Tuesday, 30 June 2020

*मुफ्त वितरण*

क्या भारत तकनीकी दृष्टि से चीन से आगे निकल जाएगा?

भारत तकनीकी दृष्टि से चीन से आगे निकल सकता है बशर्ते सरकार एक अच्छी सोच और दूरगामी नीतियों के साथ इस ओर बढ़े और यहां की जनता भी जागरूकता के साथ विकास को मूल मुद्दा बनाएं।
    हमारे यहां वादें ज्यादा की जाती हैं पर काम कम। हल्की एवं थोड़ी देर आंधी तूफान आने पर 5-6 घंटे बिजली बाधित हो जाना साबित करता है कि यहां जनता के मूल मुद्दों से सरकारी तंत्र को कोई सरोकार नहीं है। जमीनी स्तर पर तकनीकी विकास बहुत कम है।
    सन् 1990 तक भारत और चीन तकनीकी रूप से एक धरातल पर खड़े थे पर 30 वर्षों में चीन ने विकास की गति में उड़ान भरी और भारत कछुए की चाल में आगे बढ़ता रहा। दोनों की अर्थव्यवस्था में विशाल फासला हो चुका है फिर भी हम नाउम्मीदी के साथ नहीं जी सकते।
    हमारी सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश को प्राथमिकता देने की जरूरत है। विकास अपने आप होगा। भारतीय बुद्धिजीवी और वैज्ञानिकों को उचित संसाधन मुहैया कराकर नवीनतम तकनीक एवं उपकरणों के माध्यम से प्रगति के रास्ते पर अग्रसर हो सकते हैं। आधुनिकतम तकनीक, स्वचालित मशीनों और साथ ही विकसित देशों से प्राप्त अनुभव और अध्ययन भारत को विकास की दिशा में ले जाने में सहायक हो सकता है।
    चीन का क्षेत्रफल भारत से 3 गुना अधिक है। इसके बावजूद चीन अपने देश के प्रत्येक गांव और नगर को रोड से जोड़ने में सफल हुआ। उनके रेलवे स्टेशन किसी आधुनिक एयरपोर्ट से कम नहीं। वहां तेज गति से चलने वाली रेलें यात्रा में रोमांस तो भरती ही हैं साथ ही कम समय में ज्यादा दूरी भी तय करती हैं। हम तकनीक में तो पीछे हैं हीं, अपनी कोशिशों में भी पीछे दिखाई देते हैं।
  हमें अपनी इन्हीं खामियों और कमजोरियों पर ध्यान देने की जरूरत है। हमारे देश में चुनाव प्रचार, बेवजह के प्रदर्शन और फालतू कार्यों पर पैसों की बर्बादी बहुत ज्यादा होती है। अगर जनता के टैक्स का सही इस्तेमाल हो , प्रतिभाओं का सदुपयोग हो, राजनेता और अधिकारीगण अपनी जिम्मेदारी इमानदारी पूर्वक निभाएं, सही दिशा में गंभीरता पूर्वक विकास कार्य हो तो निश्चित रूप से हमारा भारत तकनीकी दृष्टि से चीन से आगे निकल जाएगा।
                               सुनीता रानी राठौर
                      ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Friday, 26 June 2020

क्या कोरोना की वजह से बढ़ गई है निजी वाहनों की मांग?

कोविड-19 संक्रमण को लेकर जनता काफी सजग है। सार्वजनिक वाहनों में सफर करने पर वायरस संक्रमण का डर बना रहता है। बस और मेट्रो में सफर करना जोखिम भरा है जिसकी वजह से निजी वाहनों की मांग बढ़ रही है।
       कोरोना से जंग और सुरक्षित सफर के लिए साइकिल भी उम्दा सवारी बनती जा रही है। साइकिल आम आदमी की सेहत और जेब के लिए कारगर साबित होता है। यही कारण है कि यूके जैसे बड़े देश में साइकिल की मांग 200 फ़ीसदी तक बढ़ गई है।
 उच्च वर्ग के लोग पहले भी निजी वाहनों को तवज्जो देते थे। मध्यम व निम्न वर्ग के लोग अपनी जेब का ख्याल रखते हुए सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल करते थे परंतु वर्तमान में बढ़ते संक्रमण को देखकर कमजोर तबके के लोग भी सस्ते पर गुणवत्ता वाले वाहनों को खरीद कर उसका किफायती इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं। इसलिए कम रेट वाली कारों की बिक्री भी ज्यादा बढ़ने लगी है।
     आर्थिक गतिविधियों के नरम रहने और लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित होने से लोग निजी परिवहन के लिए छोटी या कम कीमत वाली कार या दूसरी वाहन खरीदना पसंद करेंगे और ग्राहकों की संख्या भी बढ़ेगी।
     नि:संदेह दो गज की दूरी के निर्देश का पालन और संक्रमित होने के डर से लोग सार्वजनिक वाहनों की जगह निजी वाहनों को ज्यादा अहमियत और वरियता दे रहे हैं। इसी वजह से निजी वाहनों की मांग भी बढ़ रही है।
--------------------------सुनीता रानी राठौर
                        ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 25 June 2020

सुशांत सिंह राजपूत की मौत हत्या है या आत्महत्या?


