Friday, 31 July 2020

क्या शिक्षा नीति बुनियादी समस्याओं को दूर करने में सक्षम है?

जिस कार्य को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी वह क्षेत्र शिक्षा का ही है। नई शिक्षा नीति में मात्रृभाषा को प्राथमिकता दी गई है यह सही दिशा में उठा एक बड़ा कदम है।
   नई शिक्षा नीति में बच्चों पर दबाव कम करने व उनके हुनर को देख उसे बढ़ाने का जो लक्ष्य रखा गया है वह बहुत लाभकारी सिद्ध होगा। मात्र डिग्री लेने से व्यक्ति कलर्क या सहायक तक ही सीमित रहता है लेकिन जब उसे मनचाही शिक्षा मिलती है तो उसके व्यक्तित्व का विकास पूर्णता के साथ होता है।
 नई शिक्षा नीति के अंतर्गत उच्च शिक्षा में मल्टीपल एंट्री एंड एक्जिट होगा यानी मान लें आप बीटेक में एडमिशन लिए, 2 सेमेस्टर बाद उस में रुचि खत्म हो गई पढ़ाई करने की, तब वो साल खराब नहीं होगा। एक साल के आधार पर सर्टिफिकेट मिलेगा और 2 साल पढ़ने पर डिप्लोमा कोर्स। पूरा पढ़ाई करने पर डिग्री मिलेगी। इस तरह की व्यवस्था होगी। कहीं नई जगह एडमिशन लेने के लिए रिकॉर्ड कंसीडर किया जाएगा। इसे सरकार की पॉलिसी में क्रेडिट ट्रांसफर कहा गया है। आपने कोर्स पूरा नहीं किया लेकिन जितना किया उसका क्रेडिट आपको मिल जाएगा। इससे उन सभी विद्यार्थियों को फायदा मिलेगा जो परिस्थितिवश बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं या उस विषय को न समझ पाने के कारण बीच में अपना सब्जेक्ट बदलना चाहते हैं।
   देश भर की हर यूनिवर्सिटी के लिए शिक्षा के मानक एक समान होंगे। इसी तरह से महत्वपूर्ण बिंदुओं पर तरह-तरह के जो बदलाव किए गए हैं वह अभी सही महसूस हो रहे हैं। 
   नई शिक्षा नीति बुनियादी समस्याओं को दूर कर  विद्यार्थी को दबाव मुक्त कर व्यक्तिगत विकास में सहायक बनने का प्रयास है। शिक्षा में लचीलापन और व्यावहारिकता होना छात्रों के लिए हितकर साबित होगा। पूर्ण विश्वास है कि नई शिक्षा नीति बुनियादी समस्याओं को दूर करने में सक्षम साबित होगी।
                     सुनीता रानी राठौर
            ‌   ग्रेटर नोएडा  (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 30 July 2020

चाटुकारिता

हैदराबाद से प्रकाशित दक्षिण समाचार पत्र-- प्रतिक्षा के अंतर्गत ता:-30-7-2020को हमारी कविता 💐"चाटुकारिता"💐 को प्रकाशित करने हेतु संपादक महोदय नीरज कुमार सिन्हा जी को 💐बहुत-बहुत धन्यवाद और हार्दिक आभार व्यक्त करती हूं।🙏🙏💐

चेहरे चेहरे किसके चेहरे

Tuesday, 28 July 2020

क्या रामलला जन्मभूमि के पूजन पर राजनीति होनी चाहिए?

      मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम हमारे आदर्श हैं। हमें उनके विचारों का अनुकरण कर अपने जीवन को सफल बनाना है। रामलला जन्मभूमि के पूजन पर राजनीति कतई नहीं होनी चाहिए। ये जन-जन की वर्षों की चाहत और तपस्या की पूर्णता का समय है। इस दिन को ऐतिहासिक बनाने के लिए जोर-शोर से तैयारियां चल रही है।
    मुख्य मुख्य वीआईपी लोग आमंत्रित किए गए हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी मुख्य अतिथि होंगे। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री जी का भी नाम है। वर्तमान में बिहार में कोरोना से जो विकट स्थिति पैदा हुई है और बाढ़ से कई जिलों में जो तबाही और त्राहि-त्राहि मची हुई है ---उस हालात का निरीक्षण करने, उससे निपटने के लिए उचित संसाधन का इंतजाम करने और लोगों को ढाढस बंधाने के लिए माननीय नीतीश कुमार जी जनता के बीच कहीं नहीं दिख रहे हैं-- ऐसे में क्या बिहार की जनता अयोध्या पहुंचने पर उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलेगी-- अवश्य बोलेगी क्योंकि शीर्षस्थ पद पर बैठे शासक से जनता को उम्मीद रहती है कि ज्वलंत मुद्दे विशेष कर जहां जान-माल की हानि हो रही हो उस पर तत्परता से कार्य करें। जनता को राहत भी पहुंचाएं। अगर आप उस पर ध्यान न दे कर सिर्फ आस्था की पूर्णता पर ध्यान देंगें तब जनता के साथ-साथ विपक्षी दल वाले भी उंगली उठाएंगे ये स्वाभाविक है पर इसे राजनीति का नाम देना उचित नहीं।
                       सुनीता रानी राठौर 
                    ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Monday, 27 July 2020

क्या रिश्तों में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होती है?

निःसंदेह रिश्तों में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होती है। विश्वास रुपी धागे में रिश्ते की सुंदर माला गुंथी  रहती है। विश्वास, प्रेम और स्नेह से रिश्तों को मजबूती मिलती है। निजी स्वार्थ रिश्तों के लिए अहितकर साबित होता है। इंसानियत और विश्वास के माध्यम से हम मित्रता या पारिवारिक रिश्तों को बनाए रखते हैं। इसके खातिर एक दूसरे के निजी जीवन और निजत्व का सम्मान करना जरुरी होता है। सीमा से ज्यादा एक्सपेक्टेशन खटास पैदा करता है।
 आज विश्वास के अभाव में रिश्तों की बलि चढ़ रही है। रिश्ते की मर्यादा का भी ध्यान रखें। रिश्तों का सुख और आनंद तभी है जब दोनों ही पक्ष अपनी निष्ठा और लगन से एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारियों को निभायें। 
   यह अटल सत्य है कि प्रेम और विश्वास रुपी पहिये पर रिश्ते सुचारू रूप से चलते हैं। रिश्ते को बिखरने से बचाना है तो विश्वास कायम रखें। कर्म क्षेत्र में रिश्तो की मर्यादा न टूटे, विश्वास बनी रहे---सफल रिश्ते का यही मूल मंत्र है। सबसे बड़ी पूंजी होती है रिश्तों में विश्वास।
                             सुनीता रानी राठौर
                        ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Saturday, 25 July 2020

(किलो के भाव से बिकते किताब)क्या यह साहित्य का अपमान नहीं है?

