परवाने से वे लगने लगे ।
रंगीन लगने लगी दुनिया
पर रिश्ते नागवार लगने लगे।
आधुनिकता का रंग चढ़ा ,
निगाहबां नाचीज़ लगने लगे ।
जिन्हें हमने जीवन दिया,
हमें वे ही नांदा समझने लगे ।
आंखों के तारे हीं अपने,
आंख आज दिखाने लगे ।
परिपक्व अनुभवी सोच को ,
घटिया स्तर का बताने लगे।
कैसे समझाऊं वो नासमझो ,
ना यूं ही धूप में बाल सफेद हुए ।
संघर्षरत चल जीवन पथ पर ,
हैं पाए हमने अनुभव कड़वे ।
पले -बढ़े हम उन संस्कारों में ,
जहां तजुर्बे को तरजीह मिला ।
बीजांकुर को पौधा बनने में ,
सिंचित जल सिक्त स्नेह मिला ।
जहां विश्वास भरे गंगाजल में,
निस्वार्थ अपनत्व व प्रेम मिला ।
सजाया हर लम्हों को ख्वाबों में
हर अरमां सूरज चांद दिखा ।
अनमोल संबंधों के आशियाने की,
ना कीमत समझे नवयुवा ।
क्या हासिल कर ली पढ़कर डिग्री ,
हर उसूल उसे दकियानूसी लगा ।
क्षणिक आकर्षण में बंधा हृदय ,
करे वादे चांद तारे तोड़ लाने का ।
सुहाना सुहाना सा लगे प्रेम डगर ,
उम्र है उल्फ़त में खो जाने का ।
चलो माना हमने वो भी सही ,
फलसफा उम्र का तकाजा है।
पर क्यों दुत्कारते हो उसे ,
जिसने तेरे व्यक्तित्व को तराशा है ।
तराशा है कंक्रीट पत्थरों से,
खुद के ख्वाबों को मार कर ।
जिंदा किया तुममें नयी हसरतें ,
तुझे खड़ा कर इस मुकाम पर ।
अदम्य साहस था जो हृदय में,
समंदर के लहरों से टकराने का ।
अपनों ने ही बिखेर डाले ,
विश्वास भरे सुर तराने का ।
चिराग -ए- नूर देख बुने सपने ,
अनिवर्चनिय आहलाद पाने का।
संवेदनाएं उमराती रही वेग से ,
दिवास्वप्न मन को भरमाने का ।
जो ऊंगली पकड़ चलना सिखाये,
वो खुद को ठगा महसूस किया ।
भावनाओं के उमड़ते सैलाब में ,
गोता खाते भंवर में उतराता दिखा ।
ममत्व भरे आंचल के छांव में ,
बदजुबानी को भी पनाह मिला ।
मां का संस्कार व शिक्षा ,
शांत -रुदन सिसकता दिखा ।
मुरझाए फूलों की पंखुड़ियों सा ,
वात्सल्य प्रेम नौशाद दिखा ।
क्रश रुपी क्षणिक आकर्षण में ,
अटूट रिश्ता स्याह होता दिखा ।
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सुनीता रानी राठौर
बहुत-बहुत सुन्दर एवं सन्देश प्रद कविता मैम। उत्कृष्ट लेखन के लिए हार्दिक बधाई।
ReplyDeleteसधन्यवाद
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