खामोशियां वास्तव में खामोश नहीं बल्कि अंदरूनी तूफान लिए होती हैं। अंतर्मन में द्वंद होने के कारण खामोशी का आवरण ओढ़ना पड़ता है। कभी कभी कहीं मजबूरन अभियुक्त को डरा धमका कर खामोश कर दिया जाता है पर वह भी मौका मिलते हीं सच्चाई उगल देता है।
पारिवारिक स्तर पर सामंजस्य बनाने हेतु खामोशी अख्तियार करनी पड़ती है। सामाजिक स्तर पर खामोशियों के विभिन्न पहलू होते हैं।
कभी-कभी दबे-कुचले हुए लोगों की आवाजें नहीं सुनी जाती इसलिए वे कुंठित भाव से खामोश हो जाते हैं पर उनके हृदय में विद्रोह की ज्वाला धधकती रहती है। ऊपर से खामोश दिखते हैंपर अंदर से खामोश नहीं रहते।
सरकारी स्तर पर उच्च पद पर बैठे अधिकारी या उच्च पद पर बैठे मंत्री गण जब ज्वलंत मुद्दों पर सही जवाब नहीं दे पाते तब खामोशी धारण कर लेते हैं। बिल्कुल चुप्पी साध लेना शंका उत्पन्न कर देता है कि दाल में काला है। खामोश हैं पर अंदरूनी माथापच्ची चल रही है।
इसी तरह जनता की भी जब सरकार नहीं सुनती। उनके समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता तब जनता भी आवाज उठाते उठाते धीरे-धीरे खामोशी अख्तियार करने लगती है पर वह अंदर ही अंदर सरकार के खिलाफ होते चली जाती है और वो खामोशी धीरे-धीरे आंधी का रूप ले लेती है और विद्रोह के स्वर में तख्तापलट हो जाता है।
इस तरह विभिन्न बिंदुओं पर गौर करें तो आप देखेंगे कि साधारण रूप से खामोशी कोई मायने नहीं रखती पर कभी ज्यादा बोलने वाला व्यक्ति बिल्कुल खामोश हो जाए या उच्च पदस्थ अधिकारी ज्वलंत मुद्दों पर ज्यादा देर तक खामोशी धारण कर लें तो समझ जाना चाहिए कि सब कुछ ठीक नहीं है, कोई बड़ा तूफान आने वाला है। खामोशियां वास्तव में खामोश नहीं होती।
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सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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