एक साधक की साधना सर्जक की सर्जना साहित्य रचना होती है। साहित्यानुरागी के दिल को ठेस पहुंचती है जब वह अपनी रचनाओं को किलो के भाव रद्दी के समान बिकते देखता है। कभी-कभी प्रकाशक की असहयोगात्मक रवैए के कारण अमूल्य रचनाएं प्रकाशित होने से वंचित रह जाती हैं कभी साहित्य के प्रति उदासीनता के कारण रद्दी के भाव किताबें बिकती दिखती हैं।
   जीवन का सबसे अच्छा मित्र किताब होता है परंतु बदलते समय में इंटरनेट ने किताब की बिक्री को प्रभावित किया है। लोग नेट के जरिए अपनी इच्छानुसार विषय-वस्तु का अध्ययन कर लेते हैं। किताब खरीदने के इच्छुक नहीं दिखते।
  किताबों का आदान-प्रदान और उपहार में भेंट करने का भी प्रचलन चल पड़ा है पर बहुत से शख्स हैं जिन्हें साहित्य से लगाव नहीं है। उपहार में मिले किताब  घर के किसी कोने में डाल देते हैं या रद्दी में बेच देते हैं। 
अनमोल कृतियां का अपमान देख ऐसा लगता है मानो साहित्य के कद्रदानो की कमी हो गई है। धर्मशाला में लगे ट्रेड फेयर में एक दुकान में पुस्तकें 150- 200 किलो के भाव से बेचे जा रहे थे। बरसों के अध्ययन और अथक परिश्रम से रचित रचनाएं कौड़ियों के भाव जब बिकती हैं तो साहित्यकार के दिल को ठेस पहुंचती है।
    पर इसका सकारात्मक पहलू भी है। जो साहित्य प्रेमी महंगी किताब खरीद कर नहीं पढ़ पाते वह सस्ती दरों से खरीद कर अपने इच्छाओं को पूर्ण कर पाते हैं। दूरदराज गांव में जो लाइब्रेरी खोलते हैं वे सस्ते दरों पर किताब ले जा कर लाइब्रेरी में संग्रहित कर पाते हैं जिसके वजह से गरीब तबके के लोग भी इसका सदुपयोग करते हुए अपने ज्ञान पिपासा को शांत कर पाते हैं। सरकार को भी गांव में पंचायत स्तर पर अधिक लाइब्रेरी बनाकर साहित्यिक कृतियां को संग्रहित करने की जरूरत है ताकि जन-जन में साहित्य के प्रति अभिरुचि जागे और वे ज्ञानवर्धन कर सकें।
                                   सुनीता रानी राठौर
                             ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Friday, 24 July 2020

आम जनता की तरह राजनीतिक दलों में सांसद व विधायकों को अधिकार होने चाहिए-----

सारे अधिकार सांसद व विधायक के पास ही हैं नाम के लिए वोट का अधिकार आम जनता के पास है। पर इस अधिकार का भी क्या फायदा? जिस तरह सांसद, विधायक दल-बदलू रवैया अपनाकर जनता को मूर्ख बना रहे हैं इससे तो लगता है कि चुनाव प्रक्रिया ही बंद हो जानी चाहिए। बेवजह अमूल्य समय और धन की बर्बादी चुनाव के नाम पर होती है।
 तीन चौथाई समय तो सरकार गिराने और सरकार बनाने में ही बर्बाद करते हैं। जनता की फिक्र कब करेंगे ? 
जब देश महामारी से त्रस्त है। लगभग 13 लाख लोग मौत से लड़ रहे हैं। करीब 31000 लोग मौत के मुंह में समा गए। दो राज्य महामारी के साथ-साथ बाढ़ से त्रस्त है-- कितने सांसद और विधायक सक्रिय हैं मदद करने के लिए?  हमें इस पर विचार करने और ध्यान देने की आवश्यकता है । अगर आज अपने जिम्मेदारियों को पूर्णता से निभाए होते तो महामारी हमारे देश में इतना विकराल रूप नहीं धारण किया होता। 
 आज सभी दलों ने जिस तरह से अपने सांसदों विधायकों को भेड़ बकरी की तरह हांकते हुए सरकार गिराने और बनाने की परंपरा बनाई है वह किसी प्रतिष्ठित लोकतंत्र के अनुरूप नहीं है। अधिकारों का दुरुपयोग कर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। पुलिस इनकी खिदमतगाड़ी में नतमस्तक रहती है। न्याय प्रक्रिया भी इनकी मुट्ठी में कैद होती जा रही है। घोटाला ये करें ---जांच में इनका साथ देने वाला अधिकारी,पुलिस बर्खास्त हो जाती है पर इनका कुछ नहीं बिगड़ता।
 आज हमारा देश कोरोना महामारी के चपेट में विश्व में दूसरे नंबर पर पहुंच गया है और इस विकट स्थिति इन सांसदों और विधायकों का जो हास्यास्पद रवैया देखने को मिल रहा है उसको देखते हुए ये स्वार्थलोलुप विधायक और सांसद आदर और सहानुभूति के पात्र कतई नहीं है।
                               सुनीता रानी राठौर 
                          ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 23 July 2020

'हिन्दी है तो भारत है'--कविता पर सम्मान पत्र https://bijendergemini.blogspot.com/2020/07/blog-post_62.html


क्या समाधान पर ही जीवन चलता है?

समय, बदलाव, समाधान और सफलता में अन्योन्याश्रित संबंध है। समय पर बदलाव को अपनाकर और समस्या पर विचार-विमर्श कर उचित समाधान ही सफलता की कुंजी है।
   हर समय हम जिद पर अड़े रहे तो किसी समस्या का समाधान संभव नहीं है और समाधान नहीं तो प्रगति संभव नहीं। जीवन है तो मुसीबत आएंगी। हमें सदैव समाधान ढूंढते हुए आगे बढ़ना है अन्यथा जीवन मुसीबतों से घिर जाएगा थे और जीवन अंधकारमय हो जाएगा।
    अतः समस्याओं का समाधान निकालते हुए जीवन पथ पर सुचारू रूप से अग्रसर होना है।  समाधान पर ही जीवन चलता है।
            जीवन का मूल मंत्र
            जीवन एक पहेली है 
          मुसीबतें आनी जानी हैं।
       समस्या का समाधान निकाल
      निरंतर प्रगति पथ पे चलना है।
---------*------------सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

सावन का मनभावन चित्रण

Wednesday, 22 July 2020

क्या अपराधियों की जाति पर राजनीति होनी चाहिए?

