे- छोटे व्यापार कर अपनी स्थिति को अच्छी बना लेते हैं। 
      कम पैसे में व्यापार की शुरुआत कर प्रसिद्ध व्यापारी बनने में भी नारियल का बहुत योगदान होता है। इसलिए कहा गया है कि गरीबी कम करने में नारियल का बहुत महत्व है।
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               सुनीता रानी राठौर 
               ग्रेटर नोएडा उत्तर प्रदेश

क्या जीवन का मूल मंत्र सहनशीलता है?

क्या जीवन का मूल मंत्र सहनशीलता है?
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 जीवन के मूल मंत्र में धैर्य, संयम, , सहनशीलता,परोपकार दया भाव, दक्षता आदि मुख्य हैं।
   सहनशीलता मनुष्य का आभूषण है।
सहनशीलता व्यक्तित्व का सबसे उत्कृष्ट गुण है। जिस व्यक्ति में सहनशीलता नहीं वह विपरीत परिस्थितियों में टूट जाता है। अगर व्यक्ति में सहनशीलता का भाव न हो तो उसे कई बार अप्रिय स्थितियों से गुजरना पड़ता है। इसके अभाव में व्यक्ति में क्रोध पैदा होता है। क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
उत्तम चरित्र के निर्माण में सहनशीलता एक आधारस्तंभ है। समाज में हो रही हिंसक घटनाएं सहनशीलता के अभाव में जन्म ले रही है। किशोर युवा सहनशीलता के अभाव में आक्रामक हो खून खराबा कर रहे हैं और गलत मार्ग पर भटक रहे हैं।
   हमें पारिवारिक जीवन में भी यही सिखाया जाता है कि संवेदनशीलता और सहनशीलता सफल जीवन का मूल मंत्र है। यह मन का सबसे बड़ा उपहार है क्योंकि यही हमें पशुओं से अलग करता है और हम एक आदर्श समाज की परिकल्पना करते हुए सामाजिक प्राणी के रूप में सभी से मिलजुल कर रहते हैं।
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                       सुनीता रानी राठौर
                        ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अंग्रेजी जरूरी आजकल ?


        क्या अंग्रेजी जरूरी आजकल ?
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जिस तरह हमारा देश धर्मनिरपेक्ष देश है। सभी धर्मों को साथ लेकर चलता है ठीक उसी तरह हमारी हिंदी भाषा भी अनेक भाषाओं का सम्मिश्रण है पर वर्तमान में हिन्दी के बाद अंग्रेजी को प्राथमिकता ज्यादा दी जा रही है।
 अगर हमें कूपमंडूक बन कर नहीं रहना है तो हमें  हिन्दी के साथ-साथ अन्य भाषाओं को अहमियत देना भी चाहिए विशेषकर अंग्रेजी को। अगर हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी का भी ज्ञान हो तब हम अपने देश के सभी प्रांत और साथ ही विदेशों में भी दूसरों से संपर्क स्थापित कर पायेंगे और विविध ज्ञान अर्जित कर पायेंगे।
मैं महात्मा गांधी के इस विचार का पूर्ण समर्थन करती हूं ---अपने घर की खिड़की सदा खुली रखें स्वच्छ हवा आने दें प्रदूषित हवा आए तो बंद कर दें।
  तात्पर्य यह कि अगर हमें अच्छे गुण सीखने को मिलते हैं जिससे हमें फायदा हो रहा हो तो हमें बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
     हिन्दी में अंग्रेजी शब्द का प्रयोग करने की जहां तक बात है वह भी समय की मांग है क्योंकि कुछ-कुछ हिंदी शब्द इतने जटिल और दीर्घ होते हैं कि उसका उच्चारण करना आसान नहीं होता उसके जगह अंग्रेजी शब्द छोटा और आसान होता है। 
     जैसे--रेल का हिंदी शब्द---लौह पथ गामिनी और रेलवे स्टेशन का हिंदी अर्थ-- लौह पथ गामिनी विराम बिंदु आदि।
     हमारे हिंदी भाषा में अंग्रेजी, उर्दू ,फारसी, तुर्की इतने अन्य भाषा मिश्रित हैं कि हम कभी-कभी पहचान ही नहीं पाते कि हम हिंदी बोल रहे हैं या उर्दू ।
     जिस तरह हमारा देश विविधता में एकता की पहचान है ठीक उसी तरह हमारी हिंदी भाषा भी विविधता में एकता की पहचान है।
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              सुनीता रानी राठौर
               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या दुश्मन को भी दोस्त बनाना एक कला है?

