Wednesday, 7 October 2020

क्या बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा सिर्फ मातृभाषा में देनी चाहिए?

क्या बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा सिर्फ मातृभाषा में देनी चाहिए?
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बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा सिर्फ मातृभाषा में देनी चाहिए यह परिस्थिति और उनके मानसिक अवस्था पर भी निर्भर करता है। मात्रृभाषा का ज्ञान बच्चों को अवश्य होनी चाहिए पर अगर इसके साथ-साथ दूसरे भाषाओं का भी ज्ञान हो तो आगे चलकर उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई नहीं होगी। 
यह सिद्ध हो चुका है कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के उन्मुक्त विकास में ज्यादा कारगर होती है। अलग-अलग आर्थिक परिवेश के बालक को विषय  को ग्रहण करने की क्षमता सामान नहीं होती।
  मात्रृभाषा के माध्यम से जब पढ़ाया जाता है तो बालक के चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती है। दूसरी भाषा सीखना भी अच्छी बात है, लेकिन मात्रृभाषा की उपेक्षा करना ठीक नहीं। 
केंद्र सरकार कार्यालय में हिंदी कामकाज को बढ़ावा देने की बात कहती है पर व्यावहारिक रूप से अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है।
 हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है लेकिन कार्यालयों में हिंदी में कामकाज के लिए कोई जगह नहीं है। 
 ईमेल, इंटरनेट, कंप्यूटर, लैपटॉप फेसबुक आदि सब हिन्दी में भी अब प्रयोग होने लगे हैं फिर भी अभिभावक हिंदी की जगह अंग्रेजी में बच्चों को पढ़ाना ज्यादा अच्छा मान रहे हैं।
अच्छी नौकरी पाने के लिए, ज्ञान अर्जित करने के लिए अंग्रेजी सीखना बहुत अच्छी बात है पर  अंधानुकरण में आज अंग्रेजी को ही सभी महत्व दे रहे हैं और सभी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं ताकि वह आगे अपनी पढ़ाई उचित ढंग से कर सके।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि मात्रृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य रूप से मिलनी चाहिए इसके अलावा दूसरे भाषाओं का ज्ञान हो तो अति उत्तम है।
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               सुनीता रानी राठौर
                ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

हाथरस के डीएम की कार्यप्रणाली पर सवाल कर्मों उठ रहे हैं?

हाथरस के डीएम की कार्यप्रणाली पर सवाल कर्मों उठ रहे हैं?
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हाथरस के डीएम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजमी है। डीएम जिले का सर्वेसर्वा होता है, उनके देखरेख में ही पूरे जिले का प्रशासनिक कार्य होता है। डीएम को चाहिए था कि पीड़िता और पीड़ित परिवार की उचित सुरक्षा प्रदान करते हुए मदद पहुंचाने की कोशिश करना। परन्तु वह पीड़ित परिवार को धमकाने के अंदाज में सुनाता रहा--मैं यहां पर तुम्हारे साथ रहूंगा। मीडिया 2 दिन के लिए हैं। उनकी बात पर मत जाओ --इस तरह का बात व्यवहार उनके पद के अनुकूल नहीं है।
    एक तो किसी की बेटी के साथ इतना दर्दनाक वाकया --उसके बाद उसका अंतिम संस्कार भी जबरदस्ती तानाशाही रूप में करना और उसके बाद परिवार को धमकी देना कि मीडिया से अपने मन की बात, अपनी परेशानी तुम बयां नहीं करोगे-- डीएम का इस तरह का व्यवहार प्रजातंत्र शासन के अनुकूल नहीं है।
    इंसानियत को शर्मसार करने वाले वाक्य जो उन्होंने कहा कि तुम्हारी बेटी कोरोना से मर गई होती तो क्या इतना मुआवजा मिला होता।
    इतनी घटिया दर्जे की सोच -- एक डीएम के द्वारा कही जाने वाली बात कितनी हास्यास्पद है। अगर उनकी बेटी के साथ यह हादसा होता और इस तरह का व्यवहार होता, मुआवजे का ऐलान होता-- तो क्या उनकी आत्मा को तसल्ली मिल जाती।
    इन्हीं अभद्र और निम्न स्तर के आचरण  के कारण उनके कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगा।
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                         सुनीता रानी राठौर 
                         ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या जाति व धर्म के बिना राजनीति संभव नहीं है?