अपराध की कोई जाति नहीं होती। राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण से आज जनता त्रस्त है। राजनीति की भी एक सीमा  होती है। हर बात पर जाति के नाम पर बवाल ठीक नहीं। अपराधी किसी भी जाति का हो अपराधी ही होता है और उसे उसके अपराध की कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
 एक राजनीतिशास्त्र ज्ञाता के अनुसार राजनीति शास्त्र अपराध शास्त्र की एक शाखा है। आज जाति के नाम पर अपराध में लिप्त लोग भी राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते हुए संसद भवन में बैठ रहें हैं और अपराधियों को अपने फायदे के लिए संरक्षण दे रहे हैं। जो ऊंचे पद पर बैठकर अपराधियों का साथ दे रहे हैं वह अपराधियों से कई गुना ज्यादा अपराध कर रहे हैं। उन्हें आम अपराधी से दुगुनी सजा मिलनी चाहिए।
   आज ऊंचे आदर्शों के कमल कुम्हलाने लगे हैं। जाति के नाम पर बुद्धिजीवी भी अपराधियों का समर्थन करते नजर आ रहे हैं जो कि सरासर गलत है। लोकतांत्रिक प्रणाली को बनाए रखने के लिए निरपेक्ष भाव से जाति और पद को नजरअंदाज कर न्यायिक प्रक्रिया को बहाल करने की जरूरत है। पुलिस की कार्यप्रणाली में भी बहुत सुधार और बुनियादी परिवर्तन की मांग है। 
   संदेहास्पद एनकाउंटर मन में शंका का सौ बीज बोता है। जाति को नजरंदाज कर अपराधी को कड़ी सजा मिलनी चाहिए पर न्यायिक प्रक्रिया के तहत। कोई भी अपने अधिकार का दुरुपयोग करते हुए सजा देने का अधिकारी नहीं है। अपराधी के अपराध में साथ देने वाले राजनेता भी उतने ही गुनाहगार हैं जितना कि उस अपराधी का सहयोगी। अदालत को सख्त कदम उठाते हुए न्यायिक प्रक्रिया के तहत उन्हें भी सजा सुनाने की जरूरत है ताकि आइंदा कोई ऐसी गुस्ताखी न करें जाति के नाम पर भी राजनीति न करें। ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने की जरूरत है जो समाज में एक अच्छा सकारात्मक संदेश दे।
                    सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Tuesday, 21 July 2020

क्या प्रतिभा सिर चढ़कर बोलती है?


हर इंसान को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सही अवसर मिलने की देरी होती है। अवसर मिलते हीं युवा हीं नहीं बुजुर्ग और बच्चे भी अपने हुनर प्रदर्शित करने लगते हैं। सभी में एक होड़-सी लग जाती है अपनी प्रतिभा को दूसरे के समक्ष प्रस्तुत करने की। वास्तव में प्रतिभा सिर चढ़कर बोलती है।
विद्यालय द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम एक सुनहरा प्रयास होता है बच्चों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित कर खुद को निखारने का।
 डांस इंडिया डांस टीवी शो हो, सा रे ग म प गायन प्रतियोगिता हो या साहित्यिक ऑनलाइन प्रतियोगिता एक से बढ़कर एक प्रतिभावान लोग उभरकर अपनी प्रतिभा की श्रेष्ठता का परिचय देते हैं। जज के लिए अवलोकन करना मुश्किल हो जाता है कि किसे प्रथम स्थान पर रखें किसे द्वितीय स्थान पर। हम भी दांतो तले उंगली दबा लेते हैं कि कितने टैलेंटेड, प्रतिभाशाली लोग हमारे मध्य हैं।
    गायन-क्षेत्र में छोटे-छोटे बच्चे भी स्टेज पर ऐसे कमाल दिखाते हैं जैसे पेशेवर गायक गायिका। दूरदराज गांव से आए हुए बच्चों का अद्भुत नृत्य की प्रस्तुति देखकर फिल्मी अभिनेता अभिनेत्री भी अपने को छोटा महसूस करने लगते हैं।
  वर्तमान में सोशल मीडिया अपनी प्रतिभा को प्रस्तुत करने का सुनहरा प्लेटफार्म और सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। सभी अपने हुनर को बेहतरीन अंदाज में प्रस्तुत कर रहे हैं। ऑनलाइन संचालित तरह-तरह के प्रतियोगिता द्वारा सभी को प्रतिभा का जौहर दिखाने का मौका मिल रहा है। पहले सिर्फ अमीर लोगो की प्रतिभा हीं आम जनता को दिखती थी। अब सोशल मीडिया के माध्यम से हर तबके के कलाकार , रचनाकार अपनी प्रतिभा को प्रर्दशित कर रहे हैं। वास्तव में देखकर लगता है कि प्रतिभा सिर चढ़कर बोलती है।
                           सुनीता रानी राठौर
                          ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

संस्मरण---मन की टीस

हैदराबाद से प्रकाशित दक्षिण समाचार-- प्रतीक्षा में 💐मेरी रचना संस्मरण 💐 मन की टीस💐 को प्रकाशित करने हेतु संपादक महोदय नीरज कुमार सिन्हा जी को सादर धन्यवाद और हार्दिक आभार व्यक्त करती हूॅं 🙏🙏

क्या वामदल भारतीय संस्कृति के विरोधी हैं?

हमारा देश धर्मनिरपेक्ष देश है जहां हर धर्म, हर विचार, हर दल के लोग अपना स्वतंत्र विचार रखने के हकदार हैं। मेरा मानना है कि सभी दल में कुछ सामाजिक हित और संस्कृति से जुड़े रखने के बहुमूल्य विचार समाहित होते हैं।
  हमें अपने विरोधियों से भी कुछ अच्छे विचार हासिल हो जाते हैं यही हमारी संस्कृति सिखाती है। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम जी ने रावण के मरने के पहले लक्ष्मण जी को उनके पास ज्ञान अर्जित करने हेतु भेजा था। हम भी श्रीराम के अनुयायी हैं।
   जहां तक मैं वामदल के विचारों के बारे में जान सकी हूं वे सामाजिक समानता, मानवता, धर्म निरपेक्षता आदि की बात करते हैं। वे परिवर्तन में विश्वास रखते हुए सर्वहारा समाज, साम्यवादी राज्य की स्थापना चाहते हैं। वे दक्षिणपंथी विचारधारा के विरोधी हैं। उनके अनुसार पूंजीपतियों और मेहनतकश वर्ग का समान हक हो, श्रम की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ हो, वर्ग विहीन समाज हो। पूंजीपति वर्ग इनके विचारों से सहमत न होने के कारण इनको अपना विरोधी मानता है।
   आज हमारी संस्कृति पर कोई उंगली उठाता है तो हमें भी अपनी खामियों पर ध्यान देकर उसे दूर करने की आवश्यकता है।
  हमारे विचार से वामदल भारतीय संस्कृति के विरोधी नहीं हैं। जिस तरह प्रभु राम सर्वहारा वर्ग को साथ लेकर युद्ध में विजय प्राप्त किए उसी तरह हमें जन-जन को सम्मान और प्रतिष्ठा देते हुए सबको साथ लेते हुए अपनी संस्कृति को ऊंचाई पर पहुंचाना है। हमारी भारतीय संस्कृति प्राचीन और महान है। सभी को समेट कर समय के साथ अमूल-चूल परिवर्तन के साथ खुद को विश्व पटल पर महान साबित करना है।
                       सुनीता रानी राठौर 
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Monday, 20 July 2020

*हिन्दी है तो भारत है* ---शिर्षक कविता पर ऑनलाइन संचालित प्रतियोगिता में मिला सम्मान पत्र

💐जैमिनी अकादमी पानीपत द्वारा ऑनलाइन संचालित काव्य गोष्ठी 💐
💐 हिंदी है तो भारत है💐 विषय पर संचालक आदरणीय बीजेन्द्र सर द्वारा सम्मान-पत्र से सम्मानित किए जाने पर मैं बहुत-बहुत धन्यवाद और हार्दिक आभार व्यक्त करती हूं🙏🙏💐

Sunday, 19 July 2020

ऑनलाइन दर्शनों में मंदिरों की क्या भूमिका है?

