1 जून से लॉकडाउन -5 कंटेनमेट जोन में लागू हुआ साथ ही अनलॉक -1भी लागू हो गया है जो देश को बंधनों की बेड़ियां से मुक्ति की शुरुआत कही जा रही है।
पर ध्यान रहे, सरकार भले ही लॉकडाउन खोल दे, सरकार के नजर में आप की मौत एक संख्या हैं लेकिन आप अपने परिवार के लिए पूरी दुनिया हैं इसलिए अपने जीवन को अनमोल समझ कर सावधान रहें।
औद्योगिक क्षेत्रों को खोलने के साथ-साथ यातायात के साधनों को चलाने की मंजूरी मिल गई है। 8 जून से शर्तों के साथ होटल, मॉल, रेस्टोरेंट, धार्मिक स्थल भी स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए खुलेंगे। एक तरह से आम जीवन पटरी पर आने लगी है। पर अभी पांच राज्यों में जिस तरह वायरस के प्रकोप से स्थिति नाजुक बनी हुई है वैसे जगहों पर ये बंधनों से मुक्ति का दौड़ कहीं जीवन से मुक्ति न साबित होने लग जाए-- यह डर बरकरार है।
आवागमन शुरू होने से ही तीव्र गति से वायरस नगरों से गांव तक पहुंचा। अब कहीं सामुदायिक संक्रमण की हालात न बन जाए, यह डर ज्वलंत प्रश्न बनकर खड़ा है।
भले ही सरकार अपनी वाहवाही लूटने में लगी हो पर जितनी कम मात्रा में टेस्टिंग हो रही है उससे संक्रमितों की संख्या का सही अनुमान लगाना नामुमकिन है। मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों के अस्पतालों में वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं है। पैसे वाले लोग सोसायटियों में ऑक्सीजन सिलेंडर तक रखने लगे हैं। यह सारी सूचनाएं आगाह कर रही है कि खतरा टला नहीं बल्कि सिर पर मंडरा रहा है।
इसलिए स्पष्ट शब्दों में कहें तो जनता क्या नेता तक सोशल डिस्टेंसिंग की परवाह नहीं कर रहे। लॉकडाउन के बंधनों से मुक्ति की शुरुआत समझकर कहीं अपने-अपने आयोजनों में न लग जाएं। आम जनता पर तो पुलिस का दबदबा रहता है पर नेताओं की पार्टियां और जनसभाएं जी का जंजाल बनती हैं। बंधनों से मुक्ति कहीं जीवन से मुक्ति ना बन जाए-- इस खतरे को भांप कर सतर्क रहें। नियमों का ध्यान रखते हुए अनिवार्य कार्य को पूर्ण करें। लापरवाही ना बरतें। इसमें ही हमारा, हमारे समाज और देश का भलाई है ।
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सुनीता रानी राठौड़
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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