Sunday, 1 November 2020

क्या मजहबी कट्टरता की आड़ में बेकसूर लोगों की हत्या उचित है?

क्या मजहबी कट्टरता की आड़ में बेकसूर लोगों की हत्या उचित है?
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मजहबी कट्टरता की आड़ में बेकसूर लोगों की हत्या कभी उचित हो ही नहीं सकती। बचपन से ही हम सभी पढ़ते आये हैं --
'मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना'--
 पर वर्तमान में जो दृश्य हमें देखने को मिल रहा है मजहब के नाम पर जो हिंसा, उन्माद फैलाया जा रहा है वह मानव हित में नहीं है।
 कोई भी धर्म कभी भी खून खराबा करना नहीं सिखाती। सभी धर्म हमें भाईचारा, प्रेम का संदेश देती है पर कुछ स्वार्थी तत्व धर्म के नाम पर माहौल बिगाड़ कर अपरिपक्व बच्चों को बरगला कर जो अशांति फैलाते हैं वह धर्म के नाम पर धब्बा है इंसान कहलाने लायक ही नहीं।
 यह मानव के वेश में छुपे हुए भेड़िए हैं जो शांति भंग कर अपनी तुच्छ प्रवृत्ति को पूर्ण करना चाहते हैं। नवयुवाओं को बरगला कर उनका ब्रेनवाश कर अपनी राक्षसी प्रवृत्ति को अंजाम देते हैं।
      हमारा देश हो या फ्रांस या कोई भी देश ऐसे गुनाहगारों को सख्त से सख्त सजा देने का प्रावधान होना चाहिए ताकि दहशतगर्दो को सबक मिल सके और वह दहशतगर्दी करने से बाज आएं।
 धर्म के नाम पर अधर्म कर अशांति न फैलाएं।
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                   सुनीता रानी राठौर 
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या जीवन का हिस्सा है बचत की आदत डालना?

क्या जीवन का हिस्सा है बचत की आदत डालना?
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जी हां, जीवन का हिस्सा है बचत की आदत डालना। यह आदत ही हमें मुसीबत के घड़ी में सहायता प्रदान करता है। कठिन घड़ी में किसी के समक्ष हाथ फैलाने की नौबत नहीं आती। आज का किया हुआ बचत कल विपत्ति की घड़ी में मददगार साबित होता है।
 फिजूलखर्ची हमारी आदतों को तो बिगड़ता ही हैं हंसी का पात्र भी बनाता है। हम अपनी जैसी आदत और व्यवहार जीवन में अपनायेंगे उसी का अनुपालन हमारे बच्चे भी करगें। भविष्य में बच्चों की भी आदतें अच्छी बनी रहे इसके लिए खुद को भी अच्छी आदतों पर अमल करना जरूरी होता है। बुजुर्गों ने भी कहा है- "चादर देख कर पैर फैलाए"।
    आज की बचत हमारे कल के सुरक्षित भविष्य का निर्माण करता है। अगर हमें अपने भविष्य को सुरक्षित और सुनहरा बनाना है तो बचत की आदत डालते हुए अपने खर्चों पर नियंत्रण करने का प्रयास करना जरूरी है।
    जीवन का हिस्सा है बचत की आदत डालना सुखद भविष्य की खातिर। भविष्य किसी ने नहीं देखा पर एक उम्मीद की किरण के साथ हम सपने संजोते हुए सुनहरे भविष्य के खातिर हर तरह से बचत करते हैं।
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            सुनीता रानी राठौर 
            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

इंसान क्यों बन जाता है जानवर?