कोरोनावायरस फैलने के डर से मंदिर का पट बंद किया गया। भक्त ऑनलाइन दर्शन कर अपनी आस्था को पूर्ण करते रहें इसके लिए सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए वर्चुअल दर्शन कराने में मंदिर वालों ने सहयोग किया।
   मंदिर ट्रस्ट ने पहल करते हुए श्रद्धालुओं के लिए
सुबह 5:00 बजे से लेकर रात 10:00 बजे तक ऑनलाइन पूजा,अभिषेक, हवन, प्रसाद बुक करवा कर भगवान का दर्शन करवा कर उनकी आस्था को पूर्ण करने में अपना योगदान दिया।
    मंदिर ट्रस्ट वेबसाइट के अलावा यूट्यूब, एफबी पर भी दर्शन की सुविधा उपलब्ध है। वैष्णो देवी की अटका आरती वेबसाइट, ऐप के अलावा श्रद्धा चैनल पर भी आरती का लाइव प्रसारण किया जा रहा। जियो रिलायंस ने देश भर के हनुमान मंदिरों में पटना के हनुमान मंदिर को सबसे पहले लाइव दर्शन के लिए चुना और पटना चैनल की शुरुआत की।
  देश के प्रमुख मंदिरों शिर्डी के साईं मंदिर, सिद्धिविनायक मंदिर, वैष्णो देवी, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, काशी विश्वनाथ, चिंतपूर्णी माता कांगड़ा,   महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन , बांके बिहारी मंदिर मथुरा,  महावीर मंदिर पटना आदि प्रसिद्ध मंदिर  ऑनलाइन दर्शन द्वारा भक्तों की आस्था को पूर्ण करने में अपनी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। अब तो मंदिरों के पट खोल दिए गए हैं। विकट घड़ी में समाज को निराशा पूर्ण स्थिति से निकालने में और भक्तों की आस्था को संतुष्ट करने में ऑनलाइन दर्शन के द्वारा मंदिरों ने अपनी अहम भूमिका निभाई।
                    सुनीता रानी राठौर
                     ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

संस्मरण------टूटता विश्वास

संस्मरण
             टूटता विश्वास
           --------------------
    मुसीबत में मदद करना मानव धर्म है। इसी विचार का अनुसरण करते हुए मैं एक सब्जीवाले के द्वारा छली गई। कोरोना काल में लगभग 3 महीने से एक सब्जीवाले से प्रतिदिन मैं फल और सब्जी लिया करती थी। हमारी सोसाइटी में उसकी अच्छी बिक्री होने लगी थी। आमदनी होते ही वह नशा का भी आदी होने लगा। लोग शिकायत करते फिर भी मैं सब्जी फल ले लिया करती क्योंकि उसका व्यवहार सही था। थोड़ी सहानुभूति भी मैं रखती थी क्योंकि उसकी पत्नी गुजर गई थी और दो छोटे बच्चे थे।
  एक दिन वह काफी दुखी और रूआसा होकर बोला ---मेरा छोटा भाई 50,000 कैश लेकर पड़ोसी लड़की के साथ भाग गया। लड़की वाले द्वारा शिकायत दर्ज होने पर पुलिस वाले मुझे पकड़ ले गए और बहुत पीटे। एक मेम साहब ने मुझे भला आदमी बोल कर उनसे छुड़वाया। अब तो मेरे पास माल लाने के लिए भी पैसे नहीं बचे----कह कर वह फूट-फूट कर रोने लगा।
   मैं उसे सांत्वना देकर चुप कराई। फिर उसने कुछ मदद की उम्मीद जताई। आप अंकल से पूछ कर 500- 1000 दे दो। मैं शाम में आऊंगा। आप चाहे तो पेपर पर लिखवा लो।
मैं प्यार से बोली--- भैया शाम को क्यों ? अभी ले लो। लिखवाने की कोई जरूरत नहीं है और मैं हजार रुपए उसे दे दी।
  दूसरे दिन थोड़ा फल लेकर आया ।वह पी रखा था--- फिर पैसे मांगे । कम से कम हजार और दे दो। इस बार मैं थोड़े गुस्से में बोली-- पीने वालों की  मैं मदद नहीं करती। उसने कसम खाई ---कभी नहीं ड्रिंक करूंगा। मैं कल पैसे देने का वादा कर घर आ गई।
  दूसरे दिन से वह आना बंद कर दिया। मुझे उस पर दया भी और तरस भी आ रही थी। कहीं बीमार तो नहीं पड़ गया या कहीं पुलिस वाले फिर पकड़ ले गए या सब्जी लाने के लिए बेचारे के पास पैसे नहीं होंगे आदि तरह-तरह के विचार आ रहे थे।
    मैं उससे फोन पर ऑर्डर देकर फल-सब्जी मंगाया करती थी। उसने रोते-रोते उस दिन बताया था --पुलिस वाले ने मेरे मोबाइल के सिम कार्ड भी निकाल लिए। शायद इसलिए फोन भी नहीं लग रहा था परंतु 20 -25 दिन बाद एक दिन फोन लग गया।
उसके बड़े भाई ने उठाया। वह कहीं दूर रहता था। मैं सब्जीवाले का हाल-चाल पूछी, उसकी आपबीती का जिक्र की, तब उसके बड़े भाई ने बताया ऐसा कुछ नहीं है जी। वो दारु पीने के लिए कितनों से झूठी कहानी सुनाकर उधार ले रखा है। इसी डर से सब्जी बेचने भी नहीं जाता।
   मैंने उसके बड़े भाई को विश्वास दिलाया कि मैं पैसों की खातिर फोन नहीं की। उसका हाल -चाल जानना चाह रही थी । वो आये, सब्जी बेचे और उसकी आमदनी होती रहे तो मुझे खुशी होगी पर वह नहीं आया।
‌  हां, मेरे विश्वास को झटका लगा। मैं तो उसकी मदद की थी मुसीबत के समय जैसे कोरोना काल में मजबूर लोगों की मदद की थी सिर्फ इस भावना से परंतु उसका झूठ बोल कर मदद मांगना अच्छा नहीं लगा।
   इनके जैसे ही एक दो बन्दों के कारण दूसरे गरीब मजबूर लोग बदनाम हो जाते हैं और समय पर मदद मिलने से वंचित रह जाते हैं। कोई सच्ची आपबीती भी सुनाये तो हम शक की नजर से देखते हैं। विश्वास बनाए रखना बहुत जरूरी है।
---------------*----------------*-------------
                       सुनीता रानी राठौर
                       ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Saturday, 18 July 2020

