आज के समय में कोई सच्चाई का साथ देता है?
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आज का प्रश्न विचारणीय प्रश्न है और वर्तमान का ज्वलंत प्रश्न। यह कड़वी सच्चाई है कि लोग सच्चाई का साथ देने में कतराने लगे हैं। सच्चाई का साथ देने वाले को बहुत ही जोखिम उठानी पड़ती है। खुद भी और अपने परिवार को भी जोखिम में डालना पड़ता है।
यहां तक कि कभी-कभी उच्च पद पर बैठे हुए न्यायाधीश भी डांवाडोल हो जाते हैं। विवशतावश सच्चाई का साथ नहीं दे पाते।
पर ऐसा नहीं कह सकते कि सच्चाई का साथ कोई नहीं देता। अवश्य देते हैं-- सच्चाई का साथ देने की वजह से ही आज दुनिया चल रही है नहीं तो सारे झूठे- मक्कारों का राज हो जाये।
उच्च पद पर बैठे आसीन लोगों को गलतफहमी हो जाती है कि पैसे, धन-दौलत के बदौलत हम लोगों को खरीद कर या दबाव बनाकर अपनी मनमानी करवा सकते हैं। किसी को भी डरा धमका सकते हैं। पर यह गलतफहमी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाती। कहावत भी है झूठ के पैर नहीं होते। सच्चाई की जीत होती है।
कानून कमजोर होने की वजह से भी लोग सच्चाई का साथ देने में कतराने लगे हैं क्योंकि जो आगे आता है उसे कानून का भी साथ नहीं मिल पाता।उसका जीवन संघर्षमय हो जाता है, अस्त-व्यस्त हो जाता है। फिर भी बहुत से उदाहरण ऐसे हैं जहां सच्चाई का साथ देते हुए लोग अपराधियों, गुनाहगारो को सजा दिलवाने का प्रयास किए हैं और कर रहे हैं। इसलिए ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि आज लोग सच्चाई का साथ नहीं देते ।
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सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा( उत्तर प्रदेश)
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