छोटे उद्योग को नोटबंदी और जीएसटी से पहले ही जबरदस्त झटका लगा था। जीएसटी की मार से उबर भी नहीं पाए थे कि लॉकडाउन ने इनका कमर तोड़ दिया। इसलिए बेशक सरकार को चाहिए कि छोटे उद्योगों को आर्थिक पैकेज प्रदान करे । वर्तमान परिस्थिति में छोटे उद्योगों की सप्लाई चेन चरमरा गई है। छोटे उद्योग अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहलाते हैं क्योंकि इनके द्वारा सरकार को अच्छा खासा राजस्व प्राप्त होता है और सबसे अधिक रोजगार भी पैदा करने की क्षमता रखता है। छोटे उद्योग पूंजी की कमी और खपत ना होने की स्थिति में कमजोर पड़ते जा रहे हैं। कुटीर, लघु और मझोले उद्योगों की जैसे रीढ़ हीं टूटती जा रही है।
छोटे उद्योग सरकार से बड़े राहत पैकेज की उम्मीद लगाए बैठे हैं। कई कारखाने बंद हो चुके हैं। खपत घटने से उत्पादन सिकुड़ रहा है और रोजगार छीन रहे हैं।
देशभर में फैले हस्तकला और पारंपरिक छोटे उद्योग बदहाली के कगार पर हैं। सरकारी बैंक भी इन्हें लोन देने से कतराते हैं। पैसे डूबने के डर से इन्हें प्राथमिकता नहीं देते।
देश में मैन्युफैक्चरिंग, कपड़ा, चमड़ा, हीरे आभूषण और वाहन --ये से भी 5 श्रम वाले क्षेत्र हैं जहां सबसे ज्यादा रोजगार पैदा होता है। ये सभी छोटे उद्योग उचित बाजार की तलाश में हैं जिसमें सरकार से राहत की उम्मीद रखते हैं।
ऐसे समय में सरकार जब स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए नई स्कीम लॉन्च कर रही हैं, छोटे उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए कर्ज से जुड़ी विभिन्न स्कीमें चला रही हैं फिर भी समस्या जस की तस है।
नि:संदेह हमारा कहना है कि छोटे उद्योग रोजगार ही नहीं अर्थव्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर MSME अर्थात सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग को वित्तीय समेत दूसरे तरह के मदद जल्द से जल्द करने की आवश्यकता है।
देशहित में आर्थिक प्रोत्साहन देकर सरकार उनका मनोबल बढ़ाएं ताकि लोगों को भी अधिक से अधिक रोजगार मिले और हमारा देश आर्थिक रूप से सुदृढ़ और मजबूत बने।
सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा
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