क्या जाति व धर्म के बिना राजनीति संभव नहीं है?
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   जाति और धर्म को राजनेता हथियार के रूप में राजनीति में इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका उद्देश्य मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाना ताकि मुख्य मुद्दों पर काम न करना पड़े इसलिए जाति धर्म के नाम पर बवाल खड़ा करते हैं। इंसान को जाति में बांटकर वोट मांगते हैं।
भारत में यह कह देना कि जातीय भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है --यह राजनीति का एक आकर्षक नारा भी हो सकता है लेकिन ऐसा वास्तव में संभव हो पाएगा यह कठिन सवाल बना हुआ है।
   एक हिंसक दबंगता में या फिर अपमानजनक हालत में घिरे रखने की साजिश के रूप में मंदिरों में प्रवेश से लेकर सार्वजनिक समारोह में भागीदारी कर लेने भर से दलितों की जिंदगी पर कहीं-कहीं बन आती है‌। यह सब क्यों होता है? क्योंकि हमारा कानून कमजोर है और कानून में उच्च पदों पर बैठे हुए उनकी जाति के लोग और राजनेता नहीं चाहते कि उन्हें कड़ी सजा मिले।
    इसलिए अभी भी कुछ जगहों पर यह भेदभाव देखने को मिल रहा है क्योंकि उन्हें कानून का डर नहीं है उनकी पहुंच ऊपर तक है। 
    सामाजिक बुराइयां सदियों से और पीढ़ियों से चली आ रही है। एक अदृश्य स्वर्णवादी नियंत्रण समाज में स्थापित है जो ऊंची जातियों के दबंगों को प्रश्रय देता है और यह सब राजनीतिज्ञों के मिलीभगत के कारण होता है क्योंकि उन्हें अपनी स्वार्थ की रोटी सेकनी है।
    अपनी स्वार्थ की पूर्ति हेतु वे धर्म और जाति में बरगला कर लोगों को बांट कर अपना राजनीतिक फायदा उठाते हैं और जनता बेवकूफ बन कर आपस में लड़ती है।
जनता में कमियां है कि वह जातिवाद के आधार पर नेता को चुनती है और जिसकी सजा उसे भुगतनी भी पड़ती है। नफरत और विद्वेष का जहर घोलकर वह लोगों को एकजुट नहीं होने देना चाहते।
कितनी बड़ी विडंबना और अपमान है कि उच्च पद पर बैठे राष्ट्रपति का भी बार-बार जातिय पहचान बताई जाती है। जब नेता किसी को सवर्ण और किसी को शुद्र कहता है तभी उसके विचारों की मानसिक संकीर्णता झलक जाती है। ऐसा नेता निष्पक्ष भाव से जनता की सेवा कर ही नहीं सकता।
जाति धर्म के बिना भी राजनीति संभव है पर उसके लिए जनता को जागरूकता दिखानी पड़ेगी जो नेता जाति धर्म का नाम ले उसे बहिष्कृत करें।
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                       सुनीता रानी राठौर 
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

सामूहिक दुष्कर्मियों को तुरंत सजा देने के लिए क्या-क्या कानून में संशोधन होना चाहिए?

