हम अपने संस्कारों के अनुसार कर्म करते हैं। हमारे संस्कार कैसे होंगे यह हमारे परवरिश, सामाजिक परिवेश और जिन पर अडिग विश्वास है उन सभी के व्यवहार, विचार और गुणों से निर्मित होता है। कर्म हम अपने स्वभावानुसार करते हैं पर परिस्थितिनुसार कभी-कभी अपना नियंत्रण नहीं होता। बचपनावस्था में अभिभावकों के इच्छानुसार, बुजुर्गावस्था में बच्चों के इच्छानुसार, गृहस्थाश्रम में भी कभी-कभी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबते हुए पारिवारिक व सामाजिक इच्छानुसार कर्म करना पड़ता है।
कर्म तो हम खुद करते हैं पर कभी इच्छापूर्वक कभी अनिच्छापूर्वक। सामंजस्य बनाने हेतु कभी-कभी विचारों से समझौता करते हुए भी कर्म करना पड़ता है। फिर भी कर्म पर हमारा अपना नियंत्रण होता है। किसी भी कर्म को करते हुए हम अपने विवेक से सोच समझकर क्या उचित है? क्या अनुचित है? क्या नैतिक है? क्या अनैतिक है? तोलमोल करते हुए हम कर्म करते हैं।
कर्म का आधार विचार है। मनुष्य जैसा संकल्प करता है वैसा ही आचरण करता है और वैसा ही कर्म करता है।
सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
No comments:
Post a Comment