Tuesday, 12 May 2020

क्या श्रमिकों की कमी के चलते उत्पादन शुरू करना बड़ी चुनौती नहीं है?


    लॉकडाउन के वजह से कामकाज के पटरी पर लौटने की अनिश्चितता के कारण ज्यादातर श्रमिक अपने घरों को लौट चुके हैं और लौट रहे हैं। उद्योगपतियों के लिए उत्पादन शुरू करने में श्रमिकों की कमी बड़ी चुनौती साबित होगी। 
 पुराने कामगार जितने अनुभवी थे, काम में जो रफ्तार थी, नये कामगारों के आने पर कुछ दिन के लिए रफ्तार धीमी रहेगी क्योंकि नये-नये व्यक्तियों को काम सीखने में समय लगेगा।
 औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी से उत्पादन कार्य प्रभावित होगा। कहीं-कहीं उत्पादन कार्य को पूर्ण करने हेतु श्रम कानून में बदलाव लाकर कम श्रमिक द्वारा ही 8 घंटे की जगह 12 घंटे काम करवाने का विचार किया जा रहा है और सरकार से अनुमति लिया जा रहा है जो मजदूर के हित में नहीं होगा। पूंजीपतियों द्वारा उनका शोषण शुरू हो जाएगा।
   कुछ उद्योगपतियों का मानना है कि 40-50 फ़ीसदी श्रमिक ही प्रवासी हैं जो श्रमिक यहीं बस चुके हैं या इसी क्षेत्र के रहने वाले हैं उनकी मदद से उत्पादन कार्य सुचारू ढंग से संपन्न हो सकता है।  फिलहाल ग्रीन जोन में ही कार्य करने की अनुमति है। पर हकीकत में जहां प्रशासन की तरफ से मंजूरी मिली भी है वहां भी श्रमिकों की कमी के कारण उत्पादन नहीं हो पा रहा है।
 सरकार ने राइस ब्रॉन ऑयल को उत्पादन के लिए लिखा पर श्रमिकों के काम पर नहीं लौटने से काम शुरू नहीं हो सका। ब्रेड उत्पादन और वितरण में 40 फ़ीसदी की कमी आ गई ।
फ्लोर मिल्स में पैकेजिंग की किल्लत के चलते ब्रांडेड कंपनियों की आपूर्ति 80 फिसदी घट गई है। हैंडलूम मैन्यूफैक्चर या दवा कंपनियां सभी ने चिंता जाहिर की है कि श्रमिकों की कमी से उत्पाद घटकर 20 फ़ीसदी रह गया है। दवा की पैकेजिंग में मुश्किल आ रही है। दूसरे अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी ऐसी ज्वलंत समस्या बरकरार है।
   अतः मौजूदा परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए  मेरा मानना है कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी श्रमिकों की कमी से कई महीने तक उत्पाद सामान्य रूप से नहीं हो पाएगा। अनुभवी कामगार समय से लौट गए तब तो ठीक है अन्यथा उत्पादन में कमी आना निश्चित है।
                          सुनीता रानी राठौर
                             ग्रेटर नोएडा

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