Monday, 20 January 2020

खुमार -ए -क्रश

 चढ़ा खुमार जो क्रश का,
परवाने से वे लगने लगे ।
रंगीन लगने लगी दुनिया
पर रिश्ते नागवार लगने लगे।

आधुनिकता का रंग चढ़ा ,
निगाहबां नाचीज़ लगने लगे ।
जिन्हें हमने जीवन दिया,
हमें वे ही नांदा समझने लगे ।

आंखों के तारे हीं अपने, 
आंख आज दिखाने लगे ।
परिपक्व अनुभवी सोच को ,
घटिया स्तर का बताने लगे।

कैसे समझाऊं वो नासमझो ,
 ना यूं ही धूप में बाल सफेद हुए ।
संघर्षरत चल जीवन पथ पर ,
 हैं पाए हमने अनुभव कड़वे ।

पले -बढ़े हम उन संस्कारों में ,
जहां तजुर्बे को तरजीह मिला ।
बीजांकुर को पौधा बनने में ,
सिंचित जल सिक्त स्नेह मिला ।

जहां विश्वास भरे गंगाजल में,
 निस्वार्थ अपनत्व व प्रेम मिला ।
सजाया हर लम्हों को ख्वाबों में 
हर अरमां  सूरज चांद दिखा ।

 अनमोल संबंधों के आशियाने की,
   ना कीमत समझे नवयुवा ।
 क्या हासिल कर ली पढ़कर डिग्री ,
हर उसूल उसे दकियानूसी लगा ।

क्षणिक आकर्षण में बंधा हृदय ,
करे वादे चांद तारे तोड़ लाने का ।
 सुहाना सुहाना सा लगे प्रेम डगर ,
उम्र है उल्फ़त में खो जाने का ।

चलो माना हमने वो भी सही ,
फलसफा उम्र का तकाजा है।
 पर क्यों दुत्कारते हो उसे ,
जिसने तेरे व्यक्तित्व को तराशा है ।

तराशा है कंक्रीट पत्थरों से,
 खुद के ख्वाबों को मार कर ।
जिंदा किया तुममें नयी हसरतें ,
तुझे खड़ा कर इस मुकाम पर ।

अदम्य साहस था जो हृदय में,
समंदर के लहरों से टकराने का ।
अपनों ने ही बिखेर डाले ,
विश्वास भरे सुर तराने का ।

 चिराग -ए- नूर देख बुने सपने ,
अनिवर्चनिय आहलाद पाने का।
संवेदनाएं उमराती रही वेग से ,
दिवास्वप्न मन को भरमाने का ।

जो ऊंगली पकड़ चलना सिखाये,
वो खुद को ठगा महसूस किया ।
भावनाओं के उमड़ते सैलाब में ,
गोता खाते भंवर में उतराता दिखा ।

ममत्व भरे आंचल के छांव में ,
बदजुबानी को भी पनाह मिला ।
मां का संस्कार व शिक्षा ,
शांत -रुदन सिसकता दिखा ।

मुरझाए फूलों की पंखुड़ियों सा ,
वात्सल्य प्रेम नौशाद दिखा ।
क्रश रुपी क्षणिक आकर्षण में ,
अटूट रिश्ता स्याह होता दिखा ।
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                       सुनीता रानी राठौर



2 comments:

  1. बहुत-बहुत सुन्दर एवं सन्देश प्रद कविता मैम। उत्कृष्ट लेखन के लिए हार्दिक बधाई।

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