क्या दुश्मन को भी दोस्त बनाना एक कला है?
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दुश्मन को दोस्त बनाना वास्तव में एक बेहतरीन कला है। अपने सद्व्यहारों एवं नैतिक आचरण द्वारा हम दुश्मन का भी दिल जीत सकते हैं, उनका हृदय परिवर्तित कर सकते हैं और अपना खास दोस्त बना सकते हैं। ऐसी दोस्ती अमिट होगी।
   कोई भी इंसान न जन्मजात दोस्त होता है ना ही दुश्मन। हम अपने व्यवहार और कार्य के द्वारा दोस्त बनाते हैं और किसी को दुश्मन।
  अगर हम अपनी गलतियों को महसूस कर स्वीकार करें, उसके लिए क्षमा मांग लें तो सामने वाले विरोधी का भी हृदय द्रवित हो जाता है और वह भी अपने अक्कड़पन को त्याग अपनी खुद की खामियों को महसूस करने लग जाता है और वह दुश्मन भी दोस्त बन जाता है।
   अहं,आन और जिद  इंसान के पथ का रोड़ा है।  इसे त्यागकर विचार-विमर्श कर दुश्मन को दोस्त बना सकते हैं पर यह भी सबके वश की बात नहीं है क्योंकि यह भी एक कला है।
    महात्मा गांधी अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपने व्यवहार से विरोधियों के चहेते बन गए और यही कारण है अफ्रीका से लेकर अन्य देशों में भी श्रद्धा पूर्वक उनकी प्रतिमा लगाई जाती है। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे समाज में विद्यमान हैं।
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             सुनीता रानी राठौर
       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

अपनी सफलताओं से खुश रहना कैसे सीखें?

अपनी सफलताओं से खुश रहना कैसे सीखें?
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    खुश रहना जीवन का चरम पहलू नहीं बल्कि बुनियादी पहलू है। मन आत्मविश्वास से भरा हो तब हम सदैव कुछ न कुछ नए कार्य करने के लिए जागरूक रहते हैं और हमें सफलता भी प्राप्त होती है हमारा मन भी प्रसन्नमय रहता है।
     आत्मविश्वास एक ऐसी चीज है जिस में खुशियां या कहें सफलता चुंबक की तरह खिंची चली आती है और हमें आनंद प्राप्त होता है।
      जीवन में घटित घटनाओं के सकारात्मक पहलू पर अगर आप ध्यान दें तो खुशियां प्राप्त होती हैं। जीवन में हमेशा कुछ न कुछ नया क्रिएटिव करते रहें। स्पेशल कुछ खास कार्य करने को सोचें। खुशियां आपकी ओर अट्रैक्ट होती जाएंगी और आप खुश रहेंगे।
       हमेशा अपने चेहरे पर स्माइल रखें। माहौल खुशनुमा रहेगा। नकारात्मक सोच, बुराई या बदले की भावना आदि विचारों से दूर रहें। अपने परिवार में खुशियां बांटे। मिलजुल कर बाहर घूमने जाएं। पारिवारिक झंझटों से थोड़ी देर मुक्ति पाकर आनंद लें। मधुर संगीत सुनें। छोटी-छोटी सफलता पर खुश मिजाज रहें। तभी बड़ी सफलता पास आएगी।
        हमेशा खुद पर और ईश्वर पर विश्वास रखें। समयानुसार ईश्वर से प्रार्थना और मेडिटेशन जरूर करें। आप हमेशा प्रसन्नचित्त रहेंगे।
        निर्णय लें छोटी सी जिंदगी है दुखी रह कर खराब नहीं करना है। हर दिन सुबह उठते हीं ठान लें, मुझे खुश रहना है और आज नया कार्य करना है। हमेशा अपनी मंजिल की तरफ एक कदम बढ़ाए इससे आपके हृदय में हमेशा प्रसन्नता भरी रहेगी।
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                    सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Wednesday, 26 August 2020

क्या हम सब समय की कसौटी पर कसे जाते हैं?

