सरकार से लेकर व्यापारियों तक की प्रथम पसंद है 'शराब'?
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लॉकडाउन 3.0 के गंभीर हालात में रिस्क के साथ सरकार द्वारा शराब की दुकान खोलने की इजाजत देना और व्यापारियों द्वारा बाहुल्य मात्रा में शराब की बिक्री करना --साबित कर दिया कि सरकार से लेकर व्यापारियों तक की प्रथम पसंद 'शराब' ही हैं। जिस तरह से शराब खरीदने वालों की भीड़ दुकानों पर उमड़ी, लॉकडाउन और फिजिकल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ गई। कोरोना वायरस का तीव्र गति से फैलने का खतरा मंडराने लगा।
फिर भी सरकार और व्यापारियों द्वारा शराब की बिक्री जारी रखना सिद्ध कर दिया कि राजस्व प्राप्ति हेतु शराब बेचना जरूरी है।
यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर रोक न लगाकर भीड़ को नियंत्रण करने हेतु ऑनलाइन बिक्री और होम डिलीवरी की इजाजत दे दी। दिल्ली सरकार ने भी बेतहाशा भीड़ को नियंत्रण करने हेतु ई -टोकन की शुरुआत की है।
सरकार को हर दिन 700 करोड़ रुपए अल्कोहल की बिक्री से टैक्स की प्राप्ति होती है। 40 दिनों में अनुमानत: राज्य सरकारों को ₹28000करोड़ का नुकसान हो चुका है। अपने फायदे के लिए सरकार ने शराब बिक्री का निर्णय लिया। अब रेस्टोरेंट, पब व बार में भी शराब बेचने की अनुमति पर विचार कर रही है। इन लोगों को शराब पिलाने की लाइसेंस मिलती थी बोतलबंद शराब बेचने की नहीं पर अब बेचने की भी अनुमति मिलने जा रही है ।
देशभर में अल्कोहल का कारोबार 4 लाख करोड़ से अधिक का है। टैक्स के रूप में सालाना लगभग 2.5 लाख करोड़ राज्य सरकारों को मिलते हैं। इस फायदे को मद्देनजर रखकर ही व्यापारियों की सांठगांठ से सरकार की पहली पसंद 'शराब' बनती जा रही है।
एक आम नागरिक होने के नाते मेरा मानना है कि इस फैसले से सरकार और व्यापारियों का तो भला होगा पर आम जनता का बिल्कुल नहीं। कोरोना वायरस के गंभीर खतरे को भांपते हुए लॉकडाउन कर सरकार ने सारे उद्योग धन्धो को बंद करवा दिया जिससे करोड़ों लोगों को रोजी-रोटी के संकट से जूझना पड़ रहा है। इस स्थिति में सरकार अपने राजस्व प्राप्ति हेतु जो शराब बिक्री का फैसला लिया है और अपना और व्यापारियों की पहली पसंद साबित किया वह काबिले तारीफ नहीं है। बेरोजगारों में जनाक्रोश पैदा होगा जो सरकार और देश हित में ठीक नही होगा । राजस्व प्राप्ति हेतु सरकार को उन कार्यों पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है जिसमें सरकार, व्यापारी और जनता का भी हित हो।
सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा
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