युवा अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत हत्या है या आत्महत्या। निष्पक्ष जांच के बिना कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। 
  यह भी हकीकत है कि एक उभरता सितारा अचानक मौत को गले लगा ले तो हर व्यक्ति उसकी आत्महत्या को शक के नजर से ही देखता है। उनके परिजनों के द्वारा भी आशंका जताई जा रही है कि उनकी हत्या हुई है। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत लटकने से दम घुटने के कारण बताया जा रहा है। फिर भी संदेह के निराकरण हेतु सुशांत का विसरा रासायनिक विश्लेषण के लिए भेजा गया है। फॉरेंसिक साइंस सर्विसेज के निदेशक को जल्द रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है।
    मानसिक यातना के कारण की गई आत्महत्या को भी मानवीय आधार पर हत्या की संज्ञा दी जाती है। इसी के मद्देनजर बिहार के कई नेता और पूर्व राज्यपाल ने भी सीबीआई जांच कराने की मांग की है। फिल्मी हस्तियों के द्वारा भी यह बात सामने आ रही है कि फिल्मी दुनिया के बहुजाल नेपोटिज्म की वजह से कुछ महीनों से वे डिप्रेशन के शिकार थे शायद इस वजह से उन्होंने ऐसा कदम उठाया। फिल्म जगत के गुटबंदी के खिलाफ चहूंओर जनाक्रोश है। पुलिस भी जांच कर रही है कि कहीं सुशांत बॉलीवुड के खेमेबाजी के शिकार तो नहीं बन गए।
    सात फिल्में मिली थी जिसमें एन-केन-प्रकारेण उनसे छह छीन ली गई थी। यशराज फिल्मस से सुशांत के साथ हुए कांट्रेक्ट की कॉपी भी मांगी गई है। उन सभी परिस्थितियों की जांच की जा रही है जिनके कारण युवा अभिनेता को आत्महत्या करनी पड़ी। 
 यदि उपर्युक्त तथ्य सही साबित होते हैं तब नि: संदेह उनकी आत्महत्या  हत्या मानी जायेगी। 
 मानसिक यातना देने वाला भी गुनाहगार होता है और उसे सजा भी मिलनी चाहिए। हम सभी न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। 
                  सुनीता रानी राठौर 
                     ग्रेटर नोएडा  (उत्तर प्रदेश)

नेपोटिज्म या भाई-भतीजावाद

Thursday, 18 June 2020

क्या चीन के नापाक इरादों का जवाब देने का वक्त आ गया है?

लद्दाख के गलवान वैली में जिस तरह चीनी सैनिकों की धूर्तता के कारण मुठभेड़ में हमारे 20 जवान शहीद हो गए वह कोई मामूली झड़प नहीं थी, बल्कि एक हमला था। हमारी सरकार को चाहिए कि कड़ा एक्शन ले और कठोर से कठोर कदम उठाए ताकि छोटा से छोटा नेपाल देश हो या चीन जैसा शक्तिशाली देश अपनी नापाक हरकतों से बाज आए।
   भारतीय सैनिक को भी स्वतंत्र प्रभार से कार्य करने की अनुमति मिलनी चाहिए ताकि तुरंत दुश्मन को जवाब दे सकें। जो सैनिक शहीद हुए हैं उनकी शहादत का बदला लिया जाए और दुश्मन देश के मन में यह डर बैठे कि हिंदुस्तान की तरफ आंख उठाकर भी न देख सके।
    वर्तमान समय में कोरोना वायरस से दोनों देश त्रस्त हैं। अभी दोनों देशों को अपने नागरिकों के हित का भी ध्यान रखना सर्वोपरि है। ऐसा भी मैसेज न जाए कि दोनों देशों की सरकारें जनता के ध्यान को भटकाने के लिए नए मामले को तूल दे रही है। 
    अगर बातचीत से समस्या का समाधान न हो तो कड़े कदम उठाने की अति आवश्यकता है। चीन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाकर दबाव डाला जाए कि अपने हरकतों से बाज आए। युद्ध समस्या का निवारण नहीं होता। दोनों देशों की जान माल की हानि होती है। आर्थिक स्थिति भी बदहाल हो जाती है। अभी वर्तमान में यूं ही स्थितियां ठीक नहीं है। कोई नहीं चाहेगा कि युद्ध जैसे हालात से त्राहि-त्राहि मचे। अन्य दूसरे मार्गो को बंद कर, 
 उनके साथ साझा व्यापार-संबंधों को बंद कर, चीन को पहले से दिए गए ठेका को रद्द कर, उनके सामानों को बायकॉट कर तथा अंतरराष्ट्रीय दबाव डलवाकर हम अपने तरफ से कड़ी चेतावनी दे सकते हैं। अगर अंतत: लातों का भूत बातों से नहीं मानता तब अंतिम फैसला सैनिक कार्रवाई होनी चाहिए। सरकार को जनता का भी पूर्ण समर्थन मिलेगा।
                        सुनीता रानी राठौर
                         ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Wednesday, 17 June 2020

