क्या बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा सिर्फ मातृभाषा में देनी चाहिए?
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बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा सिर्फ मातृभाषा में देनी चाहिए यह परिस्थिति और उनके मानसिक अवस्था पर भी निर्भर करता है। मात्रृभाषा का ज्ञान बच्चों को अवश्य होनी चाहिए पर अगर इसके साथ-साथ दूसरे भाषाओं का भी ज्ञान हो तो आगे चलकर उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई नहीं होगी।
यह सिद्ध हो चुका है कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के उन्मुक्त विकास में ज्यादा कारगर होती है। अलग-अलग आर्थिक परिवेश के बालक को विषय को ग्रहण करने की क्षमता सामान नहीं होती।
मात्रृभाषा के माध्यम से जब पढ़ाया जाता है तो बालक के चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती है। दूसरी भाषा सीखना भी अच्छी बात है, लेकिन मात्रृभाषा की उपेक्षा करना ठीक नहीं।
केंद्र सरकार कार्यालय में हिंदी कामकाज को बढ़ावा देने की बात कहती है पर व्यावहारिक रूप से अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है।
हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है लेकिन कार्यालयों में हिंदी में कामकाज के लिए कोई जगह नहीं है।
ईमेल, इंटरनेट, कंप्यूटर, लैपटॉप फेसबुक आदि सब हिन्दी में भी अब प्रयोग होने लगे हैं फिर भी अभिभावक हिंदी की जगह अंग्रेजी में बच्चों को पढ़ाना ज्यादा अच्छा मान रहे हैं।
अच्छी नौकरी पाने के लिए, ज्ञान अर्जित करने के लिए अंग्रेजी सीखना बहुत अच्छी बात है पर अंधानुकरण में आज अंग्रेजी को ही सभी महत्व दे रहे हैं और सभी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं ताकि वह आगे अपनी पढ़ाई उचित ढंग से कर सके।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि मात्रृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य रूप से मिलनी चाहिए इसके अलावा दूसरे भाषाओं का ज्ञान हो तो अति उत्तम है।
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सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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