एक साधक की साधना सर्जक की सर्जना साहित्य रचना होती है। साहित्यानुरागी के दिल को ठेस पहुंचती है जब वह अपनी रचनाओं को किलो के भाव रद्दी के समान बिकते देखता है। कभी-कभी प्रकाशक की असहयोगात्मक रवैए के कारण अमूल्य रचनाएं प्रकाशित होने से वंचित रह जाती हैं कभी साहित्य के प्रति उदासीनता के कारण रद्दी के भाव किताबें बिकती दिखती हैं।
जीवन का सबसे अच्छा मित्र किताब होता है परंतु बदलते समय में इंटरनेट ने किताब की बिक्री को प्रभावित किया है। लोग नेट के जरिए अपनी इच्छानुसार विषय-वस्तु का अध्ययन कर लेते हैं। किताब खरीदने के इच्छुक नहीं दिखते।
किताबों का आदान-प्रदान और उपहार में भेंट करने का भी प्रचलन चल पड़ा है पर बहुत से शख्स हैं जिन्हें साहित्य से लगाव नहीं है। उपहार में मिले किताब घर के किसी कोने में डाल देते हैं या रद्दी में बेच देते हैं।
अनमोल कृतियां का अपमान देख ऐसा लगता है मानो साहित्य के कद्रदानो की कमी हो गई है। धर्मशाला में लगे ट्रेड फेयर में एक दुकान में पुस्तकें 150- 200 किलो के भाव से बेचे जा रहे थे। बरसों के अध्ययन और अथक परिश्रम से रचित रचनाएं कौड़ियों के भाव जब बिकती हैं तो साहित्यकार के दिल को ठेस पहुंचती है।
पर इसका सकारात्मक पहलू भी है। जो साहित्य प्रेमी महंगी किताब खरीद कर नहीं पढ़ पाते वह सस्ती दरों से खरीद कर अपने इच्छाओं को पूर्ण कर पाते हैं। दूरदराज गांव में जो लाइब्रेरी खोलते हैं वे सस्ते दरों पर किताब ले जा कर लाइब्रेरी में संग्रहित कर पाते हैं जिसके वजह से गरीब तबके के लोग भी इसका सदुपयोग करते हुए अपने ज्ञान पिपासा को शांत कर पाते हैं। सरकार को भी गांव में पंचायत स्तर पर अधिक लाइब्रेरी बनाकर साहित्यिक कृतियां को संग्रहित करने की जरूरत है ताकि जन-जन में साहित्य के प्रति अभिरुचि जागे और वे ज्ञानवर्धन कर सकें।
सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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