संस्मरण ------ मन की टीस

                     संस्मरण 
                    मन की टीस
            ----------------------------------------
  यह घटना कुछ वर्ष पहले उस समय की है जब मैं विद्यालय में कक्षाध्यापिका के रूप में परिणाम पत्र बना रही थी। आये दिन विद्यालय में अध्यापकों द्वारा छात्र छात्राओं के साथ पक्षपात पूर्ण रवैया के समाचार सुनने को मिलते हैं। मैं भी इस स्थिति से गुजरी हूं। मैंने भी झेला है।
    मेरी प्रतिभावान छात्रा जो प्रथम स्थान की हकदार थी, उसे गणित और विज्ञान के अध्यापकों के मिलीभगत द्वारा जानबूझकर Oral Test में कम नंबर देकर तीसरे स्थान पर पहुंचाया गया और तीसरे स्थान की छात्रा को प्रथम स्थान पर। क्यों? क्योंकि वो बच्ची उनसे ट्यूशन नहीं पढ़ती थी।
     मैं पूरी हकीकत जानते हुए भी आवाज बुलंद नहीं कर पाई क्योंकि वे दोनों अध्यापक प्रधानाध्यापक के विश्वासपात्र थे और उन्हीं के क्षेत्र के रहने वाले थे। 
  मैं दूसरे राज्य से blong करती थी। कुछ सालों के लिए पतिदेव के साथ स्थानांतरण होने पर उस शहर में गयी थी। मेरी बातों पर कोई विश्वास नहीं करेगा यह सोच कर मैं चुप रह गई। उसी दौरान साजिश के तहत मेरे जरूरी पेपर गायब कर मुझे प्रधानाध्यापक के नज़र में भी हल्का कर दिया गया था। इस वजह से भी अप्सेट होने के वजह से मैं आवाज बुलंद नहीं कर पायी। 
     उस बच्ची के साथ हुए अन्याय का दोषी मानकर मैं खुद को अपराध मुक्त नहीं कर पायी  और आज भी वो टीस मेरे मन को सालते रहता है।
   मैं चाहूंगी कि ओरल टेस्ट के पक्षपात पूर्ण रवैया से बचाने के लिए हर जगह रिकॉर्डिंग की व्यवस्था हो ताकि अध्यापक अपनी मनमानी न कर सके।
                              सुनीता रानी राठौर
                           ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
                   

Friday, 17 July 2020

विधा--हाइकु विषय--रास्ता (5-7-5)

विधा--हाइकु    विषय- रास्ता  (5-7-5)
    1.      
         निकालें रास्ता
        अपनी समझ से
          मुसीबतों में।
     2.     
           छोड़ें डरना
         चले कठिन रास्ते
           पाएं मंजिल ।
      3.
           मार्ग प्रशस्त
          सफलता का सूत्र
            करें संघर्ष।
      4.
           राह के रोड़े
          डालते व्यवधान
            अडिग रहें।
      5.
           चलें पथ पे
          कर दृढ़ निश्चय
           लक्ष्य के साथ।
      6.
            संभावनाएं
          हैं पग-पग पर
            करें संकल्प।
      7.
            कंटीले रास्ते
           चले महापुरुष
            मिला मुकाम।
            
     --------*---------सुनीता रानी राठौर

            

          
           

Thursday, 16 July 2020

क्या आधुनिक तकनीक से लैस नया संसद भवन होना चाहिए?

आधुनिक तकनीक से लैस नया संसद भवन क्यों नहीं होना चाहिए , अवश्य होना चाहिए बशर्तें सरकार के पास सरप्लस पैसे हों। आज की स्थिति ऐसी है कि सरकार के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए फंड नहीं है। केंद्रीय कर्मचारियों के 1 साल के D.A.काट दिए गए।
  आंख बंद करने से हकीकत छुप नहीं जाती। यह सर्वविदित है कि हमारे देश के दूरदराज गांवों की स्थिति कैसी है? वहां के बदहाल स्थिति का समाचार मीडिया वाले कितना दिखाते हैं, सभी बुद्धिजिवियों  को पता है।
  जनता के टैक्स का पैसा राजनेता कहां इस्तेमाल करें यह उनके ऊपर निर्भर करता है। सरकार आते- जाते रहती है। गरीबों की स्थिति यथावत बनी रहती है। सरकार का प्रथम कर्तव्य है कि जनता के मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने और गांव को भी खुशहाल बनाने का प्रयास करे।
  वर्तमान में अस्पतालों की जो स्थिति है और विशेषकर गांव में जितनी कमी अस्पतालों की है ,आज के समय में त्वरित गति से किस ओर काम करने की आवश्यकता है एक अच्छी सरकार भली-भांति समझ सकती है।
  यदि आप कर्तव्यनिष्ठ सरकार हैं और अपने फर्ज को ईमानदारी से पूर्ण करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम मूलभूत जरूरतों पर ध्यान देकर पैसों का सही समय पर सही इस्तेमाल करें न कि आधुनिक तकनीक से लैस नया संसद भवन बनाने पर। जनता की आंख के तारे बनें न कि आंख की किरकिरी। आम नागरिक की सरकार से यही अपेक्षा रहती है।
                             सुनीता रानी राठौर
‌                        ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

विधा-------हाइकु। 5-7-5

विधा---हाइकु  (5-7-5)
            1.     
         डूबते घर 
       जलमग्न है गांव
        किसको फिक्र?
                 2.      
         नया था बांध
      धाराशाई बाढ़ में
       खोखला काम।
                3.     
         खेत-बधार 
       बह रहा फसल
        रोता किसान ।
              4.    
        हाल बेहाल 
      सो रहा प्रशासन 
          गहरी नींद।
               5.
          जगजाहिर 
        भ्रष्टाचारी प्रपंच 
           पकड़े कौन?

Tuesday, 14 July 2020

सागर की लहरें

क्या भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों की तानाशाही उचित है?

