क्या जाति व धर्म के बिना राजनीति संभव नहीं है?
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जाति और धर्म को राजनेता हथियार के रूप में राजनीति में इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका उद्देश्य मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाना ताकि मुख्य मुद्दों पर काम न करना पड़े इसलिए जाति धर्म के नाम पर बवाल खड़ा करते हैं। इंसान को जाति में बांटकर वोट मांगते हैं।
भारत में यह कह देना कि जातीय भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है --यह राजनीति का एक आकर्षक नारा भी हो सकता है लेकिन ऐसा वास्तव में संभव हो पाएगा यह कठिन सवाल बना हुआ है।
एक हिंसक दबंगता में या फिर अपमानजनक हालत में घिरे रखने की साजिश के रूप में मंदिरों में प्रवेश से लेकर सार्वजनिक समारोह में भागीदारी कर लेने भर से दलितों की जिंदगी पर कहीं-कहीं बन आती है। यह सब क्यों होता है? क्योंकि हमारा कानून कमजोर है और कानून में उच्च पदों पर बैठे हुए उनकी जाति के लोग और राजनेता नहीं चाहते कि उन्हें कड़ी सजा मिले।
इसलिए अभी भी कुछ जगहों पर यह भेदभाव देखने को मिल रहा है क्योंकि उन्हें कानून का डर नहीं है उनकी पहुंच ऊपर तक है।
सामाजिक बुराइयां सदियों से और पीढ़ियों से चली आ रही है। एक अदृश्य स्वर्णवादी नियंत्रण समाज में स्थापित है जो ऊंची जातियों के दबंगों को प्रश्रय देता है और यह सब राजनीतिज्ञों के मिलीभगत के कारण होता है क्योंकि उन्हें अपनी स्वार्थ की रोटी सेकनी है।
अपनी स्वार्थ की पूर्ति हेतु वे धर्म और जाति में बरगला कर लोगों को बांट कर अपना राजनीतिक फायदा उठाते हैं और जनता बेवकूफ बन कर आपस में लड़ती है।
जनता में कमियां है कि वह जातिवाद के आधार पर नेता को चुनती है और जिसकी सजा उसे भुगतनी भी पड़ती है। नफरत और विद्वेष का जहर घोलकर वह लोगों को एकजुट नहीं होने देना चाहते।
कितनी बड़ी विडंबना और अपमान है कि उच्च पद पर बैठे राष्ट्रपति का भी बार-बार जातिय पहचान बताई जाती है। जब नेता किसी को सवर्ण और किसी को शुद्र कहता है तभी उसके विचारों की मानसिक संकीर्णता झलक जाती है। ऐसा नेता निष्पक्ष भाव से जनता की सेवा कर ही नहीं सकता।
जाति धर्म के बिना भी राजनीति संभव है पर उसके लिए जनता को जागरूकता दिखानी पड़ेगी जो नेता जाति धर्म का नाम ले उसे बहिष्कृत करें।
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सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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