   यह सर्वविदित है कि हमारा जीवन उतार-चढ़ाव से भरा है। हम अपने  रिश्तेदारों या दोस्तों के साथ कई अहम परिस्थितियों या विपत्तियों से होकर गुजरते हैं और जीवन के इस युद्ध क्षेत्र में साहसी योद्धा या कायर की भांति हम सब समय की कसौटी पर कसे जाते हैं।
कसौटी का अर्थ है-- जांचना या परखना ।
रहीम जी ने कहा है- 
      'विपत्ति कसौटी जे कसे तेई सांचे मीत' 
अर्थात विकट घड़ी में हीं इंसान की सही पहचान होती है। सुनहरे समय में हजारों दोस्त रिश्तेदार हमारे हितेषी बनते हैं या बनने को तैयार रहते हैं पर मुसीबत की घड़ी में कौन कितना साथ देता है इसका निर्णय समय की कसौटी ही करता है।
   कृष्ण- सुदामा की सच्ची दोस्ती की परख विपत्ति के समय में सुदामा का कृष्ण के महल में पहुंचने पर प्रेमपूर्वक स्वागत के बाद ही हुआ था।
 हमारा भी फर्ज है कि अपने मार्ग में आने वाले हर बाधा को तोड़ते हुए अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर मेहनत और परिश्रम के साथ आगे बढ़ते रहें  और जीवन की कसौटी पर खरा उतरें।
    जो मुश्किल घड़ी में डटकर संघर्ष कर आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है वही व्यक्ति जीवन में सफलता को प्राप्त कर पाता है। हम सब कभी ना कभी किसी ना किसी तरह समय की कसौटी पर कसे जाते हैं और यह सही भी है क्योंकि इसी कारण इंसान की कर्मठता की पहचान होती है।
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                       सुनीता रानी राठौर 
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Tuesday, 25 August 2020

क्या शराब आवश्यक वस्तुओं में शामिल होनी चाहिए।

आवश्यक वस्तु अधिनियम के अनुसार आवश्यक वस्तुओं में शामिल होने पर विक्रेता अपनी मर्जी के अनुसार दाम नहीं बढ़ा सकता। मनमर्जी दाम बढ़ाने पर सजा का भी प्रावधान है। उस वस्तु के दाम पर सरकार का नियंत्रण होता है। 
   मेरे विचार से शराब कोई ऐसी अनिवार्य वस्तु नहीं है जिसे आवश्यक वस्तुओं में शामिल किया जाए। शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसका दुष्प्रभाव व्यक्ति के मन मस्तिष्क और हमारे समाज पर पड़ता है। अगर इसका दाम बढ़ भी रहा हो तो अच्छी बात है लोग कम इस्तेमाल करेंगे। 
   केंद्र सरकार को बिहार और गुजरात राज्य की तरह शराब का पूर्ण निषेध कर देना चाहिए ताकि लोग इसका इस्तेमाल ही न करें। शराब के कारण ही गृह कलह होते हैं। घरेलू हिंसा बढ़ने का मुख्य कारण शराब है। गरीब व्यक्ति शराब का आदी होकर अपने मेहनत का पैसा पानी की तरह बहा देता है। उसका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। शराब पीने के बाद व्यक्ति अपने विवेक बुद्धि से कोई काम नहीं कर पाता। न हीं वह अपने परिवार के हित का ध्यान रखता है न ही अपने समाज का।
   इस कारण सरकार अगर शराब को पूर्ण निषेध कर दे तो ज्यादा ही उत्तम होगा।
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                 सुनीता रानी राठौर
               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या सकारात्मक सोच ही सुख का रहस्य है?