क्या स्कूल से ही निकलेगा भारत आत्मनिर्भर का रास्ता?--

हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का जो फैसला लिया है उसके लिए आत्मबल व दृढ़ संकल्पता की अति आवश्यकता है और यह क्षमता पूर्ण रूप से युवा पीढ़ी  में देखने को मिलती है। छात्र अपने देश के भावी कर्णधार होते हैं। वे जोश और बुद्धि बल से परिपूर्ण होते हैं। अगर उन्हें सरकार के तरफ से आर्थिक प्रोत्साहन मिले तो वह निश्चित ही अपने देश को नई दिशा प्रदान कर सकते हैं।
     यह भी हकीकत है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में व्यावहारिक ज्ञान की कमियां पाई जाती हैं। फिर भी यह सत्य है कि छात्र चाहे तो भारत को आत्मनिर्भर बना सकते हैं। 
     एक उदाहरण प्रस्तुत कर रही हूॅं जिसका जिक्र मोदी जी ने 'मन की बात' में भी किया था। बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के भैरोगंज हेल्थ सेंटर की कहानी। जहां "संकल्प Ninety Five" के नाम से स्वास्थ्य केंद्र खोला गया। जहां मुफ्त में हेल्थ चेकअप शुरू किया गया और हजारों की भीड़ जुटी। यह महान कार्य वहां के हाई स्कूल के 1995 Batch के छात्रों द्वारा चलाया गया अभियान था। छात्रों ने एक Alumni Meet  रखी और कुछ अलग करने को सोचा। जिम्मा उठाया Public Health Awareness का । उनके इस मुहिम में बेतिया के सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल जुड़ गए और निशुल्क जांच, निशुल्क दवा जन स्वास्थ्य को लेकर एक अभियान चल पड़ा और यह संकल्प एक मिसाल बनकर सामने आया।
    इसी तरह दूसरा उदाहरण बिहार के वैशाली जिले के युवक का है जो सेना में जाने के उद्देश्य से हिमाचल प्रदेश के सैनिक स्कूल में पढ़ाई किया। जब गांव लौटा तब अपना विचार बदल कर लगभग 100 एकड़ में खेती -बाड़ी का काम 150 लोगों को साथ लेकर शुरू किया और आज 40 लाख सालाना टर्नओवर की मुकाम पर पहुंचा है और अब अपने साथ बेरोजगार हो गए लोगों को साथ जोड़ कर रोजगार देने का कार्य कर रहा है।
    ऐसे कई उदाहरण हैं जो हमारे स्कूली छात्रों ने बुद्धि बल से  कार्य को शीर्ष तक पहुंचाया है। गांधी जी ने भी अपनी उम्र में भारतीय उत्पादों को प्रोत्साहित कर आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता दिखाया था।   
    विवेकानंद जी ने भी कहा है --युवा वह है जो 
Energy  और dynamism से भरा है। वह हर असंभव को संभव करने की क्षमता रखता है।
    इसलिए हम नि:संदेह कह सकते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने जो सपना देखा है भारत को आत्मनिर्भर बनाने का, उसका रास्ता स्कूल से ही निकलेगा। सरकार को दो कदम आगे चलते हुए युवाओं को प्रोत्साहित कर उनके मनोबल को ऊंचा करने की जरूरत है।
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                         सुनीता रानी राठौर
                          ग्रेटर नोएडा  (उत्तर प्रदेश)

श्रद्धांजलि वीर जवानों को

Saturday, 13 June 2020

क्या इम्यूनिटी बढ़ने से हारेगा कोरोना?

जी हां, डॉक्टरों के अनुसार बीमारियों से बचे रहने में इम्यूनिटी अहम रोल अदा करती है। कोरोना के मामले में भी यही देखा जा रहा है। कोरोना कम इम्यूनिटी वाले व्यक्ति को ज्यादा क्षति पहुंचा रहा है।
बूढ़े और कमजोर लोगों को यह वायरस ज्यादा अपने चपेट में ले रहा है। जिनकी प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा मजबूत होती है वे लोग इस संक्रमण से लड़ पाने में सक्षम हो रहे हैं और उनके ठीक होने की संभावना बढ़ रही है।
अभी तक इस बीमारी का कोई वैक्सीन नहीं बना है जिससे इलाज हो सके। इसलिए जरूरी है कि हम अपने शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाएं ताकि कोरोना से जंग जीत सकें।
     यह संक्रमित बीमारी फेफड़ों पर धावा बोलती है इसलिए फेफड़ों का मजबूत होना अति आवश्यक है। अपने शरीर की इम्यूनिटी को बढ़ाने हेतु कुछ महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान देने की जरूरत है। जैसे --नियमित व्यायाम द्वारा अच्छे स्वास्थ्य, उच्च रक्तचाप और वजन को नियंत्रित करने से इम्यूनिटी को बढ़ावा मिलेगा।
  तनाव कम लें ताकि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर बुरा असर न पड़े। तनाव से श्वसन संबंधी बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है।
   अच्छी नींद लें। शराब का सेवन न करें। शराब के सेवन से प्रतिरक्षा प्रणाली प्रभावित होती है।
    उचित आहार लें। इम्यूनिटी बढ़ाने वाले आहार में अदरक, खट्टे फल, हल्दी शामिल हैं। खट्टे फलों में विटामिन सी की अच्छी मात्रा पाई जाती है जिसकी वजह से व्यक्ति के शरीर में WBC का उत्पादन बढ़ने के साथ इम्यूनिटी भी बेहतर बनती है। इसी तरह इम्यूनिटी सिस्टम को मजबूत करने हेतु प्रतिदिन 4-5 तुलसी की पत्तियां, 4-5 कली लहसुन खाना भी फायदेमंद है। दूध विटामिन डी का अच्छा स्रोत है। एक गिलास रात में जरूर लें। दही भी इम्यूनिटी को बढ़ाने में सहायक होती है।    
       इन सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का ध्यान रखते हुए हम अपने शरीर के इम्यूनिटी को बढ़ा सकते हैं और कोरोनावायरस के संक्रमण से खुद को बचा सकते हैं और कोरोना को हराकर जंग जीत सकते हैं।
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                                  सुनीता रानी राठौर
                               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 11 June 2020