भारत में लोकतंत्र को सबसे अधिक नुकसान इस बात से पहुंच रहा है कि संविधान में राजनीतिक पार्टियों के लिए कोई नियम ही समाहित नहीं है। सभी पार्टियों में  'वन मैन शो'  की पूर्ण झलक दिखती है। अपनी पार्टी के विधायकों और सांसदों को जनप्रतिनिधि नहीं बल्कि कठपुतली समझा जा रहा है। शीर्षस्थ एक-दो नेताओं के द्वारा पार्टी जागीर की तरह चलाई जा रही है। उनके हर विचार को पार्टी का विचार कह लागू कर दिया जाता है। यहां तक कि जनता द्वारा चुनी गई सत्ताधीन पार्टियों द्वारा भी जनता के सहमति बिना हीं, जनता के हितों का अनदेखी कर बड़े-बड़े फैसले थोप दिए जाते हैं। विरोध में आवाज उठाना सरकार को नागवार गुजरता है।
   आप किसी पार्टी के सदस्य हों या देश के नागरिक--- लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत सभी को अपना विचार रखने का हक है और शीर्षस्थ  नेताओं को उन विचारों को सुनना भी अनिवार्य है।
    तानाशाही प्रवृत्ति से अंदरूनी कुंठा जन्म लेती है जो कि धीरे-धीरे विस्फोटक रूप ले लेती है।  वर्तमान में जिस तरह से सरकार तोड़ने और बनाने की प्रक्रिया चल रही है वह भी तानाशाही का ही प्रतीक है। जनता के बहुमत का अपमान, जनता के लिए कार्य न कर सरकार गठन में समय की बर्बादी, बेवजह चुनाव में लाखों का खर्च आदि कार्य राजनीतिक पार्टियों की मनमानी और तानाशाही का ही दूसरा रूप है।
   अतः मेरे विचार से राजनीतिक पार्टियों की तानाशाही बिल्कुल उचित नहीं है। वही सरकार ज्यादा दिनों तक सत्ता में आसीन रहती है जो जनता में विश्वास बनाए रखे और जनता के हित- अहित का ध्यान रखते हुए कार्य करे।
------------------सुनीता रानी राठौर
                        ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Monday, 13 July 2020

क्या कोरोना को रोकने के लिए छोटी छोटी अवधि के लॉकडाउन लगने चाहिए?

  कोरोनावायरस के मामले में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। वायरस न फैले, सभी लोगों को बीमारी से बचाया जा सके, लोगों को सही जानकारी उपलब्ध हो सके,सभी एहतियात बरतें ----इस उद्देश्य से सरकार ने जो लंबे समय के लिए चार दफा लॉकडाउन लगाया, वो पर्याप्त था। लोगों में इतनी जागरूकता आ जानी चाहिए कि खुद के बचाव के लिए क्या सावधानियां बरतनी है। हमें नहीं लगता कि छोटी छोटी अवधि के लॉकडाउन से कोई फायदा होने वाला है। जब सप्ताह में 5 दिन एहतियात बरतते हुए बाहर जा कर अपना काम कर सकते हैं तो 2 दिन भी उस तरह से अपना ध्यान रख सकते हैं बशर्ते जनता जागरूक हो। 
    कोरोनावायरस जिस तीव्र गति से फैला है वह इसी लापरवाही का परिणाम है। सार्वजनिक स्थलों पर भीड़ देखने को मिलती है। पर्याप्त मात्रा में जांच नहीं होता जिसके कारण लोग अंधेरे में रहते हैं। पढ़े-लिखे सुशिक्षित लोग भी नियमों का उल्लंघन करते हुए देखे जाते हैं। जब तक खुद में समझदारी नहीं हो तब तक सरकार छोटी-छोटी अवधि के लॉकडाउन के द्वारा भी कुछ हासिल नहीं कर सकती। इससे प्रदूषण को कम किया जा सकता है पर कोरोना वायरस को नहीं।
                                  सुनीता रानी राठौर
                         ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Saturday, 11 July 2020

क्या राजनैतिक संरक्षण का परिणाम है विकास दुबे?

  गैंगस्टर विकास दुबे राजनैतिक गंदगी की उपज है।सियासत, अपराध और पुलिस गठजोड़ का नमूना है विकास दुबे जैसे लोग जो जुर्म का बादशाह बन खून-खराबा कर दहशत फैलाते हैं। 
   8 पुलिस वालों की मौत हुई तो पुलिस और प्रशासन जाग उठी। आम आदमी मरता तो अभी वह छुपा बैठा रहता क्योंकि उसके सिर पर सभी पार्टियों के नेताओं का हाथ था। उसके एनकाउंटर से नेताओं और बड़े अधिकारियों के नाम उजागर होने से रह गए।
एक पर चढ़ा कफन और सौ का राज दफन। 
 गैंगस्टर विकास दुबे पर 60 से ज्यादा हत्या, रंगदारी जैसे संगीन धाराओं के मामले दर्ज हैं लेकिन राजनैतिक संरक्षण की वजह से कोई सख्त एक्शन नहीं लिया गया। हिस्ट्रीशीटर अपराधी जिसने 2001 में राज्य मंत्री संतोष कुमार शुक्ला को जेल में पुलिस के सामने मारा, कालेज प्रबंधक से लेकर कितने नामी लोगों की हत्या की और उसके खिलाफ गवाही देने या मुकदमा दर्ज कराने की हिम्मत लोग नहीं कर पाए। वो खूंखार बनता गया आखिर क्यों ? क्योंकि राजनेताओं ने उसे पनाह दे रखी थी। 
      कोई भी अपराधी कितना भी खूंखार क्यों ना हो पर पुलिस पर गोली चलाने की हिमाकत नहीं कर सकता जब तक कि उसे राजनेताओं और पुलिस अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त ना हो।
    जब थानाध्यक्ष विनय तिवारी जैसे लोग अपराधियों के मुखबिर बन जाए, राजनेता संरक्षण दे तो समाज में ऐसे कुख्यात अपराधियों को फलने-फूलने में समय नहीं लगता। असली अपराधी विकास दूबे के साथ- साथ देश के वे राजनेता और अधिकारीगण भी हैं जो ऐसे अपराधियों को संरक्षण देकर गुनाह को दबाने में साथ देते हैं। इन्हें भी फांसी की सजा मिलनी चाहिए।
                        सुनीता रानी राठौर
                            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

एनकाउंटर

Friday, 10 July 2020

क्या दलाई लामा को भारत रत्न सम्मान दिया जाना चाहिए?

   भारत रत्न भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और यह सम्मान असाधारण राष्ट्रीय सेवा के लिए प्रदान किया जाता है। इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है।
बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा हिमाचल के धर्मशाला के तवांग मठ में बीते कई दशकों से रह रहे हैं और यहां से ही तिब्बत की निर्वासित सरकार चलती है। भारत सरकार ने उन्हें राजनीतिक संरक्षण दे रखा है।
    शांति के अग्रदूत दलाई लामा पिछले छह दशकों से तिब्बत की आजादी और वहां मानवाधिकारों की बहाली के लिए निरंतर शांतिपूर्वक और अहिंसात्मक रूप से संघर्ष कर रहे हैं। तिब्बतियों के और दलाई लामा के सहयोग से चीन पर भारत सरकार भी दबाव डाल सकती है और शांतिपूर्ण तरीके से तिब्बत को आज़ादी दिलवाने के साथ-साथ अपना भी मामला सुलझा सकती है।
  महामहिम धर्मगुरु दलाई लामा को शांतिपूर्ण प्रयासों के लिए विश्व का सर्वोच्च सम्मान नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। दलाई लामा शांति दूत के रूप में कार्य कर रहे हैं पर भारत के लिए कोई खास विशेष योगदान नहीं है। परंतु दो गैर भारतीय नागरिक अब्दुल गफ्फार खान और नेल्सन मंडेला को सराहनीय कार्य हेतु भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है। उसी आधार पर धर्मगुरु दलाई लामा भी विश्व शांति दूत के रूप में अहिंसावादी मार्ग पर चलकर जो सराहनीय कार्य कर रहे हैं उसके लिए अगर उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाता है तो कोई अनुचित कदम नहीं होगा।
                                सुनीता रानी राठौर
                               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 9 July 2020

क्या जिंदगी का श्रृंगार है सावन?