सकारात्मक सोच से मन को शांति और सुकून मिलता है। शांति और सुकून ही जीवन का वास्तविक सुख है।
 हमारे जीवन में विचारों का महत्वपूर्ण स्थान है।
 सकारात्मक विचार दूसरों के प्रति प्रेम और सद्भावना को जन्म देती है जबकि नकारात्मक विचार ईर्ष्या और द्वेष। सकारात्मक विचार नकारात्मक की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली होते हैं।
विचार भी संक्रामक होते हैं। सकारात्मक और आशावादी सोच वाले की संगत में हमारे विचार भी सकारात्मक बनते हैं और हमारे विचार आत्मविश्वास से परिपूर्ण होते हैं। इसके विपरीत नकारात्मक सोच वाले के संगत में रहकर हम हमेशा उदास और जीवन से निराश खुद को महसूस करते हैं।
इसलिए कहा गया है कि सकारात्मक सोचें, उसी तरह की रचनाएं पढ़ें, वैसे लोगों की संगत में रहें तब हमारे अंदर serotonin, Endorphins,Dapamine आदि हार्मोन का स्राव होता है जो हमें तनाव से मुक्ति दिलाता है और मन प्रसन्न चित्त रहता है।
  धन दौलत का सुख क्षणिक सुख होता है क्योंकि उसे खोने के डर से मन हमेशा सशंकित रहता है पर मन का सुख चिरस्थाई है जो सकारात्मक सोच से मिलता है। मन हमेशा प्रसन्नचित और आनंदित रहे इससे बड़ा कोई सुख नहीं। वास्तव में सकारात्मक सोच ही सुख का रहस्य है।
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                    सुनीता रानी राठौर 
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

पेड़ -पौधे

Sunday, 23 August 2020

क्या खामोशियां वास्तव में खामोश होती है?


 खामोशियां वास्तव में खामोश नहीं बल्कि अंदरूनी तूफान लिए होती हैं। अंतर्मन में द्वंद होने के कारण खामोशी का आवरण ओढ़ना पड़ता है। कभी कभी कहीं मजबूरन अभियुक्त को डरा धमका कर खामोश कर दिया जाता है पर वह भी मौका मिलते हीं सच्चाई उगल देता है।
  पारिवारिक स्तर पर सामंजस्य बनाने हेतु खामोशी अख्तियार करनी पड़ती है। सामाजिक स्तर पर खामोशियों के विभिन्न पहलू होते हैं।
   कभी-कभी दबे-कुचले हुए लोगों की आवाजें नहीं सुनी जाती इसलिए वे कुंठित भाव से खामोश हो जाते हैं पर उनके हृदय में विद्रोह की ज्वाला धधकती रहती है। ऊपर से खामोश दिखते हैंपर     अंदर से खामोश नहीं रहते।
    सरकारी स्तर पर उच्च पद पर बैठे अधिकारी या उच्च पद पर बैठे मंत्री गण जब ज्वलंत मुद्दों पर सही जवाब नहीं दे पाते तब खामोशी धारण कर लेते हैं। बिल्कुल चुप्पी साध लेना शंका उत्पन्न कर देता है कि दाल में काला है। खामोश हैं पर अंदरूनी माथापच्ची चल रही है। 
    इसी तरह जनता की भी जब सरकार नहीं सुनती। उनके समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता तब जनता भी आवाज उठाते उठाते धीरे-धीरे खामोशी अख्तियार करने लगती है पर वह अंदर ही अंदर सरकार के खिलाफ होते चली जाती है और वो खामोशी धीरे-धीरे आंधी का रूप ले लेती है और विद्रोह के स्वर में तख्तापलट हो जाता है।
    इस तरह विभिन्न बिंदुओं पर गौर करें तो आप देखेंगे कि साधारण रूप से खामोशी कोई मायने नहीं रखती पर कभी ज्यादा बोलने वाला व्यक्ति बिल्कुल खामोश हो जाए या उच्च पदस्थ अधिकारी ज्वलंत मुद्दों पर ज्यादा देर तक खामोशी धारण कर लें तो समझ जाना चाहिए कि सब कुछ ठीक नहीं है, कोई बड़ा तूफान आने वाला है। खामोशियां वास्तव में खामोश नहीं होती।
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                               सुनीता रानी राठौर
                            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या संकल्प से बड़ी कोई शक्ति होती है?

