बिना कामगारों के कैसे चलेंगे उद्योग धंधे?
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कामगार देश की रीढ़ हैं। इनकी मेहनत के बदौलत ही उद्योग धंधे पूर्णता प्राप्त करते हैं। उद्योगपति अपने उद्देश्य में सफल हो पाते हैं और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। बड़े-बड़े उद्योग हों, कारखाने हों, या कृषक --कामगार के बिना अपना काम करवाने में सक्षम नहीं हो पाएंगे।
इसी कड़वी सच्चाई को समझते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा जी ने उद्योगपतियों से सलाह मशविरा कर श्रमिक ट्रेन को कैंसिल करा दिया।कामगारों को घर वापस लौटने से रोक लिया। उनका मानना है कि श्रमिक के चले जाने से उद्योग धंधों पर बुरा असर पड़ेगा। राज्य का निर्माण कार्य भी प्रभावित होगा। हां , यह भी सही नहीं है कि हम किसी को जबरदस्ती रोक कर बंधुआ मजदूर की तरह काम करवाएं।
सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक देशबंदी की घोषणा के बाद 5 से 6करोड़ मजदूर पैदल ही 500 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर अपने पैतृक गांव पहुंच गए । इसे 'रिवर्स माइग्रेशन' यानी 'उलटी दिशा में विस्थापन' कहा जा रहा है।
मौजूदा परिस्थिति को देखते हुए उद्योग जगत चिंतित है कि लॉकडाउन के बाद कामगार के न होने पर फैक्ट्रियों में काम किस तरह पूर्ण होगा। अगर कामगार वापस नहीं लौटे तो उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।
भारतीय टेक्सटाइल उद्योग परिसंघ के आंकड़ों के अनुसार करीब 10 करोड़ लोगों को टेक्सटाइल उद्योग में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है। हमारा देश परिधानों के निर्यात में अव्वल है। श्रमिकों की कमी से उत्पादन में बाधा उत्पन्न हो सकती है। छोटे मझोले उद्योगों में श्रमिकों की कमी से उत्पादन 20 से 25 तक घट गया है।
कृषि क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा है। पंजाब, हरियाणा के कृषक चिंतित हैं।फसल कटाई का समय है और दुर्भाग्यवश मजदूरों का पलायन हो रहा है जो भविष्य के लिए घातक साबित होगा। इसलिए सरकार और उद्योगपतियों को मिलकर देश हित में अपना और कामगारों की भलाई हेतु ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। कंपनियां औपचारिक अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने से ना घबराए,श्रमिक कानून का पालन करें,नीतियों पर अमल करें। कर्मचारियों को बेहतर वेतन और सामाजिक सुरक्षा देने में सक्षम बनें।
कामगार उद्योग जगत के रीढ़ होते हैं। अतः उनको स्वस्थ व खुशहाल रखें। उनके दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करें ताकि उद्योग जगत का कार्य सुचारू ढंग से संपन्न हो और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो ।
सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा
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