कोरोना से खुद को बचाते हुए कैसे बढ़ना है आगे

कोरोनावायरस रूपी महामारी से बचने हेतू इस वक्त एक चौथाई दुनिया अपने घरों में कैद है। पर हालात ऐसी है कि हमें खुद का बचाव भी करना है और अहम कार्यों को भी जारी रखना है। ऐसी स्थिति में मानसिक तौर पर महामारी और वर्तमान हालात को समझते हुए सरकार द्वारा दी गई गाइडलाइन का पालन करते हुए हम सभी को आगे बढ़ना है।
  कोरोना से बचाव के लिए अपने परिजनों, रिश्तेदारों और मित्रों को जीवनशैली से जुड़ी सावधानियों के बारे में बताएं। कोरोना से जुड़ी आपातकालीन स्थिति की योजना बनाकर रखें। कुछ समय तक बीमार लोगों से मिलने से परहेज करें। यदि खुद बीमार हैं तो एक सप्ताह कोरेंटाइन में रहें।
    अपनी दिनचर्या को व्यावहारिक तरीके से प्लान करें। दूसरे लोगों को भी समझने की कोशिश करें। अपने शरीर का ध्यान रखते हुए नियमित व्यायाम और खान-पान का ध्यान रखें। वॉक पर जाएं। रनिंग करें। ताजी हवा आपके Blood circulation को बरकरार रखने में मदद करेगा। लोगों से बात करें और फैक्ट्स को समझें। किसी प्रोफेशनल से बात करें। मन हल्का रहेगा। खबरों और सोशल मीडिया से ब्रेक लेकर मेडिटेशन भी करें। 
   मानसिक स्वास्थ्य को तंदुरुस्त बनाते हुए सकारात्मक सोच के साथ लोगों को जागरूक करते हुए जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करें ।
    नि:संदेह आप खुद को सुखी और चिंता मुक्त महसूस करेंगे। हमारे डॉक्टर्स, हेल्थ एक्सपर्ट हमारी सरकारें ,अन्य अधिकारी  और साथ ही सोशल वर्कर्स जो दिन-रात इस महामारी से निपटने में लगे हैं उनका धन्यवाद भी अदा करें और आगे बढ़ने का प्रयास करें। वर्तमान पर फोकस करें और यह याद रखें कि यह समय चिरस्थाई नहीं है।
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                       सुनीता रानी राठौर
                      ग्रेटर नोएडा  (उत्तर प्रदेश)

Wednesday, 10 June 2020

क्या वर्क फ्रॉम होम से प्रभावित हो रही है आंखें?

कोरोनावायरस के फैलते प्रकोप और लॉकडाउन की वजह से कई कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी ताकि 'कॉम्यूनिटी ट्रांसमिशन' को रोका जा सके। जहां सुविधाओं से कुछ फायदे होते हैं वहीं कुछ नुकसान भी। जो सहूलियतें ऑफिस में मिलती हैं वह हर व्यक्ति के घर में मौजूद नहीं होतीं। जैसे--समुचित लाइट की व्यवस्था न होना, बैठने का सटीक जगह न होना, बेढंगे तरीके से बैठकर काम करना, 8 घंटे की जगह 10 घंटे काम करना आदि समस्याओं का दुष्प्रभाव नि:संदेह आंखों को प्रभावित कर रहा है।
      समयानुसार चीजें काफी बदली हैं। काम को वक्त पर पूरा करने का मानसिक दबाव भी रहता है। घर से काम करने का निश्चित टाइम नहीं होता। कई घंटा एक्स्ट्रा भी काम करना पड़ता है। रात 1या 2 बजे तक ग्रुप डिस्कशन चलता रहता है। लैपटॉप के स्क्रीन पर आंखें जमी रहती है जब तक काम पूर्ण न हो जाए।
    युवा हो स्कूली बच्चे ऑनलाइन कार्य करने की वजह से ज्यादातर समय स्क्रीन पर आंखें गड़ाए रहने से आंखों का लाल होना, आंखों में सूजन होना, आंखों में पानी आना जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। वर्क फ्रॉम होम में 8-10 घंटे लैपटॉप पर कार्य करना , घर पर होने के कारण टीवी देखना, मोबाइल पर भी बेब सीरीज देखते रहना  किसी ना किसी रूप में स्क्रीन पर आंखें गड़ाए रहना, आंखों के लिए अहितकारी साबित हो रहा है। 
    आंख हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण एवं बहुमूल्य अंग है। वर्क फ्रॉम होम करने वाले युवाओं को अपनी आंखों को सुरक्षित रखने हेतु चाहिए कि बीच-बीच में बाहर खुली हवा में थोड़ी देर घूमकर पलकों को झपकाएं,  ठंडे पानी से आंखों को धोएं, इससे आंखों में जलन होने से बचाया जा सकता है। सोते वक्त आंखों पर गुलाब जल की रूई की पट्टी भिगोकर रखें या खीरा का स्लाइस काट कर रखें। इससे आंखें आपकी स्वस्थ रहेंगीं।
    नि:संदेह वर्क फ्रॉम होम में उचित सुविधाएं उपलब्ध ना होने के कारण आंखें प्रभावित हो रही हैं पर सावधानियां बरतते हुए अपनी आंखों को स्वस्थ रख सकते हैं। आंख है तो जहान है। इस बात को हमेशा ध्यान में रखें।
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                           सुनीता रानी राठौर
                            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Sunday, 7 June 2020