इंसान क्यों बन जाता है जानवर?
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इंसान विवेकशील प्राणी है-- जब उसका विवेक काम करना बंद कर दे तो वह जानवरों की तरह पेश आने लगता है। ईर्ष्या,लोभ,द्वेष, अहंकार जैसे दुर्गुणों के कारण वह स्वार्थवश दूसरों का अहित और अपने हित की कामना करने लगता है।
    जब उसके हृदय में परदुखकातरता की भावना खत्म हो जाती है, सामने वाले के प्रति उसके हृदय में सहानुभूति, ममता, दया, करुणा जैसे मानवीय गुणों का हनन हो जाता है तब वह इंसान जानवरों की तरह बिना सोचे-समझे व्यवहार करता है। उसे सिर्फ अपनी भलाई की चिंता होती है। दूसरे के दुख से उसके हृदय में कोई सहानुभूति नहीं उपजती।
    ऐसा इंसान स्वार्थवश सिर्फ अपना भला चाहता है और अपने सुख की परवाह करता है।
   मनुष्य संवेदनशील प्राणी है। भावुकता में आकर कभी-कभी अंधभक्त बन कर भी भीड़ का हिस्सा बन क्षणिक आवेश में बिना विवेक से निर्णय लिए वह जानवरों की तरह अमानवीय हरकत करता है। कुछ पल के लिए तो उसे आत्मसंतुष्टि मिलती है पर अंततः उसकी आत्मा धिक्कारती ही है।
   तुच्छ आत्मसंतुष्टि हेतु इंसान जानवर यानी हैवान बन जाता है जिसका परिणाम हमेशा दुखदाई ही होता है।
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         सुनीता रानी राठौर
      ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या जीवन का मतलब सिर्फ दुनिया में आना जाना है?

क्या जीवन का मतलब सिर्फ दुनिया में आना जाना है?
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यह इंसान के मानसिक सोच पर निर्भर करता है कि वह अपने जीवन के संबंध में क्या सोच रखता है। कुछ लोगों का जीवन आराम तलब होने के कारण वह जिंदगी में सिर्फ मौज-मस्ती करना ही अपना ध्येय बना लेते हैं जबकि कुछ लोगों का मानना है कि जीवन अनमोल है, इस बहुमूल्य जीवन के पल- पल का सदुपयोग करते हुए अच्छे कर्मों के द्वारा अपना नाम उजागर कर सकें ताकि दुनिया से विदा लेने पर भी नाम अजर-अमर रहे।
      जीवन तो पशुओं को भी मिला है जिनका काम है खाना और सोना। अगर हम अपने सुकर्मों से अपने जीवन को सुसज्जित नहीं बनाए तो फिर पशुओं और हमारे जीवन में क्या फ़र्क रह जायेगा?
           मनुष्य योनि में जन्म लेना बहुत भाग्य की बात है। हम विवेकशील प्राणी होने के नाते अपने जीवन के हर क्षण को नेक कामों से अपने समाज और देश की भलाई में सदुपयोग करते हुए व्यतीत करते हैं तब हमें एक अद्भुत और अनुपम ख़ुशी का एहसास होता है असीम शांति महसूस होती है और यही नेक काम ईश्वरीय पूजा भी है।
           जीवन का मतलब सिर्फ दुनिया में आना जाना नहीं है बल्कि जो जीवन मिला है उसे 
 सत्कर्मों में लगाते हुए मानव जीवन को सफल बनाना है। अनैतिकता से दूर रहते हुए नैतिक आचरण और सद्व्यवहार के द्वारा लोगों के दिलों में जगह बनाना भी अपना धर्म होना चाहिए।
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                        सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

समस्याओं से बाहर कैसे निकल सकते हैं?