संकल्प से बड़ी शक्ति ईश्वरीय शक्ति है पर मनुष्य के पास सबसे बड़ी शक्ति है तो वह है संकल्प शक्ति।
 जब हम मन में दृढ़ संकल्प होकर किसी कार्य को करने के लिए आगे बढ़ते हैं तभी उस कार्य को पूर्ण कर पाते हैं। ईश्वर भी हमारी तभी मदद करते हैं जब हम खुद संकल्पबद्ध हो कर आगे बढ़ते हैं।
  काम पूर्ण होना ना होना वह अपने हाथ में नहीं है पर मन में दृढ़ शक्ति का होना जरूरी है। 
     कभी-कभी ईश्वरीय प्रकोप के आगे इंसान हार जाता है पर पुनः आत्मशक्ति के साथ वह जीवन पथ पर आगे बढ़ता है क्योंकि उसके हृदय में संकल्प शक्ति होती है। बाढ़ का प्रकोप हो या भूकंप की तबाही सब कुछ नष्ट होने पर भी इंसान में जीने की जिजीविषा रहती है और वह खुद के मनोबल को ऊंचा उठा आगे बढ़ता है क्योंकि उसके हृदय में संकल्प शक्ति होती है। ईश्वर ने हमें हाथ- पैर और बुद्धि बल से नवाजा है। विवेकशील प्राणी होने के नाते हीं वह संकल्प शक्ति द्वारा उठ खड़ा होता है।
     इस तरह कह सकते हैं कि मनुष्य के पास सबसे बड़ी शक्ति संकल्प शक्ति है।
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                                    सुनीता रानी राठौर
                                ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 20 August 2020

क्या हमेशा समय के साथ चलने वाले तरक्की करते हैं?

सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज में होने वाले उतार-चढ़ाव को नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं होता। समय के साथ जो बदलाव हो रहा है उसके अनुसार सामंजस्य स्थापित करते आगे बढ़ते रहना ही बुद्धिमानी का परिचायक है। आज का युग डिजिटल युग है। प्राचीन काल से हम तुलना करते हुए अपने रहन-सहन, खान-पान, शिक्षा और अन्य कार्यों या विचारों में अगर परिवर्तन नहीं किये तो हम कुपमंडूक की भांति हीं जीवन जीते रह जाएंगे।
   अपने व्यक्तित्व को निखारने की खातिर भारतीय संस्कृति के समावेश के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करना हितकर है। महात्मा गांधी ने भी कहा था-- खिड़की सदा खुली रखें। शुद्ध हवा आने दें। प्रदूषित हवा आए तब बंद कर दें। 
   यानी सदा अच्छे विचारों का अनुकरण करें। अंधानुकरण न करें। सद्गुणों से व्यक्तित्व को पूर्ण कर समय के साथ कदम ताल मिलाते हुए आगे बढ़ते रहें तभी मंजिल पाना संभव है। हमेशा समय के साथ चलने वाले ही तरक्की करते हैं। अगर दकियानूसी विचारों से जकड़े रहे तो व्यक्तित्व का विकास पूर्णत: संभव नहीं होगा।
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                              सुनीता रानी राठौर
                           ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या चिंता का इलाज सिर्फ प्रार्थना है?

