मेरे विचार से हाथियों की हत्या की परंपरा हमारे देश में नहीं है। ऐसा कोई रीति रिवाज नहीं, जहां उनकी बलि दी जाती हो। हां, कुछ लालची, स्वार्थी तत्व हाथी दांत की स्मगलिंग के लालच में उनकी हत्या करते रहते हैं। वैसे ही केरल की वर्तमान घटना गर्भवती हथिनी की मौत भी शरारती तत्वों के द्वारा की गई, जो घोर निंदनीय और अक्षम्य अपराध है ।
हां, ये भी सही है कि मनुष्य अपने फायदे के लिए वन्यजीवों को संकट में डाल रहा है। सरकार द्वारा नए-नए परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु वनों की तीव्रता से कटाई हो रही है। प्राकृतिक जंगलों के सर्वनाश के कारण हाथी और दूसरे वन्यजीव ग्रामीण बस्ती तक भटकते हुए पहुंच जाते हैं, फसलों को बर्बाद करते हैं। इसलिए वन्यजीवों को भगाने हेतु ग्रामीण तरह-तरह का प्रयोग पटाखे फोड़ने, आग जलाने का उपक्रम करते रहते हैं। इसी दरमियान वन्यजीव कभी गलती से ट्रेन से कट जाते हैं, कभी बिजली के खंभों से टकराकर दर्दनाक मौत के शिकार हो जाते हैैं। ऐसे ही उपक्रमों का शिकार केरल में गर्भवती हथिनी भी हो गई जो बहुत ही दुखदाई है, मानवता को शर्मसार करने वाली घटना है।
देश के तमाम संरक्षित वन क्षेत्रों में हाथी और दूसरे वन्यजीवों को बचाने हेतु परियोजनाओं पर हर साल करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में वन्यजीवों की हादसे में होने वाली दर्दनाक हर मौत ऐसी परियोजना पर एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ती है।
जब तक मनुष्य लालच में स्वार्थवश अंधा बन कर वनों का नुकसान करता रहेगा, हाथी दांत बेच कर पैसा कमाने का स्वार्थ पालता रहेगा तब तक निर्दोष हाथियों की किसी ना किसी रूप में हत्याएं होती रहेंगी।
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सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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