समस्याओं से बाहर कैसे निकल सकते हैं?
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जीवन संघर्ष-पथ है। कदम-कदम पर समस्याओं का सामना करना और उसका समाधान करते हुए आगे बढ़ते रहना ही सफल जीवन का पर्याय है।
धैर्य, आत्मविश्वास,आत्मसंयम, विवेकपूर्ण निर्णय के द्वारा ही समस्याओं से बाहर निकला जा सकता है।
   कभी-कभी परिस्थितियां ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है कि इंसान की समझ से परे हो जाता है कि इस समस्या से बाहर कैसे निकलें-- ऐसी हालात में पहले परिस्थिति को जानने-समझने का प्रयास करें फिर सोच-समझकर विवेकपूर्ण निर्णय लें। 
   कभी-कभी हालात ऐसे उत्पन्न हो जाते हैं कि जो समस्या है उससे ज्यादा समस्या तुरंत दी गई प्रतिक्रिया से उत्पन्न हो जाती है। अतः आनन-फानन में प्रतिक्रिया देने से भी बचें।
    जो लोग ऊपर से खुश दिखते हैं ऐसा नहीं कि उनके जीवन में कोई समस्या नहीं है। वह भी हजारों समस्याओं से जूझते रहते हैं पर धैर्य और आत्मविश्वास को बनाए रखते हुए समझदारी से समस्या को निपटाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
   निष्कर्षत:कह सकते हैं कि अगर समस्या आती है तो उसका समाधान भी संभव है--घबरायें नहीं, धैर्य और आत्मसंयम को बनाए रखते हुए आत्मविश्वास के साथ ईश्वर पर भरोसा रखते हुए उसका निदान ढूंढने का प्रयत्न करें और समाधान निकालें। विवेकशीलता के साथ संघर्ष कर विपत्तियों से बाहर निकला जा सकता है। हतोत्साहित न हों, कर्म पथ पर संघर्षरत रहे। परिणाम सुखद होगा।
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                  सुनीता रानी राठौर
              ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या भरोसे के बल पर कर्म सरोकार होता है?

क्या भरोसे के बल पर कर्म सरोकार होता है?
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भरोसा और विश्वास मनुष्य के हृदय में एक अद्भुत शक्ति और ऊर्जा का संचार करता है, एक नई उम्मीद जगती है, आत्मविश्वास पैदा होता है--अपने उम्मीदों पर खरा उतरने हेतु इंसान सतत् प्रयत्नशील रहता है। अपने कर्म को पूर्ण करने का ध्येय रखता है और परिणामस्वरूप उसे शुभ फल की प्राप्ति होती है।
    अगर वह किसी पर भरोसा न करें, उसके मन में कोई उम्मीद न हो, हमेशा नकारात्मक सोच लेकर वह कर्म करें तो सफलता मिलना नामुमकिन है।
     हमें अपने कर्मों पर भरोसा रखना है, हम अच्छा कर्म करते हुए लगातार मेहनत कर रहे हैं तब थोड़ी देर से ही सही पर एक दिन सफलता जरूर हासिल होगी और इसी भरोसा के आधार पर हम निरंतर प्रयत्नशील रहते हुए कामयाबी को प्राप्त करते हैं। ऊंचाइयों तक पहुंचने का प्रयत्न करते हैं।
    इसलिए जब भी हम हतोत्साहित होते हैं बड़े बुजुर्ग भी हमें सलाह देते हैं-- भरोसा रखो सब कुछ ठीक होगा। ईश्वर पर भरोसा --अपने कर्म पर भरोसा-- अपने आसपास रहने वाले लोगों पर भरोसा --सभी का सम्मिश्रित रूप हमें सफलता के पायदान तक पहुंचाने में मददगार साबित होता है। इसलिए निःसंदेह कहा जा सकता है कि भरोसे के बल पर कर्म सरोकार होता है।
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                    सुनीता रानी राठौर 
                ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

सच्चे मित्र की पहचान कब और कैसे होती है?

सच्चे मित्र की पहचान कब और कैसे होती है?
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मित्रता का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका और योगदान होता है। मित्र की संगति का मनुष्य पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। इसलिए मित्रता भी सोच-समझकर और अच्छे संस्कार वाले व्यक्ति से करने का प्रयास होना चाहिए। सच्चा मित्र सुख -दुख का साथी होता है और सदैव हमें गलत काम करने से रोकता है।
सच्चे मित्र की पहचान मुसीबत और विपत्ति के समय होती है। बुरे समय में अगर वह साथ दे आपका साथ छोड़कर दूर न जाए, हितैषी बनकर हर पल सहयोग करे,आप को प्रोत्साहित करे, आप की कमियों की ओर इंगित करके उसे सुधारने का भी प्रयास करें-- वही सच्चा मित्र कहलाने के योग्य होता है।
सच्चा मित्र कभी नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करता।आपके व्यक्तिगत या गोपनीय बातें दूसरे लोगों से शेयर नहीं करता। उसमें कोई बनावटीपन भी नहीं होता। अगर वह आपको दिल से दोस्त मानता है तो वह कभी प्रतिद्वंदी की तरह व्यवहार नहीं करेगा। आपके दुख में वह दुखी और सुख में आनंदित महसूस करेगा। ऐसे मौके पर ही हम अपने दोस्तों की पहचान कर पाते हैं।
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                      सुनीता रानी राठौर
                   ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