चिंता कोई रोग या बीमारी नहीं है। यह एक शारीरिक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक स्थिति है जिसके परिणाम स्वरूप हम शंकित व्यवहार करते हैं। चिंता विकार के माध्यम से अधिकांश लोग अवसाद में चले जाते हैं। इसके वजह से बेचैनी, नींद में परेशानी, वजन में बढ़ोतरी, भूख में गड़बड़ी आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं। 
चिता तो मुर्दे को जलाती है पर चिंता तो जीवित को ही मार देती है।
चिंता का इलाज प्रार्थना के साथ-साथ उसके निदान का प्रयास करना भी है। बिना प्रयास के किसी समस्या का समाधान संभव नहीं‌। चिंता विकार का इलाज मनोचिकित्सा या संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (Cognitive behavioral therapy) के साथ किया जा सकता है। चिंता मुक्त होने का  सबसे सरल और सही तरीका योग साधना है।
इसके साथ हीं सकारात्मक सोच बनाएं। नकारात्मक सोच से दूर रहें। अकेले में न बैठें, किसी न किसी काम में व्यस्त रहें। धार्मिक और संदेशप्रद पुस्तकें पढ़ें। आत्मविश्वास को बनाए रखें।
 इन विधियों को अपनाकर हम चिंता से मुक्त होने में सक्षम हो सकते हैं।
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                            सुनीता रानी राठौर 
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Tuesday, 18 August 2020

इम्यूनिटी के मजबूत पोषक तत्व कौन कौन से हैं?

 इम्यूनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता।हमारा शरीर  रोग से लड़ने में कितना सक्षम है यह हमारे इम्यूनिटी पर निर्भर करता है।
    इम्यूनिटी के मजबूत पोषक तत्व विटामिन डी और सी को खास माना गया है। संतरा, नींबू में विटामिन सी पोषक तत्व होता है जो आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है इसमें भरपूर विटामिन सी पाया जाते हैं। 
इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए आम, अमरूद, पपीता भी फायदेमंद है। एक अमरूद में 200 ग्राम पोषक तत्व होते हैं। एक कप पपीते में 88 मिलीग्राम पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसी तरह स्ट्रॉबेरी में काफी मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। अनानास इम्युनिटी बढ़ाने के साथ हड्डी को भी मजबूत बनाता है।
     स्ट्रौंग इम्यूनिटी के लिए आवश्यक है दूध में हल्दी और जायफल मिलाकर पीना।
   सब्जियों में लाल शिमला मिर्च, ब्रोकली, हरी पत्तेदार सब्जियां और टमाटर विटामिन सी के अच्छे स्रोत हैं।
     सूर्य से प्राप्त होने वाले विटामिन डी इम्यूनिटी सिस्टम के सबसे जरूरी तत्वों में से है। इसके साथ ही विटामिन डी के लिए दूध, डेयरी प्रोडक्ट, फैटी फिश और हेल्थी डाइट, अंडे जैसे चीजों का सेवन करें। प्रोटीन से भरपूर डाइट खाने से भी आपके प्रतिरोधक क्षमता शक्ति बढ़ेगे। 
      'विटामिन डी' और 'विटामिन सी' से भरपूर अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व युक्त सप्लीमेंट्स आपके प्रतिरक्षा प्रणाली को कोविड-19 और अन्य श्वसन संबंधी रोगों से लड़ने में मददगार साबित हो सकते हैं।
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                   सुनीता रानी राठौर 
                   नोएडा-ग्रेटर (उत्तर प्रदेश)

Monday, 17 August 2020

क्या बिना मतलब का झूठ याद रहते हैैं?

