साक्षरता
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बचपन में ही मां के गुजर जाने के कारण मीनू के पिताजी ने दूसरी शादी कर ली थी। पिताजी पर सौतेली मां का दबदबा था। मीनू की सौतेली मां सारा दिन घर का काम कराती। दूसरे बच्चे को स्कूल जाते देख मीनू को भी बहुत पढ़ने का मन करता पर उसे स्कूल भेजने के नाम पर मां तरह तरह का बहाना बना देती। इसे पढ़ कर क्या करना आखिर जाना तो है दूसरे घर में, वहां पर भी घर ही संभालना है वगैरह-वगैरह।
समाजसेविकायें उन्हें साक्षरता के महत्व को बताते हुए बच्ची को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करती पर वह किसी का नहीं सुनती।
बहुत कम उम्र में ही मीनू की शादी कर दी गयी। मीनू के ससुराल वाले अच्छे नहीं थे। पति भी शराब पीकर पीटा करता। मीनू असहाय लाचार चुपचाप काम में लगी रहती। इसके दर्द और पीड़ा को देखकर के पड़ोसी बोलते-- तुम अपने पैरों पर खड़ी हो जा। क्यों इतना अत्याचार सहती हो?
पर मीनू जानती थी कि मैं तो पढ़ी लिखी नहीं हूं मैं क्या कर सकती हूं?
उसके दर्द को देखकर उसके पिताजी को भी तरस आने लगा था और उन्हें भी अब बहुत अपने आप पर ग्लानी महसूस होने लगी थी।
वे दुखी थे यह सोच कर कि अगर मैं अपनी बिटिया को साक्षर किए होता तो आज इतना अत्याचार नहीं सहना पड़ता। बचपन में सौतेली मां का अत्याचार झेली और अब अपने ससुराल वालों का।आज अगर यह साक्षर होती तो खुद अपने पैरों पर खड़ी हो सकती थी।
उन्होंने फैसला किया देर से ही सही पर मैं अपनी बिटिया को अपने पास रख कर पढ़ाई करवा कर उसे साक्षर बनाऊंगा ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके।
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सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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