सरकारी विभाग में जीवित को मृत दिखाना क्या अपराधी घोषित नहीं होना चाहिए?

सरकारी विभाग में जीवित को मृत दिखाना क्या अपराधी घोषित नहीं होना चाहिए?
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सरकारी विभाग में कहीं-कहीं जो गोरखधंधा  हो रहा है --जीवित व्यक्ति को मृत साबित कर उसका प्रमाण पत्र बना देना ताकि उन्हें जो सुविधाएं सरकार द्वारा दी जा रही थी वह न देना पड़े --यह अक्षम्य अपराध है।
 अधिकारी फर्जी हस्ताक्षर करके प्रमाण पत्र बना रहे हैं। जीवित व्यक्ति को मृत बताकर झूठा प्रमाण पत्र बनाकर उसके जमीन को बेचने का मामला खुलकर सामने आ रहा है।
राजधानी दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल का लाइसेंस शुक्रवार को दिल्ली सरकार ने इसलिए रद्द किया क्योंकि कुछ दिन पहले डिलीवरी के दौरान पैदा हुए जीवित बच्चे को मृत बता दिया गया था।अस्पताल को सामान्य तौर पर दोषी मानते हुए यह कार्रवाई सटीक जान पड़ती है।
   व्यक्ति की प्रतिष्ठा समाज में उसके लिए बहुमूल्य संपत्ति है जो अक्सर उसे भौतिक संपदा प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। अगर उसके प्रतिष्ठा के खिलाफ कोई भी काम होता है तो वह कानूनी मानहानि का दावा कर सकता है।
    जीवित व्यक्ति को मृत साबित करना एक अपराध है ऐसे व्यक्ति या संस्था पर सख्त से सख्त कार्रवाई करते हुए उन्हें सजा देने का प्रावधान होना चाहिए। विशेषकर सरकारी अधिकारी जो सच्चाई को जानबूझकर दबाने की कोशिश करते हैं उनके खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिेए, उन्हें अपराधी घोषित करना चाहिए।
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                          सुनीता रानी राठौर 
                      ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या जिंदगी हर कदम एक नया फैसला है?

क्या जिंदगी हर कदम एक नया फैसला है?
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जिंदगी हर कदम एक नई जंग है एक नया फैसला है। हर पल, हर घड़ी संघर्ष करते हुए गुजारते हैं। अपने विचार अपने सिद्धांत भी परिस्थितियों के अनुसार कभी-कभी बदलने पड़ जाते हैं।
जिंदगी सिर्फ अपनी नहीं होती। परिवार, रिश्तेदार जो भी हमसे जुड़े हैं, सभी का व्यक्तिगत जीवन हमारे व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करता है। समयानुसार जैसी परिस्थिति होती है उसके अनुसार निर्णय लेने पड़ते हैं। सुख-दुख मिश्रित जीवन हमें बहुत कुछ सिखा देता है। समय और हालात कभी-कभी स्वयं के सोच और निर्णय को बदलने के लिए मजबूर कर देता है।
   परिस्थितियों के समक्ष इंसान मजबूर हो जाता है। कभी प्रकृति के समक्ष विवशता झलकती है कभी पारिवारिक स्थितियों के समक्ष।
    इसलिए यह कह पाना कि आत्मविश्वास और धैर्य बनाए रखें हम अपने फैसले पर कायम रहेंगे कभी-कभी नामुमकिन साबित हो जाता है। जिंदगी में हर कदम जंग यानी नई-नई परेशानियों से मुकाबला करना पड़ता है और परिस्थिति अनुसार नए फैसले लेने पड़ते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जिंदगी हर कदम एक नया फैसला है।
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               सुनीता रानी राठौर 
               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या अज्ञानता का परिचायक घमंड है?