सामूहिक दुष्कर्मियों को तुरंत सजा देने के लिए क्या-क्या कानून में संशोधन होना चाहिए?
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कानून में संशोधन करवा पाना तो बहुत दूर की बात है पर कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करवाना इतना मुश्किल नहीं है। इसके लिए नेताओं और पुलिस महकमे को अपने आचार-व्यवहार में परिवर्तन लाने की जरूरत है ताकि आम इंसान को भी न्याय और सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार मिल सके।
सामूहिक दुष्कर्मियों को तुरंत सजा देने के लिए सर्वप्रथम पुलिस को नैतिकता और ईमानदारी के साथ काम करने की जरूरत है।
नेताओं के दबाव से मुक्त होकर पुलिस निष्पक्ष भाव से काम करे। अनैतिक रूप से गलत को सही और सही को गलत ना साबित करें।
 जब पुलिस साथ देगी तभी कोर्ट का दरवाजा पीड़ित न्याय की खातिर खटखटा पाएगी।
  नि:संदेह हमारे कानून में बहुत खामियां हैं तभी तो पहुंच वाले लोगों का गुनाह साबित नहीं होता, तारीख पर तारीख देते हुए अंत में उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया जाता है जबकि गरीबों को या तो तुरंत किसी तरह एनकाउंटर में मार दिया जाता है या फांसी की सजा हो जाती है।
  संविधान के अनुच्छेद 21 की आड़ में दोषी न्याय प्रक्रिया से खेलते हैं। उसे सख्त बनाने की जरूरत है। कोर्ट हर नागरिक के मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में पीड़ित और उनके परिजनों की शिकायतों का निवारण करें। 
  दुष्कर्म सिर्फ एक व्यक्ति और समाज के नहीं बल्कि पूरी मानवता के खिलाफ अपराध है।अदालत अपने कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखें। ताकि इस व्यवस्था से लोगों का भरोसा न उठे। पीड़ित परिवार की मनोस्थिति को समझते हुए व्यवस्था में परिवर्तन लाने की अति आवश्यकता है।
  क्या किसी नेता की बेटी के साथ दुष्कर्म हो और उसे 25लाख का मुआवजा और एक सदस्य को नौकरी दे दिया जाए तो क्या उन्हें शांति मिल जाएगी-- विचारणीय प्रश्न है?
  न्याय प्रक्रिया सभी के लिए एक समान हो, दबाव में पुलिस काम न करें। आम जनता बस सरकार से यही उम्मीद रखती है।
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                      सुनीता रानी राठौर
                 ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या स्वास्थ्य से बड़ा कोई सुख जीवन में होता है?

क्या स्वास्थ्य से बड़ा कोई सुख जीवन में होता है?
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स्वास्थ्य से बड़ा कोई सुख जीवन में नहीं होता। कहावत भी है-- 'स्वास्थ्य ही धन है'। हमारा स्वास्थ्य अगर ठीक है तो हम अपने जीवन में किसी भी बुरी परिस्थिति का सामना कर सकते हैं और जीवन का भरपूर आनंद उठा सकते हैं।
 अच्छा स्वास्थ्य वास्तविक धन-दौलत है जो हमें सुखी जीवन प्रदान करता है। हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने हेतु सक्षम बनाता है।
  अच्छा स्वास्थ्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से सक्षम बनाता है। 
  वर्तमान समय में व्यस्त जीवन और प्रदूषित वातावरण में सभी के लिए अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखना बहुत ही कठिन है। आजकल अच्छा स्वास्थ्य भगवान के दिए एक वरदान की तरह है। 
   अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए नियमित शारीरिक व्यायाम, योग,संतुलित भोजन, स्वच्छ वातावरण की जरूरत है। अच्छा स्वास्थ्य हमें बीमारियों और रोगों से मुक्ति प्रदान करता है।
    यह जीवन का अमूल्य तोहफा है और उद्देश्य पूर्ण जीवन के लिए आवश्यक है। अगर स्वास्थ्य सही नहीं है तो आप के खान-पान पर प्रतिबंध लग जाता है। आप धन रहते हुए भी उसका सदुपयोग जीवन काल में नहीं कर सकते। 
        इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए निःसंदेह कहा जा सकता है कि स्वास्थ्य से बड़ा कोई सुख जीवन में नहीं होता। जीवन का भरपूर आनंद उठाना है तो स्वस्थ और तंदुरुस्त रहें।
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                    सुनीता रानी राठौर
                  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या आप सिर्फ जानकारी को शिक्षा समझते हैं?