सावन मास में प्रकृति सोलह श्रृंगार संग यौवन के चरम मादक रूप में प्रस्तुत होती है । प्रकृति सर्वत्र हरी-भरी खुशहाल और मनभावन प्रतीत होती है।हरियाली खुशहाली और समृद्धि का द्योतक है।
      ग्रीष्म ऋतु की तपिश और अकुलाहट के बाद मेघो से धरती पर उमड़ती बरखा बहार जीव जगत को प्रकृति का अनुपम उपहार है। वन-उपवन में हरियाली, फल-फूल से लदे पेड़-पौधों की डालियां, मयूर का पंख फैलाकर सुंदर नृत्य पेश करना, नदी तालाब और झरनों का कल-कल निनाद इत्यादि धरती के सोलह श्रृंगार का आभास कराती है।
    सावन महीना जहां भगवान शंकर जी की पूजा-पाठ के लिए जाना जाता है वहीं इस महीने महिलाएं भी बनाव-श्रृंगार का खास ख्याल रखती हैं। हाथों में मेहंदी सजाने का विशेष महत्व है। सोलह श्रृंगार के साथ श्रावणी पूजन करते हुए महिलाएं काफी खूबसूरत और नफ़ासत लगती हैं। सजी-धजी अनुपम रूप में महिलाएं और कांवर लिए हुए पुरुष भोलेनाथ को प्रसन्न करते हैं। यह महीना इच्छा और आशाओं की पूर्ति का महीना है।
     श्रृंगार करना सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। श्रृंगार खूबसूरती ही नहीं भाग्य को भी बढ़ाता है।
   प्रकृति का हरा-भरा प्रश्नचित्त सुहावना रूप, सजी-धजी महिलाओं का अद्भुत रूप और कांवरधारी पुरुषों का भक्ति-भाव देख कर यूं लगता है कि धरती ने सोलह श्रृंगार कर अद्भुत रूप में खुद को सजा रखा है। वास्तव में जिंदगी का श्रृंगार है सावन।
                             सुनीता रानी राठौर
                            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या स्वस्थ जीवन का आधार हैं पेड़-पौधे?

जी हां, इसमें कोई दो राय नहीं कि स्वस्थ जीवन के आधार हैं पेड़-पौधे। पेड़-पौधे वातावरण में मौजूद हानिकारक कार्बन सोखकर शुद्ध जीवनदायिनी ऑक्सीजन देते हैं जो कि हमारे जीवन के लिए संजीवनी बूटी समान है। आपके आसपास जितने अधिक पेड़ होंगे उतना ही प्रदूषण कम होगा। पर्यावरण की सुरक्षा में पेड़-पौधे का बहुत अधिक महत्व है। प्रकृति मुफ्त में ऑक्सीजन देकर मानव जीवन की रक्षा करती है।
     एक औसत आकार का पेड़ 1 वर्ष में इतनी ऑक्सीजन देता है जिससे 4 लोगों का परिवार पूरे साल सांस ले सकता है। पेड़ों की वजह से बारिश भी होती है और बारिश से कृषि-उद्योग फलता- फूलता है। साथ ही अधिकांश पेड़ औषधीय गुणों की वजह से स्वास्थ्य सुधार में भी सहायक होते हैं।
पेड़ों को देखने से भी स्वास्थ्य ठीक होता है। जिन अस्पतालों में पेड़ होते हैं वहां मरीज जल्दी स्वस्थ होते हैं।
    औद्योगिकरण और शहरीकरण के वजह से जिस तीव्रता से अंधाधुंध वनों की कटाई हुई उस क्षति को पूर्ण करने के लिए सरकार और जनता जागरूकता के साथ वृक्षारोपण अभियान पर बल दे रही है। लगातार बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग का असर कम करने के लिए शहरों के बीचो-बीच बड़े-बड़े पेड़-पौधे लगाए जा रहे हैं।
  जापान में लकड़ी से बनी दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बनाई जा रही है। 350 मीटर ऊंची इस इमारत के हर माले पर पेड़ लगाए जाएंगे।
      भारत में भी वृक्षारोपण अभियान के कारण वातावरण का स्वास्थ्य सुधर रहा है जिसके फल स्वरुप भारतीयों का भी स्वास्थ्य सुधर रहा है।
     इस तरह हम कह सकते हैं कि पेड़-पौधे स्वस्थ जीवन के आधार हैं। हमें अत्यधिक पौधारोपण कर वातावरण को प्रदूषण रहित बनाना है। पौधारोपण जीवन के जरूरी कार्यों में समाहित कर जीवन को स्वस्थ व खुशहाल बनाना है।
                                   सुनीता रानी राठौर 
                             ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

जैमिनी अकादमी के संपादक विजेंद्र जैमिनी जी के द्वारा मिला सम्मान पत्र

Tuesday, 7 July 2020

चलो और खुशनुमा घर बनाएं

क्या चीन की चालों का जवाब है तिब्बत?

चीन ने पूरी दुनिया में कोरोनावायरस फैलाकर सभी देशों के अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा दिया है और खुद अपनी दुनियादारी चमका रहा है और विस्तारवादी नीति भी अपना रहा है।
   तिब्बत की राजधानी ल्हासा को चीन ने कब्जा कर रखा है। चीन के कब्जे के बाद से काफी संख्या में तिब्बती लोग और वहां के धर्मगुरु दलाई लामा भी भारत में शरण लिए हुए हैं। दुनिया में जहां भी तिब्बत के लोग शरण लिए हुए हैं, तिब्बत की आजादी की मांग बुलंद करते रहते हैं। 
    शांतिप्रिय राष्ट्र तिब्बत पर जबरदस्ती कब्जे का मामला संयुक्त राष्ट्र में भी नहीं उठ सका परंतु कुछ दिनों पहले अमेरिका ने तिब्बत को अलग देश का दर्जा देने की मांग उठाई है और कहा है कि चीन तिब्बती बौद्ध धर्म गुरु पंचेन लामा को रिहा करे। चीन की रणनीति को काटने के लिए अमेरिका ताइवान, हांगकांग और तिब्बत को लेकर दखल देना शुरू कर दिया है।
   तिब्बत को जॉन ऑफ पीस बनाना होगा। दोनों सीमाएं आर्मी फ्री होनी चाहिए। तभी शांति होगी।भारत और चीन के बीच तिब्बत है और जब तक तिब्बत का मुद्दा हल नहीं होता तब तक तनाव की स्थिति बनी रहेगी।
इस वक्त दुनिया के चक्रव्यूह में चीन फंसा हुआ है। शक्तिशाली देशों के साथ मिलकर तिब्बत को आजादी भी दिलवा सकते हैं और चीन को कमजोर कर उसके विस्तारवादी नीति को ध्वस्त भी कर सकते हैं। चीन के चालों का जवाब भी होगा तिब्बत की आजादी।
                             सुनीता रानी राठौर
                          ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Monday, 6 July 2020

क्या सावन में पौधे लगाने का समय सबसे अच्छा है?