क्या अज्ञानता का परिचायक घमंड है?
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ज्ञान का अभिमान होना निश्चित तौर पर घमंड  कहलाता है। ज्ञान का अभिमान सबसे बड़ी अज्ञानता है। लोगों में महाज्ञानी  होने का घमंड छा जाता है। उस अभिमान में वह दूसरे को नीचा दिखाने लगता है। 
    मजाक उड़ाना, दूसरे को छोटा समझना उकी आदत बन जाती है। अपने को बड़ा समझने में उन्हें मानसिक शांति महसूस होती है, उनका मन प्रफुल्लित होता है-- यही ज्ञान का अभिमान है।
     हर समय किसी का हीन भावना से मजाक उड़ाना, उसके व्यक्तिगत आचरण पर चोट पहुंचाना --यह भी इंसान के घमंड को ही दर्शाता है और यह घमंड अज्ञानता का ही परिचायक है।
     कोई भी मनुष्य पूर्ण ज्ञानी नहीं होता। बचपन से बुढ़ापे तक कुछ न कुछ सीखते ही रहता है। अपने अहम भाव में  किसी की बेइज्जती करना,बात बात पर अपमानित करना यह उसके अहंकार को प्रदर्शित करता है। अगर आप ज्ञानी हैं तो दूसरों का भी सम्मान करना सीखें। अहंकार का विनाश निश्चित रूप से कभी न कभी होता है। ज्ञान का अभिमान सबसे बड़ी अज्ञानता है और अज्ञानता का परिचायक घमंड है।
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               सुनीता रानी राठौर
            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या विदेश से आने वाले चुनावी चंदे पर रोक लगनी चाहिए?

क्या  विदेश से आने वाले चुनावी चंदे पर रोक लगनी चाहिए?
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जनप्रतिनिधित्व कानून जिसमें चुनाव के बारे में नियम बनाए गए हैं राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने पर रोक लगाता है।राजनीति में काले धन को कम या पूरी तरह से कैसे खत्म किया जाए इस पर ठोस कार्रवाई की अपेक्षा है। लोकतंत्र की एक बड़ी विसंगति उस धन को लेकर है जो चुपचाप बिना किसी लिखा- पढ़ी के दलों के नेताओं को पहुंचाया जाता है और उस काले धन से देश के बड़े आयोजन चलते हैं -राजनीतिक रैलियां, सभाएं, चुनाव प्रचार होता है।
 यह चंदे का मामला 1976 से शुरू हुआ। पहले विदेशी चंदा लेने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी पर 2010 में इस कानून में संशोधन कर इस रोक को खत्म कर दिया गया। आज चुनाव में होने वाले खर्च लोकतंत्र की एक बड़ी समस्या बन गई है। राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाकर ही समस्या का समाधान हो सकता है। किसी भी कीमत पर चुनाव जितना आज राजनीतिक पार्टी का ध्येय बनता जा रहा है।
 कंपनियों के लिए राजनीतिक चंदा दे सकने की भी एक कानूनी सीमा तय है। राजनीति करने वाले सामाजिक उत्थान के लिए काम नहीं करते सिर्फ वोट की राजनीति करते है। राजनीतिक चंदे के नाम पर लोकतंत्र को दूषित करने की कोशिशों पर विराम लगाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता से मुद्दा गरमाया है अब इस लोकतंत्र को मजबूत बनने का एक रास्ता भी दिखाई दे रहा है। कोर्ट ने आदेश जारी किया है कि ऐसे सभी दल जिनको चुनावी बांड के जरिए चंदा मिला है वे सील कवर में चुनाव आयोग को ब्यौरा देंगे ।चुनावी बांड राजनीतिक दान के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बड़ा कदम है।
इस दिशा में सख्त और ठोस कदम उठाने की अति आवश्यकता है।
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                             सुनीता रानी राठौर 
                    ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

क्या गरीब का बच्चा सबको चोर लगता है ?

