Tuesday, 14 July 2020

क्या भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों की तानाशाही उचित है?

भारत में लोकतंत्र को सबसे अधिक नुकसान इस बात से पहुंच रहा है कि संविधान में राजनीतिक पार्टियों के लिए कोई नियम ही समाहित नहीं है। सभी पार्टियों में  'वन मैन शो'  की पूर्ण झलक दिखती है। अपनी पार्टी के विधायकों और सांसदों को जनप्रतिनिधि नहीं बल्कि कठपुतली समझा जा रहा है। शीर्षस्थ एक-दो नेताओं के द्वारा पार्टी जागीर की तरह चलाई जा रही है। उनके हर विचार को पार्टी का विचार कह लागू कर दिया जाता है। यहां तक कि जनता द्वारा चुनी गई सत्ताधीन पार्टियों द्वारा भी जनता के सहमति बिना हीं, जनता के हितों का अनदेखी कर बड़े-बड़े फैसले थोप दिए जाते हैं। विरोध में आवाज उठाना सरकार को नागवार गुजरता है।
   आप किसी पार्टी के सदस्य हों या देश के नागरिक--- लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत सभी को अपना विचार रखने का हक है और शीर्षस्थ  नेताओं को उन विचारों को सुनना भी अनिवार्य है।
    तानाशाही प्रवृत्ति से अंदरूनी कुंठा जन्म लेती है जो कि धीरे-धीरे विस्फोटक रूप ले लेती है।  वर्तमान में जिस तरह से सरकार तोड़ने और बनाने की प्रक्रिया चल रही है वह भी तानाशाही का ही प्रतीक है। जनता के बहुमत का अपमान, जनता के लिए कार्य न कर सरकार गठन में समय की बर्बादी, बेवजह चुनाव में लाखों का खर्च आदि कार्य राजनीतिक पार्टियों की मनमानी और तानाशाही का ही दूसरा रूप है।
   अतः मेरे विचार से राजनीतिक पार्टियों की तानाशाही बिल्कुल उचित नहीं है। वही सरकार ज्यादा दिनों तक सत्ता में आसीन रहती है जो जनता में विश्वास बनाए रखे और जनता के हित- अहित का ध्यान रखते हुए कार्य करे।
------------------सुनीता रानी राठौर
                        ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

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