Sunday, 1 November 2020

क्या विदेश से आने वाले चुनावी चंदे पर रोक लगनी चाहिए?

क्या  विदेश से आने वाले चुनावी चंदे पर रोक लगनी चाहिए?
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जनप्रतिनिधित्व कानून जिसमें चुनाव के बारे में नियम बनाए गए हैं राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने पर रोक लगाता है।राजनीति में काले धन को कम या पूरी तरह से कैसे खत्म किया जाए इस पर ठोस कार्रवाई की अपेक्षा है। लोकतंत्र की एक बड़ी विसंगति उस धन को लेकर है जो चुपचाप बिना किसी लिखा- पढ़ी के दलों के नेताओं को पहुंचाया जाता है और उस काले धन से देश के बड़े आयोजन चलते हैं -राजनीतिक रैलियां, सभाएं, चुनाव प्रचार होता है।
 यह चंदे का मामला 1976 से शुरू हुआ। पहले विदेशी चंदा लेने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी पर 2010 में इस कानून में संशोधन कर इस रोक को खत्म कर दिया गया। आज चुनाव में होने वाले खर्च लोकतंत्र की एक बड़ी समस्या बन गई है। राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाकर ही समस्या का समाधान हो सकता है। किसी भी कीमत पर चुनाव जितना आज राजनीतिक पार्टी का ध्येय बनता जा रहा है।
 कंपनियों के लिए राजनीतिक चंदा दे सकने की भी एक कानूनी सीमा तय है। राजनीति करने वाले सामाजिक उत्थान के लिए काम नहीं करते सिर्फ वोट की राजनीति करते है। राजनीतिक चंदे के नाम पर लोकतंत्र को दूषित करने की कोशिशों पर विराम लगाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता से मुद्दा गरमाया है अब इस लोकतंत्र को मजबूत बनने का एक रास्ता भी दिखाई दे रहा है। कोर्ट ने आदेश जारी किया है कि ऐसे सभी दल जिनको चुनावी बांड के जरिए चंदा मिला है वे सील कवर में चुनाव आयोग को ब्यौरा देंगे ।चुनावी बांड राजनीतिक दान के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बड़ा कदम है।
इस दिशा में सख्त और ठोस कदम उठाने की अति आवश्यकता है।
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                             सुनीता रानी राठौर 
                    ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

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