क्या अब हर चेहरे पर आवश्यक हो जाना चाहिए मास्क?

हमारा देश संक्रमितों की संख्या में विश्व में पांचवें नंबर पर पहुंच चुका है। जिस तीव्र गति से कोरोना संक्रमितों की संख्या का पता चल रहा है उससे मन में भय पैदा होता है और  सामने वाला हर व्यक्ति संदिग्ध महसूस होने लगता है। खुद का भी पता नहीं कि हम संक्रमित हैं या नहीं।  
‌इसलिए एहतियातन अपने और दूसरों की सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए सभी को बाहर निकलते समय मास्क पहनना अनिवार्य होना चाहिए।
‌ WHO के अनुसार कोविड-19 संक्रमित व्यक्ति के मुंह से निकले पानी के छींटे से निकलकर 5-6 मीटर की दूरी तक दूसरे लोगों के पास तक पहुंच सकता है। यह वायरस नाक-मुंह के जरिए ही बाहर आने वाली बूंदों से फैलता है। नाक-मुंह के जरिए ही शरीर के अंदर पहुंचता है। 
    अतः जरूरी है कि इस वायरस से बचाव हेतु मास्क जरूर पहनें। पर यह भी ध्यान रखें कि मास्क अच्छी क्वालिटी का हो। पहनते व निकालते समय हाथ भी साफ रखें। इन्हें थोड़े-थोड़े समय पर बदलने का प्रयास करें। ठीक से डिस्पोज करें। पर इस गलतफहमीं में भी न रहें कि मास्क पहनने पर हम वायरस के शिकार नहीं होंगे। यह संक्रमित होने की संभावना को सिर्फ कम करता है।
   खतरा कम हो इसलिए आवश्यक है कि हर चेहरे पर मास्क हो। हमें किसी को कहने की जरूरत न पड़े। एक दूसरे से किसी को खतरा न हो। मास्क का प्रयोग करते हुए सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करते हुए एक दूसरे से कम से कम 2 मीटर की दूरी बनाए रखें, तभी हम इस भयानक वायरस से खुद को और अपने परिवार को बचा कर रख सकते हैं। 
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                                  सुनीता रानी राठौर 
                            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Saturday, 6 June 2020

क्या गांव की ओर चल पड़े हैं भारतीय उद्योग?--

वर्तमान हालात में महानगरों से जिस तरह से कामगारों का उल्टी दिशा में पलायन हुआ, वह स्थिति बहुत ही चिंताजनक है। अगर इस स्थिति से बाहर निकालने हेतु सरकार गांव की ओर भारतीय उद्योगों को मोड़ने का प्रयास करती है तो ग्रामीण युवाओं के लिए एक आशा की किरण साबित होगी। इसी के मद्देनजर सरकार ने भी आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत आने वाली योजनाओं को जारी रखने का फैसला लिया है। वैसे कल की घोषणा के अनुसार 1 साल तक कोई नई परियोजनाएं नहीं शुरू की जाएगी गरीबों की मदद योजना और आत्मनिर्भर भारत अभियान को छोड़कर।
     हां, निजी तौर पर उद्योगपति भी अपना कदम गांव की ओर बढ़ा सकते हैं पर वे भी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। अगर भारतीय उद्योग गांव की ओर कदम बढ़ाती है तो यह सुनहरा क्रांतिकारी प्रयास होगा। ग्रामीण ऊर्जावान पढ़े-लिखे युवाओं को अपने कृषि उद्योग के साथ-साथ रोजगार प्राप्त होगा। गंभीर पलायन की समस्या का समाधान होगा। 
    सरकार उद्योगों के लिए जरूरी सरकारी और सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करती है तो गांव वालों के लिए लाभदायक व मददगार साबित होगा। ग्रामीण युवाओं को रोजगार भी मिलेगा और वे परिवार के साथ भी रह पाएंगे। 
भारत के गांव और वहां रहने वाले किसानों की स्थिति ज्यादातर अच्छी नहीं है। उन्हें भूमिहीन बनाने के भी कई तरह के प्रयास चल रहे हैं। ग्रामीण बाजार पर कब्जे के कई रोचक दृश्य उपलब्ध हैं। ग्रामीणों का इसमें कितना भला होगा कितना बुरा यह निर्णय कर पाना कठिन है।
     भारत की 70% आबादी गांव में बसती है। अगर गांव में उद्योगों का विस्तार हो तो सोने पर सुहागा होगा। हमारा देश समृद्ध और विकसित बनेगा। लोकल लेवल पर लोगों को रोजगार मिलेगा और पलायन पर अंकुश लगेगा।
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                               सुनीता रानी राठौर
                            ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Friday, 5 June 2020

