सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज में होने वाले उतार-चढ़ाव को नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं होता। समय के साथ जो बदलाव हो रहा है उसके अनुसार सामंजस्य स्थापित करते आगे बढ़ते रहना ही बुद्धिमानी का परिचायक है। आज का युग डिजिटल युग है। प्राचीन काल से हम तुलना करते हुए अपने रहन-सहन, खान-पान, शिक्षा और अन्य कार्यों या विचारों में अगर परिवर्तन नहीं किये तो हम कुपमंडूक की भांति हीं जीवन जीते रह जाएंगे।
अपने व्यक्तित्व को निखारने की खातिर भारतीय संस्कृति के समावेश के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करना हितकर है। महात्मा गांधी ने भी कहा था-- खिड़की सदा खुली रखें। शुद्ध हवा आने दें। प्रदूषित हवा आए तब बंद कर दें।
यानी सदा अच्छे विचारों का अनुकरण करें। अंधानुकरण न करें। सद्गुणों से व्यक्तित्व को पूर्ण कर समय के साथ कदम ताल मिलाते हुए आगे बढ़ते रहें तभी मंजिल पाना संभव है। हमेशा समय के साथ चलने वाले ही तरक्की करते हैं। अगर दकियानूसी विचारों से जकड़े रहे तो व्यक्तित्व का विकास पूर्णत: संभव नहीं होगा।
--------*------------
सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
No comments:
Post a Comment