पेड़-पौधे लगाना प्रकृति और धरती पर वास करने वाले सभी प्राणियों के लिए शुभ है। जल की तरह पेड़-पौधे भी हमारे जीवन के अविभाज्य अंग हैं। पेड़-पौधे जिंदगी में बरकत और समृद्धि प्रदान करते हैं। सावन महीना हरियाली खुशहाली का प्रतीक होता है। वर्षा ऋतु के कारण हर तरह के पौधे लग जाते हैं। खेतों में धान के पौध के साथ-साथ हर तरह के छोटे-बड़े पौधे घर-आंगन में भी लगाए जाते हैं।
    धरती पर जैसे हीं सावन की बूंदे पड़ती है पेड़ पौधों में हरियाली छा जाती है। यही सीजन होता है कि आप अपने बाग बगीचे को तरह-तरह के पौधे लगाकर सजा संवार सकते हैं और वातावरण को खुशनुमा और प्रदूषण रहित बना सकते हैं। सही दिशा में घरेलू पौधे से घर में धन की देवी का वास होता है। अलग-अलग तरह के पौधे सुख शांति व शुभ संकेत देते हैं। मनी प्लांट हो या मीठा कड़ी पत्ता, शमी का पेड़ हो या अश्वगंधा या बेलपत्र घर में लगाना शुभ माना जाता है। तुलसी, अनार का पौधा लगाने से वातावरण भी उत्तम रहता है।
     आज के नगरीय वातावरण में कम जगह होने के कारण हम बड़े पेड़ों के स्थान पर छोटे पौधे लगाकर अपने आवास को खूबसूरत भी बना सकते हैं और शुभ फल भी पा सकते हैं।
    सावन का महीना वर्षा ऋतु और भगवान शंकर का पवित्र महीना होने के कारण पौधे लगाने का सबसे अच्छा समय माना गया है। यही कारण है कि इस समय चारों तरफ प्रकृति हरी-भरी,खुशहाल और आनंदित प्रतीत होती है।
                              सुनीता रानी राठौर 
                          ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Wednesday, 1 July 2020

ईश्वर के प्रतिरूप

समर्पित चंद पंक्तियां 'डॉक्टर्स डे' पर ------
---------------------------------
उन सभी चिकित्सक को श्रद्धा भाव से नमन,
जो सच्चे सेवा भाव से करते सदा मानव सेवा।

जो ईश्वर के अवतार बन देते नया जीवनदान ,
श्रद्धापूर्वक,स्नेह भाव,निष्ठा से करे नित्य काम।

निरंतर कार्य, बिना विश्राम,सच्चे साधक का रूप, ईश्वर की दूजे रूप में डॉक्टर वास्तविक प्रतिरूप।

 चंद चिकित्सक दरिंदे बन करते सबको बदनाम, 
धंधा बनाते अपने धर्म को लगता सबपे इल्जाम।

चंद सिक्कों के लालच में मत बेचो अपना ईमान, लानत है ऐसे डॉक्टरों पे जो करते घटिया काम।

धन्य हैं वे डॉक्टर्स जो जान पर खेल बचा रहे जान, नमन करूं ह्रदय तल से जो करें निष्ठापूर्वक काम।
------------🙏--------💐------सुनीता रानी राठौर

क्या बहुत महंगा पड़ता है चीन का सस्ता और घटिया माल?

चीन का सस्ता और घटिया माल इस कहावत को चरितार्थ करता है --'सस्ता रोए बार-बार मंहगा रोए एक बार'।
   आम जनता जानती है कि चाइनीज माल टिकाऊ नहीं होते, पर कुछ आर्थिक मजबूरी की वजह से कुछ नए-नए डिजाइन में चीजें उपलब्ध होने की वजह से खुद को आकर्षित होने से रोक नहीं पाते।
पर वह हमारे लिए महंगा साबित होता है क्योंकि तुरंत खराब हो जाता है, खराब होने के बाद उसकी रिपेयरिंग भी नहीं हो पाती और हमें मजबूरन यूं ही उसे फेंक कर दूसरा खरीदना पड़ता है। 
    कारोबारी भी सस्ते माल से होने वाले मुनाफे के कारण चीन की ओर आकर्षित होते गए और उसका दुष्परिणाम हुआ घरेलू उत्पादन उद्योग का धीरे-धीरे खत्म होना, रोजगार भी खत्म होना।
    आज हमारा बाजार मेड-इन-चाइना के सामान से पटा पड़ा है। भगवान की मूर्ति से लेकर खिलौने तक, कपड़े से लेकर कंप्यूटर तक, गैर पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र सभी पर उसका एकछत्र राज है।
    भारत जो सामान बनाता था, चीन, भारत में वही सामान सस्ते दाम में बेच रहा है। चीन पर भारत की निर्भरता दवा बनाने को लेकर भी है। जेनेरिक दवाएं बनाने और उसके निर्यात में भारत बहुत आगे है पर इसके कच्चे माल के लिए 90 फीसद भारत चीन के भरोसे है। 70 फ़ीसदी मोबाइल फोन के लिए भारत की निर्भरता चीन पर है। कॉस्मेटिक के कई ऐसे उत्पाद जो पूरी तरह चीन के कच्चे माल पर निर्भर है।
  निर्यातकों के अनुसार चीन से सस्ते दाम पर कच्चे माल मिलने की वजह से उनकी लागत कम होती है और वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मुकाबला करने में सक्षम होते हैं।
    आज की परिस्थिति में भारत को खुद को सक्षम साबित करने का एक अवसर मिला है। यहां चीन जितना बड़ा बाजार है। कई गुना मैन पावर है और लोगों को रोजगार की भी सख्त जरूरत है। छोटे उद्योग संजीवनी साबित होते हैं। सरकार इसे बढ़ावा देकर अच्छी गुणवत्ता का सामान तैयार करा सकती है। सरकार को टैक्स भी मिलेगा और चीन पर निर्भरता भी कम होगी। सरकार को भारतीय फार्मा उद्योग और विविध उद्यमियों के साथ मिलकर लंबी योजना बनाने की जरूरत है।
    चीन से आने वाले उत्पादों पर ज्यादा टैक्स लगाया जाए और देश के कच्चे माल पर टैक्स कम किया जाए ताकि यहां के उद्योग धंधों का विस्तार और विकास तीव्र गति से हो सके और आम जनता को अच्छी गुणवत्ता वाली समान कम दाम में मिल सके ताकि उनका झुकाव घटिया चाइनीज सामान से दूर हो सके।  भारतीय अपने देश में निर्मित सामानों को खरीदने की ओर अग्रसर हो। इससे हमारा देश भी आर्थिक रूप से मजबूत और सक्षम होगा।
                                  सुनीता रानी राठौर
                             ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)