    हां,जब कोई बिना मतलब, बेवजह हम पर झूठा आरोप लगा दे तब वह आरोप मन को भेद देता है और हम उस झूठ को जीवनपर्यंत भूल नहीं पाते। 
     दूसरा, अगर हम कभी हंसी मजाक कोई झूठ बोल दें और उस झूठ का परिणाम सामने वाले व्यक्ति पर बुरा पड़ता है। कुछ गंभीर नुकसान के रूप में झेलना पड़ता है तब वह झूठ हमारी आत्मा पर बोझ बन जाता है और हम उसे कभी नहीं भूल पाते।
     बिना मतलब का झूठ बोलकर अगर कोई किसी व्यक्ति का सामाजिक क्षति पहुंचाता है मानसिक चोट पहुंचाता है तो वह व्यक्ति को आघात तो पहुंचाता ही है पर जो झूठ बोला उसकी भी कभी ना कभी आत्मा धिक्कारती है। वह चाह कर भी भूल नहीं पाता भले ही वह ऊपर से भूलने का दिखावा करता हो ।
     अतः परिस्थितिश कभी झूठ बोलना भी पड़े तो उतना ही बोले जिससे किसी व्यक्ति को मानसिक और सामाजिक आघात न पहुंचे। बिना मतलब का झूठ ज्यादा खतरनाक होता है।
---------*-------------सुनीता रानी राठौर
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

🔥*चांदनी रात*🔥आशाओं से परिपूर्ण आह्लादित 🔥 जीवन का प्रतीक 🔥

Sunday, 16 August 2020

लघु कथा------*आजादी*

क्या देश के ईमानदार कर दाताओं को राहत मिलेगी?

13 अगस्त को प्रधानमंत्री जी द्वारा दिए गए भाषण से ऐसा महसूस हुआ कि टैक्स के मामले में पारदर्शिता बढ़ेगी और ईमानदार करदाताओं को प्रोत्साहित किया जाएगा। वह एक प्लेटफार्म की शुरुआत कर रहे हैं जिसका नाम दिया गया है- 'ट्रांसपेरेंट टैक्सेशन; ऑनरिंग द ऑनेस्ट' यानी 'पारदर्शी कराधान- ईमानदार का सम्मान'। 
    यह मंच हमारी कर प्रणाली में सुधार और उसे सरल बनाने के प्रयासों को मजबूती देगा। कई ईमानदार करदाताओं के लिए फायदेमंद होगा जिनकी कड़ी मेहनत देश को आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती है। 
   सुधार करते हुए कंपनी कर की दर को 30% से घटाकर 22% करना एवं विनिमय इकाइयों के लिए 15% करने का विचार है ऐसे ही अन्य जगहों पर भी बदलाव कर रियायत देने का प्रयास है।
     ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका जैसे विकसित देशों में करदाताओं को कुछ खास रियायत मिलती हैं साथ ही सामाजिक सुरक्षा भी। लेकिन भारत में तो करदाता को ही सामाजिक सुरक्षा से वंचित कर दिया जाता है। इसका उदाहरण आयुष्मान भारत योजना है। कितनी विडंबना है कि करदाताओं के पैसे से ही योजनाएं चलाई जाती है लेकिन करदाता को इसका लाभ नहीं मिलता। जैसे--रेलवे के एसी क्लास के रिजर्वेशन में यदि टैक्स पेयर्स को थोड़ी राहत मिले या इसी तरह की कुछ अन्य रियायतें दी जाए तो टैक्स देने वाले लोग प्रोत्साहित होंगे।
   हमारे देश में घोषणाएं तो बहुत होती हैं पर उसे पूर्णता प्रदान नहीं की जाती। इस नई घोषणा का भी जमीनी स्तर पर कितना अमल हो पाएगा यह तो आगे समय ही बताएगा। अगर करदाताओं को रियायत मिलती है तो बहुत हीं खुशी की बात होगी।
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                     सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Saturday, 15 August 2020

झुके हैं शीश शहादत में

मेरी ये 🔥देशभक्ति कविता 🔥🔥उन स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित है🔥 जो अपने देश की स्वतंत्रता के खातिर🔥 🔥देश की बलिवेदी पर प्राण न्योछावर🔥 कर गए पर 🔥इतिहास के पन्नों में उनका नाम अंकित नहीं हुआ🔥
💐🙏शत शत नमन 🙏💐

Friday, 14 August 2020

क्या कोरोना के चलते बंद पड़े स्कूलों को एक सितंबर से खोल देना चाहिए?

