अपराध को बढ़ावा देने में पुलिस, प्रशासन, राजनेता,वकील और थोड़ी बहुत भूमिका आम जनता और समाज की भी होती है।
अपराध भी कई किस्म के होते हैं-- व्यक्तिगत और संगठित। व्यक्तिगत अपराध बदले की भावना, कुंठाग्रस्त स्थिति या पथभ्रष्ट होने के कारण अकेला व्यक्ति करता है। इस पर पुलिस चाहे तो तुरंत नियंत्रण कर सकती है जबकि संगठित अपराध बहुत ही भयावह और सामाजिक क्षति पहुंचाने वाला होता है। इसमें जो गिरोह बनता है उसमें पुलिस और नेताओं की सहभागिता होती है। प्रशासन की तरफ से भी शह मिला होता है।
वर्तमान में सबसे ज्यादा अपराध शिक्षित वर्ग के उच्च पद पर बैठे नामचीन लोग करोड़ों का घोटाला कर के कर रहे हैं। बिना मिलीभगत के इतना बड़ा घोटाला संभव नहीं हो सकता। ये सफेदपोश अपराधी सबसे ज्यादा खतरनाक है जो हमारे समाज और देश को खोखला कर रहे हैं।
आम जनता की गलती यह रहती है कि वे अपने व्यक्तिगत नुकसान के डर से उसके खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते क्योंकि इन अपराधियों की पहुंच ऊपर तक होती है। इस कारण दिनदहाड़े गुंडागर्दी, कोई भी अपराध या गोरखधंधा करने से ये नहीं हिचकते।
जनता डर से आंख मूंदे रहती है। पुलिस रिश्वत लेकर चुप हो जाती है। राजनेता अपने स्वार्थ हेतु अपराधियों को शरण देते हैं। प्रशासन खुद को अच्छा साबित करने के चक्कर में अपराधों पर पर्दा डालते रहती है। इन सभी वजह से अपराध जगत फलता-फूलता रहता है। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से अपराध को बढ़ावा देने में किसी का कम तो किसी का ज्यादा भूमिका होती ही होती है।
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सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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