क्या आप सिर्फ जानकारी को शिक्षा समझते हैं?
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 शिक्षा का हमारे जीवन वही महत्व है जो मछली के लिए पानी का, मोती के लिए सीप का। शिक्षा के बिना हर व्यक्ति अधूरा है।
 शिक्षा का अर्थ होता है-- सीखना और सिखाना। पर सिर्फ जानकारी को शिक्षा कहना बिल्कुल उचित नहीं है। सच्ची शिक्षा किसी डिग्री से परे होती है या कहें किताबी ज्ञान से भी अधिक होती है।
    सकारात्मक सोंच, मदद करने का दृष्टिकोण , समाज के प्रति अच्छा विचार और नैतिक मूल्यों का ज्ञान यही सच्ची शिक्षा है। 
   शिक्षा का मतलब होता है- खुद को दो कदम आगे ले जाना। शिक्षा जो हमें सही निर्णय लेने की सीख देती है। शिक्षा का मतलब अपने ज्ञान को बढ़ाना और उसे व्यवस्थित रखना।
      शिक्षा हमें जीवन जीने का सलीका सिखाती है और कामयाबी भी देती है और साथ ही शिक्षा हमें परिपक्व भी बनाती है।
       इसलिए जन-जन को शिक्षित होना जरूरी है।महात्मा गांधी जी के अनुसार भी सच्ची शिक्षा वह है जो बच्चों के आध्यात्मिक, बौद्धिक और शारीरिक पहलुओं को उभारती है। उनके मुताबिक शिक्षा का अर्थ सर्वांगीण विकास होता है।
     वर्तमान में हमारे देश की शिक्षा प्रणाली किताबी शिक्षा पर जोर दे रही है जो सही नहीं है। विद्यार्थियों को व्यवहारिक शिक्षा भी उपलब्ध करानी चाहिए। विद्यार्थी तभी कुशल बनेगा जब हर चीज को व्यावहारिक रूप से सीखेगा।
       आधुनिक शिक्षा प्रणाली में मानवीय मूल्यों के बजाय सिर्फ ज्यादा मार्क्स लाने पर जोर दिया जा रहा है। हमें चाहिए कि घर में भी अच्छे संस्कार और समाजिकता का गुण बच्चों को सिखाएं ताकि समाज के व्यवस्थाओं, नियमों, प्रतिमान और मूल्यों को सीखते हुए एक आदर्श नागरिक बन सके।
       जानकारी कैसी है-- उसकी परख की क्षमता, नैतिक -अनैतिक की पहचान और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता ही सच्ची शिक्षा कहलाती है।
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             सुनीता रानी राठौर 
             ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

आज के समय में कोई सच्चाई का साथ देता है?

आज के समय में कोई सच्चाई का साथ देता है?
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आज का प्रश्न विचारणीय प्रश्न है और वर्तमान का ज्वलंत प्रश्न। यह कड़वी सच्चाई है कि लोग सच्चाई का साथ देने में कतराने लगे हैं। सच्चाई का साथ देने वाले को बहुत ही जोखिम उठानी पड़ती है। खुद भी और अपने परिवार को भी जोखिम में डालना पड़ता है। 
 यहां तक कि कभी-कभी उच्च पद पर बैठे हुए न्यायाधीश भी डांवाडोल हो जाते हैं। विवशतावश सच्चाई का साथ नहीं दे पाते। 
    पर ऐसा नहीं कह सकते कि सच्चाई का साथ कोई नहीं देता। अवश्य देते हैं-- सच्चाई का साथ देने की वजह से ही आज दुनिया चल रही है नहीं तो सारे झूठे- मक्कारों का राज हो जाये।
उच्च पद पर बैठे आसीन लोगों को गलतफहमी हो जाती है कि पैसे, धन-दौलत के बदौलत हम लोगों को खरीद कर या दबाव बनाकर अपनी मनमानी करवा सकते हैं। किसी को भी डरा धमका सकते हैं। पर यह गलतफहमी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाती। कहावत भी है झूठ के पैर नहीं होते। सच्चाई की जीत होती है।
  कानून कमजोर होने की वजह से भी लोग सच्चाई का साथ देने में कतराने लगे हैं क्योंकि जो आगे आता है उसे कानून का भी साथ नहीं मिल पाता।उसका जीवन संघर्षमय हो जाता है, अस्त-व्यस्त हो जाता है। फिर भी बहुत से उदाहरण ऐसे हैं जहां सच्चाई का साथ देते हुए लोग अपराधियों, गुनाहगारो को सजा दिलवाने का प्रयास किए हैं और कर रहे हैं। इसलिए ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि आज लोग सच्चाई का साथ नहीं देते ।
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                   सुनीता रानी राठौर
                    ग्रेटर नोएडा( उत्तर प्रदेश)

क्या वक्त अपना है तो सब कुछ अपना है?