जितने तीव्र गति से कोरोना संक्रमण हमारे देश में फैल रहा है उसको देखते हुए बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करना उचित नहीं लगता। अभी कुछ दिन हमें और सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। जान है तो जहान है। एक -दो महीना और इसी तरह बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर सकते हैं पर अगर दूसरे नजर से देखें तो जब मंदिर मस्जिद और अन्य चीजों को जब जनता के लिए खोल दिया गया तब विद्यालय क्यों नहीं खुलना चाहिए? क्योंकि उचित शिक्षा का पूर्ण प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। 
   आज दूरदराज गांव के गरीब बच्चे ऑनलाइन शिक्षा का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं। दूरदराज गांव में इंटरनेट की सुविधा अभी भी नहीं है अगर है भी तो नेटवर्क उपलब्ध नहीं रहता । दूसरी बात गरीब मां बाप अपने बच्चों को स्मार्ट फोन भी नहीं खरीद कर दे सकते। उन बच्चों की पढ़ाई बिल्कुल ठप हो चुकी है। उन बच्चों के भविष्य के बारे में अगर हम ध्यान से सोचे ,उनकी परेशानियों को समझें तब एहतियात बरतते हुए विद्यालय संस्थापकों को विद्यालय 1 सितंबर से खोलने पर विचार करना चाहिए ताकि बच्चे आकर शिक्षा ग्रहण कर सकें। हां, बहुत ही सावधानियां बरतने की भी जरूरत महसूस होगी क्योंकि ज्यादातर  छोटे बच्चे नासमझ होते हैैं। प्राइमरी क्लास के बच्चों के लिए ज्यादा रिस्क होगा। पर अब मजबूरी है कि हमें सावधानियां बरतते हुए अपने कार्य को सुचारू करना है।
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सुनीता रानी राठौर
 ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 13 August 2020

अपराध को बढ़ावा देने में किन-किन की भूमिका होती है?

अपराध को बढ़ावा देने में पुलिस, प्रशासन, राजनेता,वकील और थोड़ी बहुत भूमिका आम जनता और समाज की भी होती है।
 अपराध भी कई किस्म के होते हैं-- व्यक्तिगत और संगठित। व्यक्तिगत अपराध बदले की भावना, कुंठाग्रस्त स्थिति या पथभ्रष्ट होने के कारण अकेला व्यक्ति करता है। इस पर पुलिस चाहे तो तुरंत नियंत्रण कर सकती है जबकि संगठित अपराध बहुत ही भयावह और सामाजिक क्षति पहुंचाने वाला होता है। इसमें जो गिरोह बनता है उसमें पुलिस और नेताओं की सहभागिता होती है। प्रशासन की तरफ से भी शह मिला होता है।
 वर्तमान में सबसे ज्यादा अपराध शिक्षित वर्ग के  उच्च पद पर बैठे नामचीन लोग करोड़ों का घोटाला   कर के कर रहे हैं। बिना मिलीभगत के इतना बड़ा घोटाला संभव नहीं हो सकता। ये सफेदपोश अपराधी सबसे ज्यादा खतरनाक है जो हमारे समाज और देश को खोखला कर रहे हैं।
   आम जनता की गलती यह रहती है कि वे अपने व्यक्तिगत नुकसान के डर से उसके खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते क्योंकि इन अपराधियों की पहुंच ऊपर तक होती है। इस कारण दिनदहाड़े गुंडागर्दी, कोई भी अपराध या गोरखधंधा करने से ये नहीं हिचकते। 
  जनता डर से आंख मूंदे रहती है। पुलिस रिश्वत लेकर चुप हो जाती है। राजनेता अपने स्वार्थ हेतु अपराधियों को शरण देते हैं। प्रशासन खुद को अच्छा साबित करने के चक्कर में अपराधों पर पर्दा डालते रहती है। इन सभी वजह से अपराध जगत फलता-फूलता रहता है। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से अपराध को बढ़ावा देने में किसी का कम तो किसी का ज्यादा भूमिका होती ही होती है।
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                   सुनीता रानी राठौर
               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)