रामराज्य यानी आदर्श शासन जिसमें न सिर्फ अपने देश की जनता बल्कि समग्र विश्व के कल्याण की भावना निहित हो। रामराज्य में किसी भी मनुष्य को दैहिक, दैविक और भौतिक समस्याओं से परेशान नहीं होना पड़ता। सभी प्रेम और सौहार्द से रहते हैं।
जब तक मुख्य-मुख्य कार्यों में जन-जन की भागीदारी नहीं होगी, सभी के विचारों को, भावों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं होगी तब तक रामराज्य असंभव है।
आधुनिकता के नाम पर हमने सिर्फ लिबास
बदला है पर विचार नहीं। आज भी लोग संकीर्ण विचारों में जकड़े हुए देखे जाते हैं। मीडिया में भी वंचित तबकों की अभिव्यक्ति को बहुत कम स्थान मिलता है। आज भी प्रमुख पदों पर वंचित तबकों की उपस्थिति नाम मात्र है।
जाति व्यवस्था रामराज्य के लिए घातक है। गांधी जी ने भी कहा था कि जाति के छोटे-छोटे बाड़ों का नाश होना चाहिए। जातियां हमारे देश के विकास को, रामराज्य को रोकने का कार्य करती है।
एक राष्ट्र में एक संविधान, एक भाषा, एक राष्ट्रीय ध्वज फिर एक राष्ट्रधर्म क्यों नहीं? जब तक हम इंसान को इंसान नहीं समझेंगे, ऊंच-नीच की भावना से देखेंगे तब तक हम एक साथ मिलकर प्रेमपूर्वक कार्य नहीं कर सकते।
जिस तरह एक अकेली उंगली कमजोर पड़ जाती है पर पांचों उंगलियां मिलकर मुट्ठी बन कर शक्ति का प्रदर्शन करती है ठीक उसी तरह जब सभी जाति -धर्म, पक्ष-विपक्ष और हर वर्ग के लोग एकजुट होकर एक दूसरे के विचारों का सम्मान करते हुए कार्य करें हर दल को विश्वास में लेकर आगे बढ़े तभी कार्य में पूर्णता संभव है।
दिखावे पर पैसा न बहा कर अनिवार्य समस्याओं पर गंभीरता से विचार कर जो लोगों के हित में हो जनजीवन को लाभ पहुंचे--ऐसे कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी तभी रामराज्य की कल्पना साकार हो सकती है।
सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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