शुद्ध पर्यावरण पे टिका है जीवन ।पर्यावरण दिवस पर जन संदेश

हाथियों की हत्या की परंपरा कब तक जारी रहेगी?

मेरे विचार से हाथियों की हत्या की परंपरा हमारे देश में नहीं है। ऐसा कोई रीति रिवाज नहीं, जहां उनकी बलि दी जाती हो। हां, कुछ लालची, स्वार्थी तत्व हाथी दांत की स्मगलिंग के लालच में उनकी हत्या करते रहते हैं। वैसे ही केरल की वर्तमान  घटना गर्भवती हथिनी की मौत भी शरारती तत्वों के द्वारा की गई, जो घोर निंदनीय और अक्षम्य अपराध है ।
      हां, ये भी सही है कि मनुष्य अपने फायदे के लिए वन्यजीवों को संकट में डाल रहा है। सरकार द्वारा नए-नए परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु वनों की तीव्रता से कटाई हो रही है। प्राकृतिक जंगलों के सर्वनाश के कारण हाथी और दूसरे वन्यजीव ग्रामीण बस्ती तक भटकते हुए पहुंच जाते हैं, फसलों को बर्बाद करते हैं। इसलिए वन्यजीवों को भगाने हेतु ग्रामीण तरह-तरह का प्रयोग पटाखे फोड़ने, आग जलाने का उपक्रम करते रहते हैं। इसी दरमियान वन्यजीव कभी गलती से ट्रेन से कट जाते हैं, कभी बिजली के खंभों से टकराकर दर्दनाक मौत के शिकार हो जाते हैैं। ऐसे ही उपक्रमों का शिकार केरल में गर्भवती हथिनी भी हो गई जो बहुत ही दुखदाई है, मानवता को शर्मसार करने वाली घटना है।
 देश के तमाम संरक्षित वन क्षेत्रों में हाथी और दूसरे वन्यजीवों को बचाने हेतु परियोजनाओं पर हर साल करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में वन्यजीवों की हादसे में होने वाली दर्दनाक हर मौत ऐसी परियोजना पर एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ती है।
      जब तक मनुष्य लालच में स्वार्थवश अंधा बन कर वनों का नुकसान करता रहेगा, हाथी दांत बेच कर पैसा कमाने का स्वार्थ पालता रहेगा तब तक निर्दोष हाथियों की किसी ना किसी रूप में हत्याएं होती रहेंगी।
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                                  सुनीता रानी राठौर
                              ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Thursday, 4 June 2020

क्या अधिकतर मौत कोरोना से नहीं गंभीर बिमारियों से हो रही है?

हमारे देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या 2 महीने में लगभग 7हजार तक पहुंच चुकी है।  गंभीर बीमारियों से मरने वालों का डाटा उपलब्ध नहीं है।
     नि:संदेह अधिकतर मौत गंभीर बीमारियों से हुई होगी क्योंकि लॉकडाउन के दौरान अस्पतालों में ओपीडी भी बंद कर दिया गया था। प्राइवेट क्लीनिक भी बंद हो चुकी थी। डॉक्टर कोरोना मरीजों के उपचार में व्यस्त होने के कारण में अन्य बीमारी वाले मरीजों को नहीं देख रहे थे। कैंसर और किडनी जैसे भयानक बीमारी वाले मरीज का नियमित इलाज ना मिलने के कारण उन्हें बेसमय मौत के मुंह में जाना पड़ा। यह सब परिस्थितियां गंभीर मरीजों के लिए दुखदाई साबित हुआ।   
      सरकार का फर्ज था कि गंभीर मरीजों के लिए उचित सुविधा उपलब्ध कराती पर आनन-फानन में लॉकडाउन कर उनके तकलीफों को नजरअंदाज कर दिया गया। दूरदराज गांव से जो मरीज दिल्ली एम्स जैसे बड़े बड़े हॉस्पिटल में इलाज कराने आए थे उन पर अचानक कहर बरपा। ना रहने की उचित सुविधा, ना इलाज की सुविधा, ना घर लौटने की सुविधा ऐसी हालात में ऐसे शारीरिक और आर्थिक रूप से परेशान गंभीर मरीजों की हालत कैसी रही होगी, कल्पना कर सकते हैं। 
     इसलिए इसमें कोई शक नहीं कि अधिकतर मौत गंभीर बीमारियों से हुई होगी। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि न्यूज़ चैनल इन गंभीर मुद्दे पर फोकस नहीं करते। जिससे हमारा जिंदगी प्रभावित नहीं होता उसमें टाइम पास करते हैं। अगर गंभीर मसलों पर चर्चा करें तो निःसंदेह सरकार सजग रहेगी और लोगों को भी  उचित सुविधाएं मिलती रहेगी।
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                                  सुनीता रानी राठौर
                               ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Wednesday, 3 June 2020

स्वदेशी उत्पादन में आत्मनिर्भरता का मूल मंत्र क्या है?