क्या गरीब का बच्चा सबको चोर लगता है ?
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इंसान की फितरत और मानसिकता ऐसी बन गई है कि वह इंसान की पोशाक उनकी रहन-सहन को देखकर अपना एक दृष्टिकोण बना लेता है। यह हकीकत है कि अमीरजादे कुछ भी करें उन्हें सभ्य नजर से आदर की दृष्टि से लोग देखते हैं जबकि गरीब के बच्चे की छोटी सी हरकत में भी अधिकांश लोगों को  बुराई नजर आती है। अमीरों की सोच ऐसी है कि वह दो पल में गरीबों पर चोरी का इल्जाम लगा देते हैं और साबित करने पर भी तुल जाते हैं जबकि ऐसी बात नहीं है हकीकत में गरीब अमीरों से ज्यादा ईमानदार और वफादार होते हैं। ईश्वर से डरते हैं, हर कदम सोच-समझकर रखते हुए कार्य करते हैं। 
हां, कभी-कभी ऐसी हालात उत्पन्न हो जाती है कि पेट की खातिर उनसे गलतियां हो जाती है पर उनकी इस हरकत से ऐसा कह देना कि गरीब चोर होते हैं यह नाइंसाफी है।
करोड़ों का घोटाला करने वाले अमीर लोग पाक साफ और इज्जतदार कहलाते हैं। अपनी हजार गलतियों को छुपा कर गरीबों पर इल्जाम लगाते हैं।
गरीब के बच्चे चोर होते हैं यह कहना बेबुनियाद और अमानवीयता का परिचायक है। मैंने अपने जीवन में जितना अधिक अमीरों को घोटाला करते, रिश्वत लेते हुए सुना है उसके अपेक्षा गरीबों को बहुत ही ईमानदारी से काम करते हुए देखा है।
       मेरा मानना है कि अमीर शौकिया लालच और स्वार्थ में घोटाले करते हैं जबकि गरीब मजबूरी में गलत काम करते हैं। इसलिए यह कहना कि गरीबों के बच्चे चोर होते हैं बिल्कुल सही नहीं है।
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                          सुनीता रानी राठौर 
                          ग्रेटर नोएडा ( उत्तर प्रदेश)

क्या सांसारिक सुखों का परिणाम है दुःख?

क्या सांसारिक सुखों का परिणाम है दुःख?
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सांसारिक सुख प्राप्त करने की लालसा में ही हम हमेशा नई-नई उम्मीद दिल में पालकर नई-नई चीजों को पाने की तमन्ना ह्रदय में संजो लेते हैं। भोग-विलास की वस्तुओं को प्राप्त करने हेतु लालायित रहते हैं और जब वह पूर्ण नहीं होता तब हम दुखी और निराश रहने लगते हैं।
   धन-दौलत के नाम पर अपने सगे संबंधियों से भी आत्मीयता खत्म हो जाती है और सुख के चाहत में हम आत्मिक दुख से ग्रस्त हो जाते हैं।
   ज्यादा धन कमाने की लालसा,सुख-सुविधा संपन्न व्यक्ति बनने की लालसा, आधुनिकता के होड़ में बाह्यप्रदर्शन, भोग-विलास की वस्तुएं प्राप्त करने की चाहत और अगर इच्छानुसार नहीं मिला तो मन का अशांत होना हमारी सुखी जीवन को अशांत और दुखी बना देता है।
   अतः नि:संदेह हम कह सकते हैं कि सांसारिक सुखों का परिणाम ही दुःख है। जब हम माया नगरी से निकलकर अपने मन की भावनाओं पर नियंत्रण कर लेते हैं, सांसारिक सुख भोग-विलास की वस्तुओं से निर्लिप्त हो जाते हैं तब हमारा मन आत्मिक सुख को प्राप्त करता है। सांसारिक माया मोह सुख की चाहत हीं दुःख का मूल कारण है।
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                     सुनीता रानी राठौर
                      ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)