वजूद औरत का रहस्यमयी अनसुलझी पहेली सी
सहनशीलता रखती दिल में रखती वो चिंगारी भी ।
कोमलांगी समझ बनाया समाज जिसे पर्दानशीं,
तोड़ बेड़ियाँ थाम तलवार बनी रानी झांसी भी ।
झेली दर्द जो मूक निरंतर चिता पे जल बनीं सती,
वजूद जो खुद का पहचानी वो बनीं महादेवी भी ।
हर औरत सीता, यशोधरा, यशोदा बेन नहीं होती,
लड़ना जानती अधिकार सम्मान की लड़ाई भी ।
बेगम जो परदे की दहलीज नहीं लांघती थी कभी ,
आज अडिग खड़ी ले तख्ती कर रही फरियाद भी।
लांछन झेल दुनिया की न अब धरती मेँ वो समाती ,
तेजाब हमला से उबर डट मुकाबला वो करती भी।
नदियां जब वजूद पहचानना सीख ले खुद की ,
न करे कभी समुंदर से मिलने की कोशिश भी ।
समर्पित हो घर को स्वर्ग बनाती जो बन जननी ,
'सुनीता'जग से टकराने की रखती वो जज्बा भी ।
*------*------------*----------*--सुनीता रानी राठौर---*
नारी शक्ति को व्यक्त करती एक सुन्दर कविता। उत्कृष्ट लेखन के लिए हार्दिक बधाई मैम। शुभकामनाएं।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद और हार्दिक आभार 🙏
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