क्या वक्त अपना है तो सब कुछ अपना है?
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समय के साथ-साथ वक्त भी बदलता रहता है। अच्छा वक्त हमें कामयाबी और खुशियां प्रदान करता है। कामयाबी मिलते ही लोगों की नज़दीकियां महसूस होने लगती है और वक्त खराब होते हीं लोग किनारा करने लगते हैं।
  आम जीवन हो या सामाजिक जीवन हर जगह इन बातों को महसूस किया जा सकता है। आज आप गौर करें तो देखें कभी कांग्रेस पार्टी बुलंदियों पर थी तब सभी बड़े-बड़े नेता उस पार्टी के सदस्य बनना अपना अहो भाग्य मानते थे। आज सभी भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित होना चाह रहे हैं क्योंकि आज वह बुलंदियों पर है।
   वक्त वक्त की बात है जो ऊंचाइयों पर रहता है उससे सभी संपर्क रखना चाहते हैं। दलबदलूओं को देखकर इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है। जब आपसे उन्हें फायदे नजर आएंगे तब आप में उन्हें खुबियां ही खुबियां नजर आयेंगी अन्यथा खामियां दिखाई देने लगेंगीं। अपने फायदे की खातिर हर कदम पर दुनिया  सलाम करती है। नि:संदेह वक्त अपना है तो सब कुछ अपना है।
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                         सुनीता रानी राठौर
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या सफलता से ज्यादा विफलता सिखाती है?

क्या सफलता से ज्यादा विफलता सिखाती है?
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असफलता ही इंसान को सफलता का मार्ग दिखाती है। जीतने वाले कभी हार नहीं मानते और हार मानने वाले कभी जीत नहीं सकते। सभी के जीवन में एक ऐसा समय आता है जब सभी चीजें  हमारे विरोध में हो रही हो और हर तरफ से निराशा मिल रही हो।
 इतिहास के दर्ज घटनाओं में भी बड़े-बड़े महापुरुष या साइंटिस्ट शुरुआती दौर में असफल रहे पर अपने मेहनत, लगन और प्रयास के कारण सफलता हासिल की।
 एडिशन और आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक अगर अपनी असफलता और कमजोर दिमाग को मान कर बैठ जाते तो आज महान प्रतिभा और आविष्कारक में उनका नाम दर्ज नहीं होता।
     सफलता हमें कुछ बातें सिखाती हैं लेकिन विफलता एक पूर्ण टीचर की तरह हमें ढेरों सीख दे जाती है। विफलता को लेकर ज्यादा चिंतित होने के बजाय हम चिंतन करते हैं कि हमारी विफलता हमारे काम करने के तरीके उनके अभ्यास करने के तरीकों की विफलता है।
      जब हम अन्य रास्तों और संसाधनों के बारे में सोचते हैं और अमल करते हैं तब समाधान नजर आने लगता है। विफल होने पर उस काम को करने के नए तरीके आजमाते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं।
यह भी सच है कि सफलता हमें खुशी देती है और विफलता मायूसी और हताशा प्रदान करती है पर विफलता के बाद हम आगे की नई योजना तैयार करते हैं उसमें सफलता को लेकर हमारी सोच, नजरिए में पूर्ण रुप से बदलाव होता है और सफलता हेतु सुधार पर ध्यान गंभीरता से देते हैं। इस तरह कह सकते हैं कि वास्तव में सफलता से ज्यादा हमें विफलता सिखाती है।
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             सुनीता रानी राठौर
             ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)