आत्मनिर्भरता हमें सुख और संतोष देने के साथ-साथ सशक्त भी करती है। स्वदेशी उत्पादन में आत्मनिर्भरता का मूल मंत्र 5 स्तंभों पर आधारित है-- अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचा, प्रणाली, जीवंत लोकतंत्र और मांग।
 स्वदेशी उत्पादन यानी स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देकर आत्मनिर्भर बना जा सकता है।खादी ग्रामोद्योग के उत्पाद की अच्छी बिक्री को देख कर हम अपना आत्मविश्वास बढ़ा सकते हैं। स्वदेशी उत्पाद से हर हाथ को काम मिलेगा।
    लॉकडाउन के कारण करीब 10 करोड़ प्रवासी कामगार गांव लौट गए हैं। उनका रिवर्स माइग्रेशन हुआ। उनके लिए काम जुटाना चुनौती है। ऐसे दौर में अर्थकेंद्रित स्वदेशी उत्पादों से ज्यादा से ज्यादा रोजगार मुहैया करा सकते हैं।
   जहां स्वदेशी का विकल्प ना हो वहां विदेशी चुने। स्वतंत्रता संग्राम के समय सर्वप्रथम गांधी जी ने विदेशी सामानों का बहिष्कार कर स्वदेशी अपनाकर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा कर देशवासियों का मनोबल ऊंचा उठाया था। नमक बनाना हो या खादी वस्त्र स्वदेशी उत्पाद को प्राथमिकता दिया था। आज गेहूं, चावल तथा अन्य खाद्य पदार्थ से हमारे गोदाम भरे हैं। यह बात संकट की घड़ी में आत्मविश्वास बढ़ाती है। आर्थिक व सैन्य रूप से भी जिस दिन देश आत्मनिर्भर हो जाएगा उस दिन दुनिया भारत का लोहा मानना शुरू कर देगी।
 आज विकट घड़ी में हमारे देश में प्रतिदिन दो लाख पीपी किट और दो लाख N -95 मास्क का निर्माण हो रहा है। हमारे देशवासियों ने इस आपदा को अवसर में बदल कर इस चुनौती को स्वीकार कर आत्मनिर्भर बनने का सफल प्रयास किया है। बाबा रामदेव का पतंजलि ब्रांड हर तरह का स्वदेशी उत्पाद बनाने में अहम योगदान दे रहा है। आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन और स्वदेशी उत्पाद के मूल मंत्र को सरकार द्वारा दिए गए पैकेज से बढ़ावा मिल सकता है। 
    आंकड़े बताते हैं कि 2.5 लाख करोड़ के एक एफएमसीजी बाजार में स्वदेशी की भागीदारी एक चौथाई है। सॉफ्ट ड्रिंक हो या कंप्यूटर हार्डवेयर बाजार 100 फीसदी कब्जा विदेशी कंपनियों का है। आज जो ग्लोबल बने हैं वह भी कभी लोकल ही थे लेकिन उन ब्रांडो को वहां के लोगों का पूरा समर्थन मिला और वे लोकल आत्मविश्वास से लबालब हो ग्लोबल ब्रांड बन गए।
    हमें भी इन तथ्यों को समझते हुए स्वदेशी उत्पाद को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भर बनना है। सरकार भी इसके लिए पूरी ताकत से मुहिम चला रही है। अंतरराष्ट्रीय स्थिति को देखकर समय की मांग भी है कि हम आत्मनिर्भर बने। संकल्प शक्ति के बल पर ही भारत को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
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                               सुनीता रानी राठौर
                           ग्रेटर नोएडा  (उत्तर प्रदेश)

Tuesday, 2 June 2020

क्या लॉकडाउन खुलते ही बंधनों से मुक्ति शुरू?

