सावन मास में प्रकृति सोलह श्रृंगार संग यौवन के चरम मादक रूप में प्रस्तुत होती है । प्रकृति सर्वत्र हरी-भरी खुशहाल और मनभावन प्रतीत होती है।हरियाली खुशहाली और समृद्धि का द्योतक है।
ग्रीष्म ऋतु की तपिश और अकुलाहट के बाद मेघो से धरती पर उमड़ती बरखा बहार जीव जगत को प्रकृति का अनुपम उपहार है। वन-उपवन में हरियाली, फल-फूल से लदे पेड़-पौधों की डालियां, मयूर का पंख फैलाकर सुंदर नृत्य पेश करना, नदी तालाब और झरनों का कल-कल निनाद इत्यादि धरती के सोलह श्रृंगार का आभास कराती है।
सावन महीना जहां भगवान शंकर जी की पूजा-पाठ के लिए जाना जाता है वहीं इस महीने महिलाएं भी बनाव-श्रृंगार का खास ख्याल रखती हैं। हाथों में मेहंदी सजाने का विशेष महत्व है। सोलह श्रृंगार के साथ श्रावणी पूजन करते हुए महिलाएं काफी खूबसूरत और नफ़ासत लगती हैं। सजी-धजी अनुपम रूप में महिलाएं और कांवर लिए हुए पुरुष भोलेनाथ को प्रसन्न करते हैं। यह महीना इच्छा और आशाओं की पूर्ति का महीना है।
श्रृंगार करना सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। श्रृंगार खूबसूरती ही नहीं भाग्य को भी बढ़ाता है।
प्रकृति का हरा-भरा प्रश्नचित्त सुहावना रूप, सजी-धजी महिलाओं का अद्भुत रूप और कांवरधारी पुरुषों का भक्ति-भाव देख कर यूं लगता है कि धरती ने सोलह श्रृंगार कर अद्भुत रूप में खुद को सजा रखा है। वास्तव में जिंदगी का श्रृंगार है सावन।
सुनीता रानी राठौर
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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