1 जून से लॉकडाउन -5 कंटेनमेट जोन में लागू हुआ साथ ही अनलॉक -1भी लागू हो गया है जो देश को बंधनों की बेड़ियां से मुक्ति की शुरुआत कही जा रही है। 
     पर ध्यान रहे, सरकार भले ही लॉकडाउन खोल दे, सरकार के नजर में आप की मौत एक संख्या हैं लेकिन आप अपने परिवार के लिए पूरी दुनिया हैं इसलिए अपने जीवन को अनमोल समझ कर सावधान रहें।
       औद्योगिक क्षेत्रों को खोलने के साथ-साथ यातायात के साधनों को चलाने की मंजूरी मिल गई है। 8 जून से शर्तों के साथ होटल, मॉल, रेस्टोरेंट, धार्मिक स्थल भी स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए खुलेंगे। एक तरह से आम जीवन पटरी पर आने लगी है। पर अभी पांच राज्यों में जिस तरह वायरस के प्रकोप से स्थिति नाजुक बनी हुई है वैसे जगहों पर ये बंधनों से मुक्ति का दौड़ कहीं जीवन से मुक्ति न साबित होने लग जाए-- यह डर बरकरार है।
    आवागमन शुरू होने से ही तीव्र गति से वायरस नगरों से गांव तक पहुंचा। अब कहीं सामुदायिक संक्रमण की हालात न बन जाए, यह डर ज्वलंत प्रश्न बनकर खड़ा है। 
    भले ही सरकार अपनी वाहवाही लूटने में लगी हो पर जितनी कम मात्रा में टेस्टिंग हो रही है उससे संक्रमितों की संख्या का सही अनुमान लगाना नामुमकिन है। मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों के अस्पतालों में वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं है। पैसे वाले लोग सोसायटियों में ऑक्सीजन सिलेंडर तक रखने लगे हैं। यह सारी सूचनाएं आगाह कर रही है कि खतरा टला नहीं बल्कि सिर पर मंडरा रहा है।    
        इसलिए स्पष्ट शब्दों में कहें तो जनता क्या नेता तक सोशल डिस्टेंसिंग की परवाह नहीं कर रहे। लॉकडाउन के बंधनों से मुक्ति की शुरुआत समझकर कहीं अपने-अपने आयोजनों में न लग जाएं। आम जनता पर तो पुलिस का दबदबा रहता है पर नेताओं की पार्टियां और जनसभाएं जी का जंजाल बनती हैं। बंधनों से मुक्ति कहीं जीवन से मुक्ति ना बन जाए-- इस खतरे को भांप कर सतर्क रहें। नियमों का ध्यान रखते हुए अनिवार्य कार्य को पूर्ण करें। लापरवाही ना बरतें। इसमें ही हमारा, हमारे समाज और देश का भलाई है । 
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                               सुनीता रानी राठौड़
                        ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

Monday, 1 June 2020

लॉकडाउन की पाबंदियां हटाना समय की मांग या जरूरत?

 मेरे विचार से लॉकडाउन की पाबंदियां हटाना समय की मांग तो नहीं कह सकते पर जरूरत कह सकते हैं। जिस तीव्रता से हमारे देश में वायरस संक्रमितों की संख्या बढ़ रही है। विश्व में भारत सातवें पायदान पर आ गया है। ऐसे वक्त में लॉकडाउन को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है ताकि बीमारी ज्यादा न फैले परन्तु आर्थिक गतिविधियों और यातायात के साधनों  को सुचारू करने हेतु लॉकडाउन की पाबंदियां हटाने की जरूरत महसूस होने लगी। पर हालात तो अभी बदतर ही हैं। 
    यही कारण है कि आज अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाह रहा है। केंद्र ने राज्य सरकार के ऊपर छोड़ दिया। राज्य सरकारों ने डीएम के ऊपर और डीएम यानी जिला प्रशासन ने वायरस फैलने के डर से बॉर्डर सील कर दिया है। पहले दिल्ली हरियाणा बॉर्डर और यूपी बॉर्डर को सील किया गया अब दिल्ली सरकार के डीएम अपनी सीमा सील कर रहे हैं। क्या पेचीदा बेतुकी अनलॉकडाउन है? जनता इन राज्यों के डीएम के चक्कर में बेवकूफ बन रोड पर तपती गर्मी में परेशान हो रही है।   
    आर्थिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने की सख्त जरूरत है।अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने हेतु कंपनियों और कारखानों को खोलना अनिवार्य है। लघु उद्योगों को भी चालू करना जरूरी है ताकि आम लोगों को रोजगार प्राप्त हो सके। आमदनी का स्रोत बना रहे। भूखमरी के कगार पर जनता ना आए।
 इन सभी मुद्दों को ध्यान में रखकर ही लॉकडाउन की पाबंदियां हटाई गई परंतु सरकार और जनता दोनों को बहुत ही सजग और सतर्क रहने की आवश्यकता है कि हमारा देश अमेरिका जैसी हालात में ना पहुंचे। इसमें कोई संदेह नहीं कि यहां सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ रही है। जनता लापरवाह है। अधिकांश जगह पर नियम का पालन नहीं दिखता। कहीं हमें भारी नुकसान का सामना ना करना पड़ जाए क्योंकि यहां धार्मिक स्थल भी  7 जून से खोले जा रहे हैं जो कि इतने अनिवार्य नहीं थे पुलिस कहां-कहां सख्ती बरतेगी?
 अतः हमारे विचार से जरूरत को ध्यान में रखते हुए जरूरी चीजों पर से ही पाबंदी हटाई जाए तो जनता और सरकार के हित में फैसले होंगे। लॉकडाउन की पाबंदियां हटाना समय की मांग तो नहीं पर जरूरत अवश्य है।
                            सुनीता रानी राठौर
                          ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)